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बजट 2017: एससी/एसटी के लिए ज्यादा आवंटन क्या सिर्फ समझा का धोखा है?

प्रणेता झा | Updated on: 5 February 2017, 7:56 IST

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वर्ष 2017 का बजट पेश करते समय अनुसूचित जाति के कल्याण के लिए बजट आवंटन में 35 फीसदी और अनुसूचित जनजाति के लिए 30 फीसदी की वृद्धि की है. वह इस वृद्धि पर गर्व कर सकते हैं, पर नेशनल कम्पैन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स (एनसीडीएचआर) द्वारा कराए गए एक विश्लेषण में दावा किया गया है कि यह भाजपा सरकार का छल है.

विशेषज्ञों का कहना है कि बजटीय आवंटन में यह प्रत्यक्ष वृद्धि योजनागत/गैर योजनागत को एक कर देने से दिखती है जिसके तहत जनरल आइटम्स का बजट एससी/एसटी योजनाओं के तहत रखा गया है और फंड को बमुश्किल ही एक मद से दूसरे मद में स्थानान्तरित किया जा सकता है. 

जेटली ने इस साल एससी के लिए बजटीय आवंटन 52,393 करोड़ रुपए कर दिया है जो वर्ष 2016-17 में 38,833 करोड़ रुपए था. इसी तरह एसटी के कल्याण के लिए भी आवंटन बढ़ाया गया है. पहले यह 24,005 करोड़ रुपए था जिसे बढ़ाकर 31,295 करोड़ रुपए किया गया है.

लेकिन यह जो बजटीय आवंटन बढ़ा है, वह वाकई में एससी/एसटी समुदायों को ध्यान में रखकर नहीं किया है. इसमें जनरल स्कीम्स भी शामिल हैं जैसे कि कालेज अध्यापकों के लिए पेंशन और वेतन में वृद्धि आदि.

योजनाओं का विलय

एनसीडीएचआर से जुड़े एन पॉल दिवाकर कहते हैं कि वास्तव में एससी/एसटी के लिए कुल योजनाओं की 51 फीसदी फंडिंग सामान्य योजनाओं के साथ/सीधे तौर पर विलय कर दी गई है. महत्वपूर्ण तो यह है कि यह बजट एससी/एसटी के कल्याण के

लिए सब-प्लान के वास्ते निर्धारित नीतियों को बदलने का उदाहरण को दर्शाता है. वह कहते हैं कि शेड्यूल कास्ट सब-प्लान (एससीएसपी) और ट्राइबल सब-प्लान (टीएसपी) के लिए बजटीय आवंटन को क्रमश: 'अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए आवंटन' (अंडर स्टेटमेन्ट 10ए) और अनूसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए आवंटन (अंडर स्टेटमेन्ट 10बी) में रखा गया है.

एनसीडीएचआर के बयान में कहा गया है कि यह कदम मुख्यमंत्रियों की कमेटी द्वारा सुझाए गए उपायों के बावजूद उठाया गया है. सन् सत्तर के दशक में एससी/एसटी के लिए सब-प्लान शुरू किया गया था. इसके तहत मंत्रालयों और विभागों को अपनी आबादी के अनुपात में दलित और आदिवासियों के कल्याण के लिए राशि खर्च करनी थी. वर्तमान में यह प्रतिशत

क्रमश: 16.6 और 8.6  है.

एनसीडीएचआर के बयान में यह भी कहा गया है कि इस बजट में भी दलित और आदिवासियों के लिए अलग से आवंटन दर्शाने वाले अनुसूचित जाति सब प्लान और अनुसूचित जनजाति सब प्लान की मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी. यह बात अलग

है कि इस बजट में अनुसूचित जाति के लिए कुल बजटीय खर्च का केवल 2.5 फीसदी और अनु.जनजाति के लिए केवल 1.53  फीसदी कुल आवंटन रखा गया है.

यह राशि जाधव कमेटी द्वारा अनिवार्य बनाई गई आधी राशि भी नहीं है. जाधव कमेटी के दिशा-निर्देशों के अनुसार यह राशि अनुसूचित जाति के लिए कुल बजटीय आवंटन का कम से कम 4.63  फीसदी और अनु. जनजाति के लिए 2.39 फीसदी

होनी चाहिए.

