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काला धन वापसी: नरेंद्र मोदी का मिशन इम्पॉसिबल?

राजन कटोच | Updated on: 28 May 2016, 22:02 IST
(कैच न्यूज़)

विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने का विचार आम लोगों के लिए खूबसूरत सपना जैसा हो गया है. विशेषकर 2014 के लोकसभा चुनावों के प्रचार अभियान के बाद. मौजूदा प्रधानमंत्री ने अपने चुनाव अभियान में बार-बार इस मुद्दे को उठाया था.

सरकार ने काला धन वापस लाने के लिए कई कदम उठाए हैं. इनमें काले धन पर एक विशेष जांच दल (एसआईटी) की स्थापना, काला धन अधिनियम पारित करना, विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) एवं धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के प्रावधानों को और अधिक कठोर करना, अघोषित आय के स्वैच्छिक खुलासे के लिए विंडो खोलना, आयकर विभाग की कमर कसना, प्रमुख देशों के साथ दोहरे कराधान से बचाव को व्यवस्थित बनाने के करार और अन्य देशों के साथ कॉमन रिपोर्टिंग स्टैंडर्डस (सीआरएस) पर जोर देना आदि शामिल हैं. लेकिन फिर भी, परिणाम लोगों की अपेक्षाओं के मुताबिक नहीं रहे हैं. ऐसा क्यों हुआ?

कितनी बड़ी समस्या

चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने से पहले उन अनुमानों पर नजर डालना जरूरी है कि भारत का कितना काला धन विदेशों में जमा है. हालांकि इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. जिस अनुमान का सर्वाधिक जिक्र किया जाता है वह एक अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी की वार्षिक रिपोर्ट पर आधारित अनाधिकृत आंकड़ा है. उनका अनुमान है कि वर्ष 2004-13 के दौरान एक दशक में भारत से हर वर्ष 51 अरब डॉलर (लगभग 3.3 लाख करोड़ रुपए) का अवैध वित्तीय प्रवाह विदेशों में हुआ है.

अनुमान है कि अकेले वर्ष 2013 में 83 अरब डॉलर (लगभग 5.39 लाख करोड़ रुपए) विदेशों में भेजे गए. वर्ष 2014 के चुनाव प्रचार अभियान के दौरान और उसके बाद विदेशों में जमा कुल काले धन का एक अनुमानित आंकड़ा 80 लाख करोड़ रुपए का उल्लेख होता रहा है. मोटे तौर पर यह आंकड़ा ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी के अनौपचारिक आकलन के साथ मेल खाता प्रतीत हो रहा है. 

पनामा पेपर्स जैसे लीक और निजी जांच से हुए खुलासों ने विदेशी वित्तीय हितों वाले भारतीयों पर काफी जानकारी उपलब्‍ध करा दी है. निस्संदेह इन सबकी जांच की जा रही है. कर चोरी और आपराधिक कृत्यों की जांच करने वाली एजेंसियां (आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय) कुछ समय से कर चोरी करने वालों की धर-पकड़ में लगी हुई हैं.

हालांकि, इन एजेंसियों को जांच और कानूनी कार्रवाई के बाद भी धन को वापस भारत ला पाने में सफलता नहीं मिल पाई है. उदाहरण के तौर पर पिछले कुछ वर्षों में प्रवर्तन निदेशालय ने स्विटज़रलैंड, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, अमेरिका जैसे देशों में काले धन को वैध बनाने वाले भारतीयों की संपत्ति कानूनी तौर पर जब्त करने का काम किया है. हालांकि इस तरह के मामले भी गिने-चुने हैं, वास्तव में पैसे वापस आना अभी बाकी है.

