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क्यों बढ़ रहा है पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव?

बद्री नारायण | Updated on: 15 December 2015, 18:36 IST
QUICK PILL
\'\'पिछले कुछ सालों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं बढ़ती जा रही है. सैकड़ों सालों से साथ रह रहे हिंदू जाट और मुले जाट अब भाई-भाई की जगह दुश्मन बनते जा रहे हैं. दोनों समुदाय इसकी वजह राजनीति को मानते हैं.\'\'

2013 में 'मोहब्बत की नगरी' के नाम से जाने वाला शहर मुजफ्फरनगर भयंकर सांप्रदायिक हिंसा का गवाह बना. इस साल सात सितंबर को दादरी में मोहम्मद अखलाक नाम के ग्रामीण को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला. लोगों को शक था कि अखलाक ने फ्रिज में गोमांस रखा है. हाल में ही अलीगढ़ और मेरठ में दो समुदायों के बीच दिवाली में पटाखे जलाने के कारण तनाव पैदा हो गया.

इन घटनाओं से साफ संकेत मिल रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की स्थिति विस्फोटक होती जा रही है और यह कभी भी सांप्रदायिकता की आंच में झुलस सकता है. यहां दो महत्वपूर्ण सवाल पूछे जाने की जरूरत है: ये स्थिति यहां तक कैसी पहुंची? क्या यह आग पूर्वी उत्तर प्रदेश तक भी जा सकती है?

भाई-भाई दुश्मन कैसे हो गए?


पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाट हिंदू और मुले जाट ( मुस्लिम जाट) प्रभावशाली समुदाय है. ऐतिहासिक रूप से दोनों एक ही समुदाय से है. ऐसा माना जाता कि दिले सल्तनत और मुगलकाल में मुले जाट समुदाय ने इस्लाम धर्म को अपना लिया. इस क्षेत्र में ऐसे कई गांव है जहां पर मुख्यत: मुले जाट रहते हैं और उनका जीवन मूलत: खेतीबारी पर निर्भर है. इसमें से कुछ बड़े भूस्वामी है. पशुपालन और मुर्गी पालन आजीविका के अन्य साधन है.

चौधरी चरण सिंह ने मजगर (मुस्लिम, अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत) जातियों को मिलाकर ऐसा सियासी ताना बाना बुना जो उन्हें उत्तर प्रदेश की सत्ता दिलवाने में कामयाब रही. यह गठबंधन विशेष तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कामयाब रहा. इस क्षेत्र को हरित क्रांति का फायदा मिलने से यहां के लोगों की माली हालत भी ठीक-ठाक है.

औरंगजेब के शासनकाल में जाट समुदाय के कई लोगों ने धर्म परिवर्तन कर लिया था

मुसलमानों में मुख्यत: मुले जाट ही चौधरी चरण सिंह के समर्थक रहे हैं. लेकिन राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान यह गठजोड़ टूट गया. छह दिसंबर 1992 को हुए बाबरी विध्वंस के बाद इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे हुए. करीब 2000 लोगों की हत्या हुई. इस घटना ने बंटवारे के समय हुई हिंसा की याद ताजा कर दी थी.

यहां के स्थानीय निवासी राजबीर का कहना है, औरंगजेब के समय जाट बिरादरी के कई लोग धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम बन गए.

उन्होंने बताया, ''आज भले ही आपस में कट्टर दुश्मन बन बैठे हैं लेकिन सच तो यह है हम आपस में भाई है. हमारे पूर्वज एक ही थे. हमलोग डागर है और खिड़की गांव के सैफुद्दीन डागर भी इसी कुल गोत्र के हैं. वे हमारी पंचायतों में भी हिस्सा लेेते हैं. हमलोग उनके यहां शादी और अन्य अवसरों पर जाते हैं. और वे लोग विशेष तौर पर हमारे लिए शाकाहारी भोजन का इंतजाम करतेे हैं.''

हालांकि वे इस बात पर अफसोस जताते हैं कि अब रिश्ते खराब हो गए हैं. वे कहते हैं, ''अब भाई दुश्मन बन गए हैं.'' इसकी वजह पूछने पर वो सिर्फ एक शब्द कहते हैं, 'राजनीति'.

सांप्रदायिक राजनीति से बिगड़ रहा आपसी सद्भाव


एक स्तर पर एक जगह रहने वाले अलग-अलग समुदाय के लोगों में प्रेम और सौहार्द बचा हुआ है. लेकिन एक जलन की भावना भी है जिन्हें सांप्रदायिक ताकतें भुना रही है.