एनसीडीएचआर के बयान के अनुसार योजनागत और गैर योजनागत के विलय किए गए परिदृश्य में जाधव कमेटी के दिशा-निर्देशों के अनुपालन में कुल बजटीय आवंटन में अनु.जाति सब प्लान के लिए न्यूनतम 4.63  फीसदी और ट्राइबल सब प्लान के लिए 2.39  फीसदी ही किया गया है.

योजनाएं घटी भीं

वास्तव में देखा जाए तो दलितों और आदिवासियों के लिए योजनाएं भी कम की गईं है. दलितों के लिए योजनाएं घटाकर 256 और आदिवासियों के लिए 261 कर दी गई हैं, जबकि वर्ष 2016-17 में इनके लिए योजनाओं की संख्या क्रमश: 294 और 307 थीं. इस साल अनुसूचित जातियों के लिए 11 और अनु.जनजातियों के लिए 8 नई योजनाएं लागू की जानी हैं.

अनुसूचित जातियों/अनु. जन-जातियों के लिए योजनाएं या तो खत्म कर दी गई हैं अथवा उनके मद में धन आवंटन में कटौती कर गई है. उदाहरण के लिए इस साल बंधुआ मजदूर पुनर्वास योजना का स्वरूप बिगाड़ दिया गया है जबकि मेहतरों के लिए पुनर्वास योजना में धन आवंटन आश्चर्यजनक रूप से कम कर दिया गया है. इस समय राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम की फंडिंग में भी भारी कटौती की गई है.

जहां तक उच्च शिक्षा का सवाल है तो आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले अभय शाशा कहते हैं कि एससी/एसटी छात्रों को दी जाने वाली पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप (पीएमएस) जारी नहीं की गई है जिसका फायदा लाभान्वितों को नहीं मिल सका है. एससी छात्रों के लिए 8,000 करोड़ रुपए जबकि एसटी छात्रों के लिए 2,500 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि बकाया पड़ी हुई है. इस साल के बजट में इस राशि का कोई लेखा-जोखा नहीं है.

अभय कहते हैं कि पीएमएस की दूसरी और तीसरी किस्त अभी भी बकाया है. राशि न मिलने के कारण बड़ी संख्या में छात्रों ने स्कूल आना बंद कर दिया है. एनसीडीएचआर ने पीएमएस के तहत 12,000 करोड़ रुपए की बैकलॉग राशि को अविलम्ब जारी किए जाने की मांग की है.

शाशा यह भी कहते हैं कि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में दो सेन्ट्रल ट्राइबल यूनीवर्सिटी बनाए जाने की घोषणा की गई है जबकि हास्यास्पद तरीके से उसके लिए बहुत ही कम केवल 01 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं. 

खर्च भी घटा

पिछले साल स्टार्ट-अप प्रोग्राम के तहत अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों में उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग 500-500 करोड़ रुपए का बजट में आवंटन किया गया था, पर उसमें से केवल 500 करोड़ रुपए ही खर्च किए जा सके हैं.

एनसीडीएचआर से जुड़े प्रो. विमल थोराट कहते हैं कि हमारे समुदाय में आदिवासी और दलित महिलाएं सर्वाधिक उपेक्षित हैं. ऐसे में एससी/एसटी कल्याणकारी योजनाओं के तहत दलित महिलाओं के लिए आवंटन में सिर्फ 1.19 फीसदी और आदिवासी महिलाओं के लिए 1.68 फीसदी की ही वृद्धि की गई है. 

फोरम ने मांग की है कि इस साल के बजट में एससी और एसटी के उत्थान के लिए जो बजटीय आवंटन किया गया है, उसे फिर से बदले जाने की जरूरत है ताकि तय लक्ष्यों को हासिल किया जा सके.

एनसीडीएचआर ने यह भी मांग की है कि शेड्यूल कास्ट सब-प्लान (एससीएसपी) और ट्राइबल सब-प्लान (टीएसपी) को केन्द्र से अधिनियमित कराया जाए ताकि विश्वसनीयता, सहभागिता और पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके.

First published: 5 February 2017, 7:56 IST
 
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