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आरएसएस से कुछ सबक ले सकते हैं दलित: अशोक भारती

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
डॉ. बीआर आंबेडकर की 125वीं जयंती पर कुछ दिलचस्‍प चीजें देखने को मिल रही हैं. उत्‍तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र कांग्रेस और बीजेपी की निगाह दलित वोटों पर है और दोनों पार्टियां संविधान निर्माता को अपने पाले में खींचने की जुगत में हैं.
दलित संगठनों के राष्‍ट्रीय गठबंधन नेशनल कनफेडरेशन ऑफ दलित ऑर्गनाइजेशंस (नैक्‍डॉर) के अध्‍यक्ष अशोक भारती इस सियासी जंग और दलित नेताओं की असफलता पर अपनी राय देते हुए कहते हैं कि भाजपा कभी भी आंबेडकर से प्रेम नहीं कर सकती उसे उनके अनुयायियों का साथ चाहिए.
राहुल कुमार से हुई बातचीत के कुछ अंश:

बीजेपी और आरएसएस डॉ. बीआर आंबेडकर की विरासत से छेड़छाड़ कर रहे हैं. आपकी इस बारे में क्‍या राय है?

आंबेडकर वर्ग, जाति और राजनीतिक विचारधारा का अतिक्रमण करने वाले नेता थे. उनके अनुयायियों की एक बड़ी राजनीतिक ताकत है जिसे हर राजनीतिक दल अपने साथ लेना ही चाहेगा.

बीजेपी घोषित रूप से एक मनुवादी पार्टी है और वह आंबेडकर से प्रेम के चलते नहीं, बल्कि उनके अनुयायियों का प्‍यार जीतने के लिए उनकी विरासत को अपनाने की कोशिश कर रही है.

मुझे नहीं लगता कि आरएसएस या फिर बीजेपी दलितों को अपने पाले में कर पाएगी. आंबेडकर जयंती मनाने से उनका कुछ नहीं होगा. जैसा कि कहावत है, ''हाथी के दांत दिखाने के और, खाने के और'', यही इनका हाल है.

आरएसएस ने कहा है कि बाबासाहब हमेशा हिंदू कर्मकांडों का विरोध करते थे, हिंदू दर्शन का नहीं. नागपुर की अपनी पिछली बैठक में संघ में 'एक कुआं, एक श्‍मशान और एक मंदिर' की भी बात कही थी


आप आंबेडकर समग्र के चौथे खंड में यदि रिडल्‍स इन हिंदूइज्‍म नामक अध्‍याय को पढ़ें, तो आप पाएंगे कि उन्‍होंने हिंदू धर्म और हिंदू देवी-देवताओं की भारी आलोचना की है. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को इसलिए नहीं चुना कि वह हिंदू धर्म के करीब था, बल्कि इसलिए क्‍योंकि वह इस देश के तमाम धर्मों से अलग था. 

जहां तक 'एक कुआं' का सवाल है, तो गांधीजी ने भी यह बात 1924 में कही थी. दलितों  को कुएं से पानी भरने पर पीटा जाता था.

आरएसएस यदि 'एक कुआं, एक मंदिर और एक श्‍मशान' वाले सिद्धांत को लागू कर पाता है तो यह अच्‍छा होगा, लेकिन सवाल है कि क्‍या वे शंकराचार्यों को इसके लिए मना पाएंगे? क्‍या वे वास्‍तव में मंदिरों में दलितों का प्रवेश रोकने वाले चरमपंथियों पर लगाम कस पाएंगे? उनकी राजनीतिक सदिच्‍छा पर सवाल न भी हो, तो क्‍या उनके पास वैसा करने की सामर्थ्‍य है जो वे कह रहे हैं?

आरएसएस ने कहा है कि आंबेडकर और केबी हेडगेवार के बीच 'गहरी दोस्‍ती'थी?

आरएसएस को इस 'गहरी दोस्‍ती' का सबूत दिखाना चाहिए. यह संभव है कि हेडगेवार और आंबेडकर की मुलाकात नागपुर में या किसी अन्‍य सम्‍मेलन में हुई हो, लेकिन हमारे पास इसके साक्ष्‍य नहीं हैं. मसलन, यह तो ज्ञात है कि राम मनोहर लोहिया और आंबेडकर आपस में पत्राचार करते थे क्‍योंकि वे पत्र उपलब्‍ध हैं.

मामला यह है कि हमारे पास आरएसएस के खिलाफ प्रचार तंत्र खड़ा करने की क्षमता नहीं है. जहां ऐसा करने की जरूरत है यानी लोगों के बीच, वहां हम ऐसा कर रहे हैं. इसके अलावा, दलितों का मध्‍यवर्ग भी बीजेपी और आरएसएस के सख्‍त खिलाफ है.

कांग्रेस ने भी जयंती मनाने के लिए एक कमेटी गठित की है

कांग्रेस और बीजेपी दोनों का आंबेडकर से कोई लेना-देना नहीं है. कांग्रेस को उनके नाम का एक स्‍मारक बनाना था लेकिन उसने अपने पैर वापस खींच लिए. उसकी नज़र केवल दलित वोटों पर है.

दोनों प्रमुख पार्टियां यदि दलितों के कल्‍याण को लेकर गंभीर हैं, तो उनके लिए यह अच्‍छा है. अगर सत्‍ताधारी और विपक्षी पार्टी आंबेडकर के नाम पर एक हो सकती हैं, तो यह हमारी बड़ी जीत होगी.