हालांकि, बड़े-बूढ़ों का कहना है कि बंटवारे के दशकों बाद भी विभिन्न समुदायों के बीच भाईचारे का माहौल बना हुआ था लेकिन सच तो यह कि धार्मिक विद्वेष का बीज उसी समय पड़ चुका था.

यह वही समय था जब हिंदूवादी संगठन जैसे विहिप, आरएसएस ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पांव पसारना शुरू किया. इनके अलावा राष्ट्रवादी प्रताप सेना जैसे छोटे-छोटे समूह भी सक्रिय होने लगे.

इनकी गतिविधियों ने इन दोनों समुदायों के बीच दूरियां बढ़ाने का काम किया. इनके बीच ऐतिहासिक दुश्मनी की कहानी को फैलाया गया. जिन जाटों ने धर्म परिवर्तित कर लिया था उनका अपमान किया गया और उन्हें पिछड़ा और अशुद्ध महसूस कराने की कोशिश की गई.

ऐसे संगठन जिला मुख्यालयों, छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक फैलने लगे. गांव के मंदिर उनके जमावड़े के प्रमुख केंद्र बन गए. यह संयोग नहीं हो सकता कि अखलाक को मारने से पहले लोग मंदिर के पास ही जमा हुए थे.

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद यहां हुए दंगों में करीब 2000 लोग मारे गए

ऐसे संगठन लोगों को इकट्टा करने के लिए घर वापसी, गौहत्या, लव जिहाद, बेटी की इज्जत जैसे नारे लगाते हैं.

गौहत्या एक ऐसा भावनात्मक मुद्दा है जो राम राज्य परिषद, विहिप और आरएसएस जैसे संगठनों के द्वारा मुख्य रूप से सांप्रदायिक सोच बढ़ाने में इस्तेमाल हो रहा है.

हमने 2005 में मुजफ्फरनगर में विहिप के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था. ऐसे लोकगीतों के माध्यम से गौहत्या के खिलाफ नफरत फैलाई जा रही थी.

ये संगठन भेदभाव बढ़ाने के लिए पर्चा, पोस्टर और जातियों की पहचान और इतिहास पर बहस जैसे अन्य तरीके भी अपनाते हैं.

पूर्वी उत्तर प्रदेश में नाकामयाब हो गई सांप्रदायिक राजनीति

महंत आदित्यनाथ की हिंदू युवा वाहिनी, विहिप की रक्षा समिति, और आरएसएस जैसे हिंदू संगठन अपनी मौजदूगी के बावजूद पूर्वी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक नफरत फैलाने में नाकामयाब रहे हैं. आखिर ऐसा क्यों?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी 25.89 फीसदी है.

इनमें से कई जमीन वाले किसान है और आर्थिक व सियासी रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की तुलना में अधिक मजबूत है.

इस क्षेत्र में मुसलमानों की बड़ी आबादी खेती के अलावा रोजगार के कई क्षेत्रों में लगी हुई हैं. कई मुसलमान लकड़ी और धातु के कामों में लगे हुए है जिससे उनके यहां आर्थिक संपन्नता आई है. ये सब बातें स्वाभाविक रूप से प्रतिस्पर्धी समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देती हैं.

मुसलमानों के पारंपरिक काम अब हिंदू भी करने लगे है

खेती-किसानी से कमाई पूंजी को हिंदू जाटों ने शहरों में ताला, तांबा और लकड़ी के कारखानों में निवेश किया. पारंपरिक रूप से ये काम मुसलमानों के हिस्से था और हिंदूओं के इस क्षेत्र में आने से प्रतिस्पर्धा बढ़ गई. बीजेपी विधायक संगीत सोम जैसे जाट तो ऐसे पेशों में भी घुस गए जो विशेष तौर पर मुसलमानों के जिम्मे थे. मीट का कारोबार भी इसमें शामिल है.

मुजफ्फरनगर दंगों में भी अपनी कथित भूमिका को लेकर सोम भी मुख्य आरोपी है. जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने सच ही कहा है कि यूपी में मीट का कारोबार करने वाले 90 फीसदी हिंदू है.

हिंदू और मुसलमानों के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा पूर्वी उत्तर प्रदेश की तुलना में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुत ज्यादा है. और यह अक्सर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दंगों के रूप में परिलक्षित होता है.

First published: 15 December 2015, 18:36 IST
 
बद्री नारायण @CatchNews

The writer is a Social Historian and Cultural Anthropologist and currently Professor at the G.B. Pant Social Science Institute, Allahabad.

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