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आंबेडकर के निधन के 59 साल बाद आरएसएस उन्‍हें कैसे बदल सकता है: कांचा इलैया

सौम्या शंकर | Updated on: 11 February 2017, 6:43 IST
QUICK PILL
डॉ. बीआर आंबेडकर को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच जंग छिड़ी हुई है. क्‍या वे हिंदू थे या फिर हिंदू विरोधी? क्‍या वे घर वापसी में विश्‍वास करते थे? अपनी पुस्‍तक वाइ आइ एम नॉट ए हिंदू - ए शूद्र क्रिटीक ऑफ हिंदुत्‍व फिलॉसफी, कल्‍चर एंड पॉलिटिकल इकनॉमी से चर्चित हुए दलित अधिकार कार्यकर्ता कांचा इलैया इन सवालों के जवाब दे रहे हैं.सौम्‍या शंकर से साक्षात्‍कार के कुछ अंश:

कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही आंबेडकर की विरासत पर दावा करने निकल पड़े हैं. इनकी क्‍या योजना है?

कांग्रेस ने सोनिया गांधी की अध्‍यक्षता में एक कमेटी बनाई है जो बीआर आंबेडकर को हमारे राष्‍ट्र के सर्वाधिक सेकुलर नेताओं में एक के रूप में प्रचारित कर के उन्‍हें नेहरू और गांधी की कतार में खड़ा करना चाहती है.

इससे कांग्रेस का कुछ भला बेशक हो सकता है क्‍योंकि दलितों ने हमेशा उसे वोट दिया, लेकिन बीजेपी को कभी नहीं दिया. आंबेडकर को भारत रत्‍न हालांकि कांग्रेस ने नहीं, पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने दिया था. बीजेपी दरअसल इसी बात को कांग्रेस के खिलाफ हथियार के रूप में इस्‍तेमाल कर रही है.

बीजेपी ने अंतरराष्‍ट्रीय परियोजनाओं का नामकरण आंबेडकर के नाम पर किया है और दलितों का समर्थन जीतने के लिए वह कई स्‍मारक भी बनवा रही है. इसके लिए वे आंबेडकर को केबी हेडगेवार, दीनदयाल उपाध्‍याय और स्‍वामी विवेकानंद की कतार में खड़ा कर रहे हैं. अब ब्राह्मणों के घरों में भी आंबेडकर देखे जाएंगे, जैसे उनके यहां शिर्डी के साईं बाबा की तस्‍वीर लगी होती है.

आंबेडकर पर अपने 200 पन्‍ने के एक दस्‍तावेज़ में आरएसएस दावा करता है कि आंबेडकर 'शुद्धिकरण' और 'घर वापसी' में यकीन करते थे. आप क्‍या समझते हैं?

यह अद्भुत है. आरएसएस भारत को सभी हिंदुओं के लिए 'एक मंदिर, एक कुआं और एक श्‍मशान' वाला राष्‍ट्र बनाना चाहता है. सवाल उठता है कि उस एक मंदिर में किस भगवान को स्‍थापित किया जाएगा? बुद्ध होंगे या राम?
अगर आप आंबेडकर की विचारधारा की बात करते हैं, तो वहां राम नहीं हो सकते, बुद्ध को ही होना होगा. फिर एक और सवाल कि क्‍या इस मंदिर का पुजारी कोई दलित हो सकेगा? क्‍या वे कभी भी तिरुपति बालाजी या वैष्‍णों देवी का मुख्‍य महंत किसी दलित को बना सकते हैं?

यह मेरे लिए तो अकल्‍पनीय है कि बीजेपी आंबेडकर को घर वापसी का समर्थक बताने की कोशिश कर रही है. आंबेडकर तो खुद हिंदू धर्म को छोड़कर बौद्ध हो गए थे, फिर वे कैसे ऐसा दावा कर सकते हैं? उस दस्‍तावेज़ में उन्‍होंने आंबेडकर को मोटे तौर पर हिंदू दर्शाने की कोशिश की है. एक शख्‍स की मौत के 60 साल बाद वे उसे आखिर कैसे बदल सकते हैं?

आपको क्‍या लगता है कि आरएसएस की अचानक आंबेडकर की विरासत में इतनी दिलचस्‍पी क्‍यों जागी है?

ऐसा इसलिए क्‍योंकि आंबेडकर के बौद्ध बनने के बावजूद उनके बाद धर्म परिवर्तन करने वाले 80-90 फीसद दलित और आदिवासी बौद्ध नहीं बने, उन्‍होंने इस्‍लाम या ईसाइयत को अपना लिया. ईसाइयत क्‍यों? इसलिए क्‍योंकि मिशनरी समता का वादा करती है, अंग्रेजी में शिक्षा देती है और जीवनशैली को सुधारती है.