हकीकत यह है कि जांच एजेंसियां वैश्विक कानूनी सत्ताओं के समक्ष अपनी सीमाओं को जानती हैं. कुछेक मामलों में वे कुछ जानकारी प्राप्त कर सकती हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके पास पीछे हटने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

सरकार की हालिया बड़ी उपलब्धि यह है कि सरकार द्वारा खोली गई अनुपालन खिड़की पर विदेशों में खाते रखने वाले भारतीयों ने वर्ष 2015 में स्वैच्छिक रूप से खुद की 3,770 करोड़ की संपत्ति का खुलासा किया है. यह दर्शाता है कि काले धन की सबसे बड़ी एकल राशि एक लंबे समय बाद "वापस आ रही है". लेकिन अनुमानित वार्षिक निकासी के परिप्रेक्ष्य में इसकी बात की जाए तो यह राशि एक साल में देश से बाहर जा रहे धन के 1% से भी कम है. यह उस राशि (80 लाख करोड़ रु.) का भी बहुत ही तुच्छ अंश है जो कथित तौर पर पिछले कुछ वर्षों में विदेशों में जमा कर दी गई है.

काला धन विदेशों में जमा क्यों है?

आखिर काला धन या इसी तरह का अवैध धन "विदेशों में जमा" क्यों है? ऐसा इस कारण है कि दुनिया के सभी देशों के अमीर लोग अपना धन ऐसी जगह पर रखना चाहते हैं जहां उनके देश की सरकार पहुंचने में नाकाम हो और टैक्स के रूप में उस राशि में हिस्से का दावा न कर पाए. इनमें अमीर देशों के साथ-साथ गरीब देशों के अमीर लोग भी शामिल हैं.

ऐसा इस कारण भी है कि अवैध गतिविधियों में शामिल व्यक्तियों को अवैध रकम रखने के लिए सुरक्षित स्थानों की जरूरत होती है. ऐसे जरूरतमदों की जरूरत को पूरा करने के लिए दुनिया में कई ऐसे स्‍थान मौजूद हैं. अन स्थानों पर पैसा या संपत्ति को जमा किया जा सकता है. ये आम तौर पर ऐसे 'टैक्स हैवन' हैं जहां टैक्स की दरें लगभग नाममात्र की होती हैं.

बैंक गोपनीयता उपलब्‍ध कराते हैं और साथ में जमा की गई राशि के बारे में ज्यादा पूछताछ भी नहीं करते. लोग और कंपनियां आसानी से पंजीकरण करवा लेती हैं. वह भी ऐसा कोई सवाल पूछे बिना कि इन खातों या कंपनियों के अंतिम या लाभ पाने वाले मालिक कौन हैं. आश्चर्यजनक रूप से ऐसे अधिकार क्षेत्रों की बड़ी संख्या अमीर और आर्थिक रूप से अधिक शक्तिशाली देशों से जुड़ी है जैसे ब्रिटेन, अमेरिका, स्विट्जरलैंड, हांगकांग आदि. यह मौजूदा वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का हिस्सा हैं और लंबे अरसे से ऐसा करते आ रहे हैं.

साथ ही, ये देश दिखावा करते हैं कि वे इन टैक्स हैवन में आने वाले अवैध धन के शोधन को लेकर वे बेहद सजग हैं, विशेष रूप से आतंकवाद से जुड़े धन के संबंध में. फाइनेंशियल एक्‍शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) के रूप में एक पश्चिमी देशों की बहुलता वाले समूह ने एक पहल की गई है ताकि इन चिंताओं को दूर किया जा सके और काले धन को वैध बनाने वाले टैक्स हैवन पर शिकंजा कसा जा सके.

इस काम में सहयोग न करने वाले देशों (जैसे कि ईरान, उत्तर कोरिया आदि) को काली सूची में डालने का भी प्रावधान किया गया है. हालांकि टैक्स हैवन माने जाने वाले लेकिन एफएटीएफ में हावी प्रमुख शक्तियों द्वारा नियंत्रित इन क्षेत्रों को काली सूची में डालना मुश्किल प्रतीत होता है.

ये है रास्ता

हमारी तरह अमीर देश भी अपने नागरिकों द्वारा राष्ट्रीय कर बचाकर अपना धन टैक्स हैवन माने जाने वाले अधिकार क्षेत्रों में जमा करने पर चिंतित होते हैं. वे भी इस तरह के मामलों का पता लगाने और धन वापस लाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करते हैं. इन प्रयासों की सफलता संबंधित देश की अंतरराष्ट्रीय ताकत पर निर्भर करती है.

