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50 दिन बाद कहा पहुंची सरकार: बुंदेलखंड में दुनिया उम्मीद पर कायम है

वरीशा सलीम | Updated on: 28 December 2016, 8:09 IST
(अक्षय गुप्ता/गेटी इमेजेज़)
QUICK PILL
आज से ठीक 50 दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में नोटबंदी की घोषणा की थी. इसके बाद पूरे देश में एक असमंजस और अनिश्चय का वातावरण बन गया था. प्रधानमंत्री ने उस वक्त 50 दिन की मोहलत मांगी थी. तब कैच न्यूज़ के रिपोर्टरों ने हाट, बजारों, गांवों, लेबर चौराहों से लेकर लोगों के घरों का दौरा किया था. आज 50 दिन बाद उन स्थानों पर क्या परिवर्तन आया यह जानने के लिए बार फिर से हम उन्हीं स्थानोंं का दौरा कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच फैला बुंदेलखंड का इलाका. लगभग 80 लाख की आबादी वाले इस इलाके की बड़ी आबादी किसानी पर निर्भर है. बड़े किसान, मझोले किसान और वो किसान भी जिनके पास अपनी जमीन नहीं है वो या तो बटाई की जमीन जोतते हैं या फिर दिहाड़ी मजदूर के तौर पर खेतों, खदानों में काम करते हैं.

नोटबंदी के फैसले को 50 दिन पूरे होने वाले हैं. 8 नवंबर की रात प्रधानामंत्री ने देश को भरोसा दिलाया था कि 50 दिन में हालात सुधर जाएंगे. बैंक, एटीम सामान्य हो जाएंगे और जितनी जरूरत होगी कैश मिलने लगेगा. मगर 50 दिन पूरा होने की वह घड़ी आ गई है और ज़मीन पर हालात बदले हुए नज़र नहीं आ रहे. 

बांदा के समाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर कहते हैं, ‘पचास दिन पूरे होने वाले हैं लेकिन यहां बहुत कुछ नहीं बदला है. गरीब अभी भी कैश के लिए बैंकों की क़तार में हैं. महोबा की पत्थर मंडी के तकरीबन तीन हज़ार दिहाड़ी मजदूर 25 दिनों से खाली बैठे हैं. इतने दिनों से दिहाड़ी मजदूरों के पास कैश नहीं है. मुमकिन है कि 50 दिन में दिल्ली, मुम्बई जैसे शहरों के हालात बदल जाएं लेकिन बुन्देलखंड के लिए ऐसी उम्मीद रखना बेवकूफी है.' बुंदेलखंड में हालात इसलिए भी फ़ौरन नहीं बदल सकते क्योंकि यहां बैंकिंग व्यवस्था पहले से कमज़ोर है. 

बिजली है नहीं और कैशलेस के सपने?

झांसी के शिव नारायण परिहार ज़िले की तहरौली तहसील में तीस गांव के किसान 12 दिन से भूख हड़ताल में शामिल हैं. सभी सिंचाई के लिए बिजली की मांग कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘दिल्ली की सरकार देश को कैशलेस बनाने में लगी है और यहां सिंचाई के लिए बिजली तक नहीं मिल रही'.

शिव नारायण कहते हैं, ‘सरकार है, वो कोई भी फैसला कर सकती है और लोगों को उस हिसाब से जीना सीखना पडेगा. बस यही हो रहा है. बुंदेलखंड के किसान इस नई व्यवस्था को समझने की कोशिश कर रहे हैं. इसके अलावा किसी के पास कोई रास्ता भी तो नहीं है.’ नारायण परिहार की बातों में एक लाचारी साफ़ झलकती है. 

महोबा के शफीक अहमद गांव में किराना स्टोर चलाते हैं जिनका कारोबार लगातार बिगड़ता जा रहा है. वह बताते हैं, ‘नोटबंदी के बाद से सामान ले जाने वाले रुपयों की बजाय अनाज दे देते हैं. मैंने भी मना नहीं क़िया. सौदा भी बेचना था और सारे के सारे ग्राहक मेरे जान-पहचान वाले ही हैं तो उन्हें मना कराना सही नहीं है.’ 

शफीक कहते हैं, ‘बीते 25 दिन में इतना अनाज जमा हो चुका है कि उसे बेचकर कैश निकालना मुश्किल काम है. मंडी बार-बार जाऊं तो यहां दुकान बंद करना पड़ता है. नहीं बेचूंगा तो अनाज रखूंगा कहां? शफीक़ कहते हैं कि बस हालात बेहतर होने की उम्मीद ही कर सकते हैं. इसके अलावा हमारे पास क्या चारा है. 

First published: 28 December 2016, 8:09 IST
 
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