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दलितों की नहीं, आरएसएस की घर वापसी होनी चाहिए: प्रेम कुमार मणि

कुणाल मजूमदार | Updated on: 11 February 2017, 6:43 IST
QUICK PILL
आरएसएस बीआर आंबेडकर के बहाने दलितों को अपने साथ जोड़ना चाहता है. संगठन का दावा है कि संघ और आंबेडकर के विचार मिलते-जुलते हैं.दलित विचारक प्रेम कुमार मणि से बात की कुणाल मजूमदार ने. पढ़ें बातचीत के चुनिंदा अंश:

आरएसएस को अचानक दलितों की इतनी चिंता क्यों होने लगी?

बीजेपी और आरएसएस को अपनी विचारधारा की चिंता है. ऐसा लगता है कि वो या तो इतिहास नहीं समझते या फिर समझना नहीं चाहते. ये ठीक है कि कुछ बिंदुओं पर आंबेडकरवादियों और आरएसएस के विचार मिलते हैं. मसलन, वीडी सावरकर जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ थे. उन्हें लगता था कि इससे हिंदू धर्म कमजोर होगा.

सावरकर ने आंबेडकर की तारीफ करते हुए कहा था, वो भी छुआछूत दूर करना चाहते हैं. लेकिन सावरकर की हिंदू धर्म की परिभाषा अलग थी. उन्हें लगता था कि हिंदू एक कमजोर कौम है इसीलिए उन्होंने हिंदुत्व का विचार पेश किया.

आरएसएस को पता ही नहीं कि सावरकर ने बीफ़ खाने के लिए एक आंदोलन चलाया था. उन्हें लगता था कि बीफ़ खाने वाले लोग(ईसाई और मुसलमान) ज्यादा ताकतवर होते हैं. उन्हें लगता था कि हिंदुओं के भोजन में पर्याप्त प्रोटीन नहीं होता. जिसके कारण वो मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर होते हैं.

सावरकर छुआछूत दूर करके हिंदू धर्म को मजबूत बनाना चाहते थे. वो हिंदू महासभा के विचारों के समर्थक थे, जो आरएसएस से काफी अलग हैं.

आरएसएस लड़ाकू हिंदू अस्मिता का निर्माण करना चाहता है. सावरकर हिंदू अस्मिता को मजबूत करने के लिए बेहतर संस्कृति, स्वास्थ्य, शक्ति और बुद्धिमत्ता प्राप्त करने पर जोर देते थे.

हिंदू महासभा के संस्थापक मदन मोहन मालवीय भी छुआछूत दूर करने की जरूरत महसूस करते थे. उन्होंने ही जगजीवन राम जैसे दलित नेता को संरक्षण दिया. वो उन्हें आरा से बनारस लाए और उन्हें शिक्षा दिलायी. वहीं आरएसएस छिपे तौर पर ब्राह्मणवाद को मजबूत करने की कोशिश करता है.

आरएसएस और हिंदू महासभा ने साल 1951 में हाथ मिलाया. बहुत कम बीजेपी और आरएसएस नेता ये स्वीकार करते हैं कि हिंदू महासभा और आरएसएस की विचारधारा में अंतर है. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों से ये बात पूरी तरह साफ हो जाती है. वो बौद्धिक रूप से बहुत ही मिडियाकर थे.

आरएसएस आंबेडकर और हेडगेवार के बीच गहरी दोस्ती की भी बात करता रहता है

वो कैसे? हेडगेवार सुभाष चंद्र बोस के दोस्त हो सकते थे. उनके विचार मिलते थे. रजनीकांत दत्त को 1939 में दिए गए इंटरव्यू में बोस ने माना है कि वो एक सीमा तक फासीवाद का समर्थन करते थे.

आरएसएस कहता है कि आंबेडकर ने बौद्ध धर्म इसलिए स्वीकार किया कि क्योंकि उन्होंने महात्मा गांधी से वादा किया था कि वो हिंदू धर्म के किसी करीबी धर्म को अपनाएंगे

अगर वो ऐसा सोचते हैं कि बुद्ध धर्म हिंदू धर्म का करीबी है तो उनकी बौद्धिक क्षमता पर गंभीर सवाल खड़ा होता है. अगर कोई धर्म हिंदू धर्म का शत्रु है तो इस्लाम और ईसाई नहीं है, उसका असली दुश्मन बौद्ध धर्म है. इस्लाम भी एक ईश्वर में यकीन रखता है. विचार के स्तर पर वो हिंदू धर्म के जैसा ही है. बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म इस मामले में परस्पर विपरीत विचार रखते हैं.

मुझे लगता है कि आरएसएस का आशय हिंदू संस्कृति से होगा. वो 'भारतीय संस्कृति' और 'हिंदू संस्कृति' के बीच भ्रमित हैं. धर्म का संबंध विश्वास और विचारधारा से है, संस्कृति का संबंध जीवनशैली से है. इसीलिए मैं कहता हूं कि आरएसएस वाले बौद्धिक रूप से मिडियाकर हैं. मैं मालवीय और सावरकर का सम्मान करता हूं. मैं उन्हें प्रणाम करता हूं क्योंकि उनके पास अपनी सोच थी और वो मुद्दों पर विचार करते थे.

