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पांच राज्यों के चुनाव से ठीक पहले आया राजनीतिक बजट

कमल मित्र चिनॉय | Updated on: 2 February 2017, 8:26 IST
(कैच न्यूज़)

अरुण जेटली के सामने कठिन चुनौती थी. उन्हें नोटबंदी के तुरंत बाद ऐसे समय में बजट पेश करना था जब एनडीए के लिए कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव सिर पर हैं. ऐसे समय में वित्त मंत्री को एक ऐसी राजनीतिक-आर्थिक नीति पर सकारात्मक गुगली डालनी थी जिसकी व्यापक रूप से आलोचना की जा रही है. इसलिए उन्होंने नोट बैन को एक साहसी और निर्णायक कदम बताते हुए उसकी सराहना की. 

उन्होंने यह भी बताया कि आईएमएफ ने भारत की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में सराहना की है. पर यह तो नोटबंदी से पहले की बात थी. लेकिन आईएमएफ का उल्लेख कर वित्त मंत्री खुद को द इकनॉमिस्ट, फोर्ब्स, द न्यूयॉर्क टाइम्स, द टाइम्स और कई अर्थशास्त्रियों जैसे हॉर्वर्ड के लॉरेंस समर, वर्ल्ड बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बसु, अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कृत अर्थशास्त्री बेंग्ट हॉलस्ट्रॉम समेत अनेक अन्य जानकारों की सख्त आलोचनाओं के समक्ष खुद को खड़ा कर रहे थे.

जेटली ने नोटबंदी की तारीफ करते हुए कहा कि यह लड़ाई कालेधन के खिलाफ थी, आतंकवाद और भ्रष्टाचार के विरुद्ध थी. इसे लोगों का भारी समर्थन हासिल हुआ. अधिकांश सर्वे विशेषज्ञ और कई पत्रकार इस बात से शायद ही सहमत हों. लेकिन एनडीए ने सारे आर्थिक विमर्श को जिस तरह से डिजिटल इकनॉमी और कैशलेस इकनॉमी की ओर ले जाने की जो कोशिश की वह भी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं है. 

अंतर्विरोध

वित्त मंत्री ने डिजिटेलाइजेशन की ओर इस शिफ्ट की भी तारीफ की. हालांकि इस स्टेटमेंट की अभी पुष्टि होना शेष है. बजट यह दावा करता है कि डिमोनेटाइजेशन से लंबे समय में फायदा होगा. इसके साथ ही यह भी कहा गया कि अगले वित्तीय वर्ष पर इसका कोई असर नहीं आएगा. यह वक्तव्य अपने आप में अंतर्विरोधी है. अगर नोटबैन दीर्घ अवधि में फायदेमंद है तो इसका अर्थव्यवस्था पर भी सकारात्मक दीर्घकालिक असर दिखना चाहिए.

अधिक गहरी समस्या है कार्ड मशीन की, जो कि कुछ लाख ही उपलब्ध कराई जानी हैं. डिजिटल अर्थव्यवस्था, जिसे कि पहले कैशलेस कहा जा रहा था, को बढ़ावा देने के लिए कॉर्ड मशीन और क्रेडिट कॉर्ड/डेबिट कॉर्ड की यह गतिविधि निश्चित रूप से काफी नहीं कही जा सकती. 

इसमें कई दूसरी अड़चनें भी हैं जैसे कि ऐसे गांवों और शहरों की बड़ी संख्या जहां कि 24 घंटे बिजली नहीं रहती है. मोबाइल फोन और दूसरे अन्य उपकरणों को चार्जिंग की जरूरत होती है. इस समस्या को भी ठीक से संबोधित नहीं किया गया है. यहां उस अनिवार्य पक्ष की तो अभी चर्चा ही नहीं की जा रही है कि प्लास्टिक कॉर्ड की सीमा खत्म होने के बाद फुल पैमेंट तो नकद में ही किया जाना है.

मनरेगा के पेंच

ग्रामीण गरीबों के लिए काफी महत्वपूर्ण बन चुकी मनरेगा योजना के लिए इस बार बजट में 48,000 करोड़ आवंटित किए गए हैं. वित्त मंत्री ने कहा कि इस मद में यह अब तक किया गया सबसे बड़ा आवंटन है. लेकिन यूपीए-1 के ही समय से इस योजना की बड़ी समस्या यह है कि इसमें मासिक भुगतान काफी देर से आता है. 

ग्रामीण लोगों में इतने समय तक रुकने की क्षमता नहीं होती है. अगर उनका पैसा देर से आता है तो वे दूसरे काम की खोज में कहीं और निकल जाते हैं और इस तरह अपने मेहनताने से वंचित हो जाते हैं. पर दुर्भाग्य से वित्त मंत्री ने इस समस्या को दुरस्त नहीं किया.