संघ अब उन्‍हें ईसाइयत से वापस हिंदू धर्म में घर वापसी कार्यक्रम के रास्‍ते लाना चाहता है. इसी के लिए वे आंबेडकर का इस्‍तेमाल कर रहे हैं. उन्‍हें डर है कि अगले 50-60 साल में समूची दलित आबादी ईसाई बन जाएगी. इसी कारण वे आंबेडकर को अपनाने के लिए अधीर हो रहे हैं.

मसलन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश में गांधी और बुद्ध की बात करते हैं लेकिन कभी भी दीनदयाल उपाध्याय या वीडी सावरकर का नाम नहीं लेते क्‍योंकि वहां इन्‍हें कोई जानता ही नहीं है. बुद्ध को हर कोई जानता है. तो सवाल उठता है कि वे बुद्ध को क्‍यों अपनाना चाह रहे हैं? क्‍या वे बौद्ध हैं?

ठीक इसी तरह बुद्ध और गांधी के बाद यूरो-अमेरिकी देशों में आंबेडकर तीसरे सबसे लोकप्रिय भारतीय विचारक हैं. पश्चिम में छुआछूत के सवाल को बहुत खराब माना जाता है. इस बारे में संयुक्‍त राष्‍ट्र, अमेरिकी कांग्रेस, यूरोपीय संघ और विश्‍व बैंक तक में बहसें हो चुकी हैं. भारत के मध्‍यवर्ग, बुद्धिजीवियों और विश्‍वविद्यालयों में आंबेडकर अब भी बहुत प्रभावी हैं.

क्‍या आप यह कहना चाह रहे हैं कि आरएसएस की सरपरस्‍ती में बीजेपी इतिहास को बदलना चाहती है?


आंबेडकर कोई शिर्डी के साई बाबा नहीं हैं जिनकी मंदिर में पूजा की जाए. उनके बारे में आप झूठी कहानियां नहीं फैला सकते. एनिहिलेशन ऑफ कास्‍ट में उन्‍होंने हिंदू वर्ण व्‍यवस्‍था के खिलाफ खूब लिखा है जहां वे काफी मेहनत से भगवत गीता, राम और कृष्‍ण की विस्‍तृत आलोचना पेश करते हैं. इसे इतनी आसानी से ठिकाने नहीं लगाया जा सकता.

दलितों को लुभाने के लिए चूंकि मुख्‍यधारा की दोनों पार्टियों में जंग छिड़ी है, तो क्‍या इससे समुदाय को कोई लाभ मिल सकता है?

कोई भी रचनात्‍मक बदलाव आने के लिए शर्त यह है कि हिंदू धर्म पहले खुद में सुधार और बदलाव ले आए. आंबेडकर को आज हर राष्‍ट्रीय पार्टी अपनाना चाह रही है, तो अचानक ऐसा लग रहा है कि वे बुद्ध का समकालीन संस्‍करण बन गए हैं वरना 1990 तक किसी को उनकी फि़क्र नहीं थी.

वो तो जनता दल ने सत्‍ता में आने के बाद जब मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया, तब जाकर आंबेडकर हर गांव में, खासकर महाराष्‍ट्र और आंध्र के गांवों में इतनी बड़ी शख्सियत बन गए. आज बीजेपी जिस एजेंडे पर काम कर रही है, आने वाले दिनों में वे गांधी और नेहरू से भी बड़े हो जाएंगे.

इसका जाति-आधारित राजनीति पर क्‍या प्रभाव पड़ेगा?

कांग्रेस को इस हमले से बचने के लिए और दलितों के बीच भरोसेमंद बने रहने के लिए नेतृत्व के स्तर पर अपने नेतृत्‍व के बीच दलितों की भागीदारी बढ़ानी होगी. कांग्रेस के राज में एक दलित राष्‍ट्रपति और एक स्‍पीकर रह चुका है, लेकिन ओबीसी प्रधानमंत्री मोदी की काट के लिए उसे एक दलित प्रधानमंत्री को प्रोजेक्‍ट करना होगा.

आरएसएस की जहां तक बात है, तो उनके ऐतिहासिक पापों को भुलाने के लिए दलितों को उनसे समानता की मांग करनी होगी. मंदिरों और कुओं को कब्‍जाना होगा. यह मांग जल्‍द ही उठेगी.

कुल मिलाकर दोनों पार्टियों को समस्‍याएं झेलनी होंगी. हम सुधारों का स्‍वागत करते हैं, लेकिन उसमें पाखण्‍ड नहीं होना चाहिए. दलित कार्यकर्ताओं को इस पर निगाह रखनी होगी और किसी भी पाखण्‍ड को पूरे जोरशोर से उजागर करना होगा. आगे समाज जो आकार लेने जा रहा है वह अहम होगा और हमारी इस पर लगातार नज़र रहेगी.
First published: 5 December 2015, 7:45 IST
 
सौम्या शंकर @shankarmya

संवाददाता, कैच न्यूज़. राजनीति, शिक्षा, कला, संस्कृति और फोटोग्रॉफी में रुचि.

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