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कांग्रेस सांप है तो बीजेपी कोबरा: दलित कवि अकेला

कुणाल मजूमदार | Updated on: 11 February 2017, 6:43 IST
QUICK PILL
दलित कार्यकर्ता और कवि एआर अकेला को बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के गीत लेखक के रूप में जाना जाता है. बीएसपी के संस्‍थापक कांशीराम से बहुत गहरे प्रभावित रहे अकेला उत्‍तर प्रदेश की पूर्व मुख्‍यमंत्री मायावती के कठोर आलोचक हैं, जिनके बारे उनका मानना है कि उन्‍होंने बहुजन आंदोलन को पटरी से ही उतार दिया है.उनका मानना है कि दलितों का नया नेतृत्‍व उभर रहा है जो बीएसपी को उखाड़ फेंकेगा और बहुजन आंदोलन को उसके मूल स्‍वरूप में बहाल करेगा.आंबेडकर की विरासत पर कब्‍जे के लिए कांग्रेस और बीजेपी के बीच मची खींचतान पर उनकी राय यह है कि दोनों ही दल अविश्‍वसनीय हैं.कुणाल मजूमदार के साथ उनके साक्षात्‍कार के अंश:

आरएसएस ने कुछ महीने पहले बीआर आंबेडकर पर केंद्रित 200 पन्‍नों का पांचजन्‍य का एक विशेषांक प्रकाशित किया था जिसमें जातिवाद को समाप्‍त करने की बात की गई थी. आपके मुताबिक इसके पीछे क्‍या एजेंडा हो सकता है?

एजेंडा तो है. इन लोगों ने 'पिछड़ा' की पीठ पर सवार होकर केंद्र में सरकार बना ली. अब उनकी निगाह उत्‍तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव पर है. अकेले आरएसएस ही नहीं, कांग्रेस ने भी साल भर तक आंबेडकर जयंती मनाने की घोषणा की है और 2016 में वह नागपुर में एक बड़ा आयोजन करने जा रही है.

कांशीरामजी कहा करते थे कि आरएसएस और बीजेपी ब्राह्मण समाज की 'बी' टीम है जबकि कांग्रेस उसकी 'ए' टीम है.

हमें ज्‍यादा खतरा 'ए' टीम से है क्‍योंकि वह सांपनाथ है जबकि बीजेपी नागनाथ है. सांप धोखेबाज़ होता है क्‍योंकि वह घास में हरे रंग का सहारा लेकर छुप जाता है जबकि कोबरा अपने फ़न के कारण सबको दिखाई देता है.

बीजेपी से हमें कोई खतरा नहीं है क्‍योंकि हमारे वोट उन्‍हें जा ही नहीं सकते. बीजेपी जब से कमज़ोर पड़ना शुरू हुई, तभी से हम उससे लगातार सतर्क रहे हैं क्‍योंकि उसके बाद ही उसका खेल शुरू हुआ था.

उत्‍तर प्रदेश की पूर्व मुख्‍यमंत्री मायावती का नेतृत्‍व अगर असरदार रहता, तो बीजेपी और कांग्रेस आंबेडकर को लेकर इतना हल्‍ला नहीं मचा पाते. फिर भी, हम उनके मंसूबों में उन्‍हें कामयाब नहीं होने देंगे.

कांशीराम को छोड़ दें तो दलित नेतृत्‍व उनके बाद इस समुदाय को वह सहारा नहीं दे सका जैसा उसे चाहिए था. ऐसा क्‍यों है?

कांशीरामजी के बाद किसी ने कायदे से काम ही नहीं किया. मायावती ने निजी लोभ के चक्‍कर में आंदोलन को बर्बाद कर डाला.

मैं पूरे संकल्‍प के साथ कह सकता हूं कि हमें कांशीराम की बहुजन समाज की अवधारणा को साकार करने का अवसर दद्दू प्रसादजी के नेतृत्‍व में एक बार फिर प्राप्‍त होगा. बीएसपी का विकल्‍प वे ही हमें उपलब्‍ध कराएंगे.

मायावती ने जिन राजनीतिक जड़ों को काट डाला, सामाजिक परिवर्तन मंच उसी से जन्‍मा है और हम उसके माध्‍यम से बहुजन समाज की बहाली की कोशिश कर रहे हैं.