सबसे उत्कृष्ट मामला अमेरिका का है, जो विश्व स्तर पर आर्थिक महाशक्ति है. उसने स्विटज़रलैंड के यूबीएस और क्रेडिट सुइस पर सफलतापूर्वक दबाव डाला, उन पर भारी जुर्माना लगाया और उन्हें अमेरिकी खाता धारकों की जानकारी देने के लिए बाध्य कर दिया. यह सब उसने लम्बे समय से मौजूद स्विस बैंकिंग गोपनीयता कानूनों के बावजूद कर दिखाया.

उसने एकतरफा कानून बनाया है जिसका नाम फॉरेन अकाउंट टैक्स कंप्लायंस एक्ट रखा है. एकतरफा होने के बावजूद ज्यादातर देश इसे लागू करने पर सहमत हो गए हैं, जिनमें भारत भी शामिल है.

यह कानून संयुक्त राज्य अमेरिका को विदेशी वित्तीय संस्थानों में अमेरिकी खाता धारकों के बारे में जानकारी की मांग का अधिकार दे देता है, वह भी अमेरिका के वित्तीय संस्थाओं पर ऐसी जानकारी देने की पारस्परिक बाध्यता के बिना. यह सब सिर्फ इसलिए संभव है क्योंकि वैश्विक वित्त में अमेरिका की भागीदारी और महत्व बहुत ज्यादा है. गैर-अमेरिकी वित्तीय संस्थान सिर्फ इन नियमों का अनुपालन न करने के कारण अमेरिका द्वारा वर्जित या काली सूची में डाला जाना झेल नहीं सकते.

दुर्भाग्य से यह विकल्प भारत सहित अधिकांश देशों के लिए कोई विकल्प नहीं है. इसीलिए सरकार द्वारा बहुपक्षीय विकल्पों पर काम करना उचित ही है. यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ अमेरिका के एफएटीसीए जैसे कॉमन रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड (सीआरएस) को हकीकत बनाने के लिए भारत जी-20 में सक्रिय हो चुका है.

सीआरएस के तहत उन देशों के बीच खातों से संबंधित जानकारी का स्वत: आदान-प्रदान हो सकेगा, जो इस पर हस्ताक्षर करेंगे. यह सीआरएस 2017-18 से अस्तित्व में आ जाएगा. इस पर लगभग एक सौ देशों ने हस्ताक्षर किए हैं, जबकि लगभग एक सौ ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि सीआरएस एक कदम आगे की चीज है. काले धन को वैध बनाने से रोकने के एफएटीएफ जैसे अन्य बहुपक्षीय प्रयासों में सीआरएस एक और कड़ी है. हालांकि इस प्रयास की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं.

क्या इस तरह के बहुपक्षीय प्रयासों से भारत अपने नागरिकों के विदेशों में स्थित खातों को पहचान कर उनकी जानकारी ले पाएगा? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि वर्तमान टैक्स हैवन व्यवस्‍था से अंतरराष्ट्रीय वित्त पर हावी वैश्विक शक्तियां ही सबसे अधिक लाभ उठा रही हैं, तो वे बदलाव क्यों चाहेंगी?

टैक्स हैवन में अधिक से अधिक पारदर्शिता के लिए पेशेवर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता और कई सकारात्मक पहलों के बावजूद वैश्विक वित्तीय ढांचे में इतनी जल्दी बदलाव की संभावना नहीं है. हमारी ताकत बेहद सीमित है.

टैक्स हैवन माने जाने वाले देश निकट भविष्य में गायब नहीं होने वाले. दुनिया के अमीरों के लिए अपने धन को आसानी से छिपा कर रखने के रास्ते अभी खुले रहेंगे. इसी तरह, हम कितनी भी कोशिश कर लें, ऐसी स्थिति की कल्पना करना भी मुश्किल है जिसमें भारतीय नागरिकों का कथित विदेशों में जमा काला धन वापस लाने की कोशिशें जल्द सफल हो जाएंगी. ये प्रयास तो अभी सागर में बूंद के समान ही प्रतीत हो रहे हैं.

First published: 28 May 2016, 22:02 IST
 
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