सवाल है कि क्‍या ये पार्टियां वास्‍तव में उनकी विरासत को अपने भीतर उतारेंगी और उस पर चलेंगी? दलित इस झांसे में नहीं आने वाले हैं.

मुख्‍यधारा के दलों का दलितों को लुभाना क्‍या यह नहीं दिखाता कि दलित नेताओं ने अपने ही लोगों का भरोसा खो दिया है?

हां और नहीं भी. नहीं इसलिए, क्‍योंकि दलित नेताओं को बेहद आतंक भरे प्रतिकूल व असहयोगी माहौल में काम करना पड़ता है. राजनीतिक दल भले ही अपने यहां दलित नेताओं को रखते हैं, लेकिन उनकी सुनी नहीं जाती है. मुख्‍यधारा के दल सोचते हैं कि उन्‍होंने ऐसे नेताओं को अपने में शामिल करके उन पर अहसान किया है. इसके बावजूद यदि कोई दलित नेता असर छोड़ता है, तब मैं मानता हूं कि उन्‍हें थोड़ी-बहुत कामयाबी मिली है.

इसे जब मैं दलितों के चश्‍मे से देखता हूं, तो कह सकता हूं कि निजी तौर पर भले ही हमारे कुछ नेता कामयाब रहे हों लेकिन अब तक वे समुदाय को संतुष्‍ट नहीं कर पाए हैं. मायावती मुख्‍यमंत्री रह कर भी दलितों की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं ला सकी हैं.

दलितों की अपेक्षाएं मामूली हैं, लेकिन वे भी पूरी नहीं हो पा रही हैं. दलितों ने 2009 के बाद अपने नेताओं को लोकसभा से बाहर का रास्‍ता दिखा दिया. रामविलास पासवान और आरपीआइ (ए) के नेता रामदास अठावले चुनाव हार गए. मीरा कुमार तो वैसे भी दलितों से जुड़ नहीं पाती हैं.

क्‍या आंबेडकर को लेकर मची यह होड़ किसी भी तरह से दलितों का कुछ भला कर पाएगी?

मुझे लगता है कि इससे कुछ तो बेहतर निकलेगा. बीजेपी, साथ ही आरएसएस और कट्टर हिंदू दलितों को अपने दुश्‍मन की तरह देखना बंद कर देंगे. मुझे लगता है कि दलितों को संरक्षण मिलेगा लेकिन कई तरीकों से उनकी मदद भी होगी. दूसरी ओर, दलित ताकतें बीजेपी और अन्‍य का पुरज़ोर विरोध करेंगी क्‍योंकि हमें आंबेडकर और दलित सरोकारों को हड़पे जाने से वाकई सरोकार है.

मुझे लगता है कि भारत में अब दूसरे सामाजिक अनुबंध का वक्‍त आ चुका है. पहला अनुबंध आंबेडकर और गांधी के बीच 1932 में पूना पैक्‍ट पर दस्‍तखत से शुरू हुआ था और उसने अपनी उपयोगिता साबित कर दी है. इसीलिए यदि दलित सामूहिक रूप से इसे एक अवसर के रूप में देख पाते हैं, तो हमें इस अवसर को दूसरे सामाजिक अनुबंध में तब्‍दील करने की ज़रूरत होगी.

जिस तरह आरएसएस के तमाम स्‍वयंसेवक देश भर में फैले हैं, क्‍या आपके यहां भी ज़मीनी स्‍तर पर काम करने वाले दलित संगठन हैं?

दलित संगठन, या खुद नैक्‍डॉर भी आरएसएस या उसके संगठनात्‍मक कौशल की बराबरी नहीं कर सकता लेकिन अगले 25 साल में हम आरएसएस को मात दे देंगे और आरएसएस इसे बखूबी समझता है. इसीलिए वह आंबेडकर की विरासत के पीछे पड़ा हुआ है.

आरएसएस ने दीनदयाल उपाध्‍याय या श्‍यामाप्रसाद मुखर्जी की जयंती को उतने बड़े पैमाने पर नहीं मनाया क्‍योंकि वह जानता है कि ब्राह्मण और दूसरी सवर्ण जातियां बड़ी संख्‍या में इसमें साथ नहीं आएंगी. लेकिन उन्हें भरोसा है कि अपने नेता की जयंती मनाने के लिए दलित ज़रूर घरों से निकलकर बाहर आएंगे.

दलित संगठनों के बीच आरएसएस की तर्ज पर एक आरंभिक ढांचा तैयार होता हम देख रहे हैं. मसलन, नैक्‍डॉर या फिर केवल गांवों में काम करने वाली राष्‍ट्रीय दलित महासभा (आरडीएम) ताकतवर संगठन बनने की सामर्थ्‍य रखते हैं.

इसके बावजूद आरएसएस को हमें एक बात का श्रेय तो देना ही होगा कि उसने अपनी विचारधारा में धैर्य, प्रतिबद्धता और संकल्‍प का लगातार परिचय दिया है. उसने दबाव में भी खुद को टिकाए रखा और अपने सहयोगियों के सत्‍ता से बाहर रहने के बावजूद लगातार फैलता गया है. इस मामले में आरएसएस से हम बेशक कुछ सबक ले सकते हैं.

First published: 5 December 2015, 7:31 IST
 
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