बाबासाहब कहते थे कि सामाजिक बदलाव के बगैर राजनीतिक बदलाव धोखा है; यहां तक कि कांशीराम भी कहते थे कि एक ऐसा समाज जिसकी राजनीतिक नींव मज़बूत हो वही कामयाब राजनीति की ओर ले जा सकता है. हमने यह आंदोलन 15 मार्च 2015 को शुरू किया है.

आप कह रहे हैं कि कांशीराम के खड़े किए दलित आंदोलन को मायावती ने बदल डाला. यह आंदोलन नाकाम क्‍यों हुआ?

मीडिया ने 2007 के चुनाव के बाद बड़ी चालाकी से इस बात को प्रचारित किया था कि बीएसपी को बहनजी की सोशल इंजीनियरिंग और दलित-ब्राह्मण एकता के चलते बहुमत मिला. यह बात बिलकुल गलत है.

मीडिया में काम करने वाले अधिकतर लोग ब्राह्मण हैं और मीडिया उन्‍हीं के लिए है. अपने निजी स्‍वार्थों के चलते वे सच्‍चाई को छुपा ले गए.

बीएसपी की जीत का पहला कारण महान कांशीराम के प्रति गहरी सहानुभूति की लहर थी जिनका निधन चुनाव से छह माह पहले ही हुआ था. दूसरा कारण यह था कि पूरा चुनाव फौज ने करवाया था. तीसरा कारण यह रहा कि पार्टी के सारे नए और पुराने कार्यकर्ता एकजुट हो गए थे और किसी भी बग़ावत नहीं की.

एक सच्‍चाई यह भी है कि इसके सबसे बड़े लाभार्थी ब्राह्मण ही रहे- ब्राहृमण मंत्री, ब्राह्मण डीएसपी या ब्राह्मण एसएसपी. उनका एससी और एसटी पर राज चल रहा था.

क्‍या आपको लगता है कि अब कांशीराम जैसा कोई अखिल भारतीय दलित नेता उभर सकेगा और दलित आंदोलन बच सकेगा?

मुझे पक्‍का यक़ीन है कि ऐसा नेता हमारे बीच से विकल्‍प लेकर उभरेगा. हम इसे 2017 के चुनाव में साबित कर देंगे.

बीएसपी के पास इतने कम विधायक-सांसद रहेंगे कि वे मायावती को राज्‍यसभा नहीं भेज सकेंगे. राजनीति इसीलिए सत्‍ता का खेल हे और बिना संघर्ष के सत्‍ता हासिल नहीं की जा सकती.

आरएसएस कहता है कि वह जातिवाद को समाप्‍त कर के हिंदू एकता बनाना चाहता है. क्‍या वह वास्‍तव में जातियों को जोड़ पाएगा?

नहीं. जगजीवन राम महान कांग्रेसी नेता रहे. जातिवाद के मसले पर वे कहते थे कि लोग अगर अपने जातिसूचक नाम हटा दें तो जातिवाद खत्‍म हो जाएगा, लेकिन लोग ऐसा नहीं करना चाहते हैं क्‍योंकि उन्‍हें जातिवाद से लाभ होता है.

जातिवाद के शिकार लोग इसे खत्‍म करना चाहते हैं और इसकी तैयारी में जुटे हैं. सत्‍ता के बगैर छुआछूत खत्‍म नहीं हो सकती है. सत्‍ता के बगैर औरतों की पीड़ा खत्‍म नहीं हो सकती है. यानी यदि आप हिंदू धर्म को छोड़ दें, तब आप जाति से मुक्ति पा सकते हैं.

दूसरी चीज़ सत्‍ता है. बाबासाहब ने धर्म में बेहतरी लाने की भरसक कोशिश की लेकिन अंत में उन्‍होंने निराश होकर कहा, ''मैं हिंदू जन्‍मा था क्‍योंकि वह मेरे हाथ में नहीं था, लेकिन मैं हिंदू मरूंगा नहीं. यह मेरे वश में है.''

फिर उन्‍होंने पांच लाख लोगों के साथ धर्म परिवर्तन करवा लिया. आरएसएस तो अपना काम करता ही रहेगा. अपने समाज को, यानी अकेले एससी को नहीं बल्कि बहुजन समाज को जागरूक रखना हमारा काम है.

First published: 5 December 2015, 8:01 IST
 
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