अनौपचारिक अर्थव्यस्था से औपचारिक अर्थव्यवस्था की ओर जाने का एनडीए का तरीका और भी अनर्थकारी नीति है. नकदी पर चलने वाला अनौपचारिक सेक्टर एक बड़ा रोजगार निर्मित करने वाला क्षेत्र है. कारीगर, कारपेंटर, मोची, वेल्डर्स ये सभी इसी अनौपचारिक अर्थव्यस्था के ही भाग हैं. वित्त मंत्री जो कुछ भी सोचते हों, कोई भी 21 वीं शताब्दी के एक सेक्टर को 22वीं शताब्दी में नहीं ले जा सकता. न तो यह संभव है और न ही सकारात्मक.

बजट पर होने वाली चर्चाओं में यह भी बार—बार कहा गया है कि अब खर्च और आवंटन को योजनागत और गैरयोजनागत में बांटने की जरूरत नहीं है. प्लानिंग के पीछे विचार यह होता है कि आर्थिक नीतियों को सामाजिक-आर्थिक दशाओं के अनुसार समायोजित किया जाए, जिससे बिना तैयारी के निर्णय लेने की जरूरत ही न पड़े. पर एनडीए किसी प्लानिंग में भरोसा नहीं करती. अब तो वह व्यापक सांकेतिक सूचकों को भी छोड़ती जा रही है.

विदेशी निवेश को न

वित्तमंत्री ने यह घोषणा कर दी कि 1991 में स्थापित किए गए विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड को खत्म किया जा रहा है. अब विदेशी निवेश को बढ़ावा देने संबंधी कोई दिशा—निर्देश नहीं होंगे. कॉरपोरेट खुद अपने निवेश संबंधी निर्णय लेंगे. यह कोई स्मार्ट अर्थशास्त्र नहीं कहा जा सकता. नवीनतम प्रोद्योगिकी का आयात सुनिश्चित करने और एक ही वस्तु के बार-बार आयात को रोकने के लिए कुछ मोटे-मोटे दिशा-निर्देश जरूरी होते हैं. अभी तो वित्त मंत्री नहाने के पानी के साथ बच्चे को भी बाहर फेंक रहे हैं. भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए कुछ सांकेतिक आयोजना जरूरी है. यहां भाषणबाजी तर्क की जगह नहीं ले सकती. 

कई प्रकार के लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं. ग्रामीण विद्युतीकरण के लिए 19000 करोड़ आवंटित किए गए हैं. यह कहा गया है कि 2018 तक विद्युतीकरण का काम 100 प्रतिशत पूरा हो जाएगा. यह एक मुश्किल लक्ष्य दिखता है. इस तरह का कोई विस्तृत सर्वे नहीं सामने रखा गया है जिससे यह पता लग सके कि इतने व्यापक इलेक्ट्रिकल ग्रिड के नेटवर्क को कैसे बिजली आपूर्ति जा सकती है. यहां तक आज भी कई बड़े शहरों में 24 घंटे बिजली की आपूर्ति नहीं हो रही है. ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या और भी गंभीर है. 

गरीबों के लिए वित्त मंत्री ने बहुत बड़ी राशि 98 लाख करोड़ का प्रावधान किया है. पर इसका विस्तृत ब्योरा जो कि अभी वित्त मंत्री और अन्य मंत्रियों को देना है, उसका परीक्षण किया जाना होगा. यह महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले वित्त वर्ष में कृषि में 4.8 की धीमी वृद्धि दर दर्ज की गई है. उम्मीद है कि नीति आयोग और दूसरी अन्य संस्थाएं नॉबार्ड के साथ मिलकर ग्रामीण और कृषि के लक्ष्य हासिल करने दिशा में काम करेंगी.

गुजरात में एम्स क्यों

इसके अलावा कुछ और आवश्यक चीजें हैं. बजट में दो नए एम्स की स्थापना की बात कही गई है. इसमें से एक झारखंड में खोला जाना है तो दूसरा गुजरात में. झारखंड में खोला जाना तो एक बेहतर कदम है. पर दुर्भाग्य से दूसरा एम्स गुजरात को दिया गया है. झारखंड के विपरीत गुजरात एक संपन्न राज्य है. बेहतर होता कि दूसरा एम्स भी किसी पिछड़े राज्य में खोला जाता. पर प्रधानमंत्री ने संभवत: तय किया कि उनके राज्य को बेहतर मेडिकल सुविधाएं मिलना चाहिए. यह पहली बार नहीं है कि जब ऐसा कुछ हुआ है.

सार यह कि, यह एक राजनीतिक बजट है, जिसे बजट सेशन के टाइम पर लाया गया है. इसमें वादों और अनुमानों की झड़ी लगाई गई है. डिजिटल इकनॉमी कहीं भी परिदृश्य में नहीं हैं. डिमानेटाइजेशन का असर अब भी अर्थव्यवस्था पर देखा जा सकता है. पर एनडीए की राजनीति और अर्थनीति को देखते हुए वित्तमंत्री ने नई इबारत लिखने के लिए पुरानी इबारत को मिटाने की जरूरत नहीं समझी या उन्होंने नीति के मोर्चे पर बहुत सारे विकल्प पेश कर दिए हैं.

First published: 2 February 2017, 8:26 IST
 
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