आरएसएस का दावा है कि आंबेडकर 'शुद्धिकरण' को समर्थक थे जिससे इस्लाम अपना चुके दलितों की शुद्धि की जा सके. उनके अनुसार आंबेडकर मानते थे कि मुसलमान कभी भारत को अपनी मातृभूमि नहीं मानेंगे

आंबेडकर ने एक किताब 'थॉट्स ऑन पाकिस्तान' लिखी थी. डॉ राजेंद्र प्रसाद ने अपनी किताब 'इंडिया डिवाइडेड' में आंबेडकर के विचारों की सराहना की है. उन्हें पाकिस्तान के अलग देश बनने का विचार गलत नहीं लगता था. मुझे भी ऐसा ही लगता है.

उन्हें लगता था कि पाकिस्तान ईरान वगैरह मुस्लिम देशों और भारत के बीच एक बफ़र स्टेट के रूप में काम करेगा. उन्हें लगता था कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते क्योंकि उनकी जीवनदृष्टि अलग अलग है. उन्हें लगता था कि हिंदुस्तान को लोकतंत्र बनाने के लिए मुसलमानों का अलग होना जरूरी है. लेकिन उनका मानना था कि दोनों देशों में मित्रतापूर्ण संबंध होना चाहिए.

क्या आंबेडकर को मुस्लिम विरोधी कहा जा सकता है?

मुझे नहीं लगता. वो इस्लाम के खिलाफ दिए जाने वाले तर्कों को परख रहे थे. उन्होंने सेक्युलरिज्म की कड़ी आलोचना की थी. उन्होंने कभी खुद को सेक्युलर नहीं कहा. मैं भी राजनीतिक अर्थों में अपने को सेक्युलर नहीं कहता. आंबेडकर को धार्मिक सहिष्णुता में यकीन था.

मुझे लगता है कि आंबेडकर इसे जिस बौद्धिक स्तर से देख रहे थे उसे लोग आज भी नहीं समझ पा रहे हैं. आंबेडकर ने इस्लाम के पाखंड का विरोध किया था. उन्होंने कभी इसे वैज्ञानिक धर्म नहीं माना.

फिर आरएसएस इसे सांप्रदायिक रंग कैसे दे रही है?

आरएसएस अपने ब्राह्मणिक दायरे को फैलाने के लिए दलितों का शुद्धिकरण चाहता है. आंबेडकर दलितों का सांस्कृतिक और शैक्षणिक उत्थान चाहते थे ताकि वो दूसरी जातियों की तरह जीवन जी सकें. उनके लिए इसका उपाय बौद्ध धर्म था.

गांधी के बाद आंबेडकर एकमात्र नेता थे जिसने इस बात को समझा कि हमारी जड़ धर्म में है, न कि राजनीति में. मुझे लगता है कि आंबेडकर को लगता होगा कि धर्म के बगैर दलितों का उत्थान नहीं हो सकता. तो दलितों का धर्म कैसा होना चाहिए? जाहिर है ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म इसका विकल्प नहीं हो सकता था? वो एक समतावादी और वैज्ञानिक धर्म चाहते थे. उन्होंने अपनी किताब 'बुद्ध एंड हिज़ धर्म' में बुद्ध को वैज्ञानिक चिंतन का सर्वोत्तम शिखर माना है.

इसलिए मुझे अचरज होता है कि आरएसएस के मिडियाकर बुद्धिजीवी ऐसा कैसे सोचते हैं कि हिंदु धर्म और बौद्ध धर्म करीबी हैं. इन दोनों धर्मों के बीच दो हजार साल से संघर्ष चल रहा है.

आप बौद्ध धर्म का इतिहास देखेंगे तो आपको सबसे गंभीर विचारक आपको मिलेंगे. उनमें से बहुत से नागसेन, आशुबोध, धर्मकीर्ति और विश्वबंधु इत्यादि ब्राह्मण थे जो बौद्ध बने. इन दोनों धर्मों के बीच तुलना संभव नहीं. बौद्ध धर्म वैश्विक धर्म है. आरएसएस जिस हिंदू धर्म की बात करता है वो सनातन धर्म है, जो पेशाब, शौच, स्नान, मुंह धोने जैसी के बारे में जानकारी देता है.

शुद्धिकरण की पहली जरूरत ब्राह्मणों को है. उनकी सोच पिछड़ी और प्रतिगामी है. हमें दलितकरण की जरूरत है, न कि शुद्धिकरण की. आरएसएस भटक गया है उसकी घर वापसी की जरूरत है.

आरएसएस की स्थापना 1925 में ब्रितानी शासन के दौरान हुई थी. उनमें भारतीय क्या है? उनकी बेल्ट, पैंट और शर्ट देख लीजिए? इन सबसे उनकी वैचारिक दरिद्रता ही जाहिर होती है.

पिछले साल लोक सभा चुनावों में यूपी में बीजेपी को मिली सफलता को देखकर ऐसा लगता है कि आरएसएस दलितों को लुभाने में कुछ हद तक सफल भी हो रहा है. इससे क्या ये अर्थ निकाला जा सकता है कांग्रेस और दूसरी पार्टियां इसमें विफल रही हैं?

आरएसएस ब्राह्मणवाद का प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है. लेकिन ये जरूर है कि पिछले लोक सभा चुनाव में दूसरी पार्टियां विफल रही थीं. कांशीराम के बाद उनके कद का दूसरा कोई दलित नेता नहीं हुआ. मायावती ने बहुजन को सर्वजन बनाया.

First published: 5 December 2015, 8:01 IST
 
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