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बुंदेलखंड सूखे का केंद्र है, लेकिन लोगों को पता तक नहीं हैः योगेंद्र यादव

निहार गोखले | Updated on: 15 January 2016, 8:41 IST

समाजवादी नेता और सामाजिक विचारक योगेंद्र यादव हाल ही में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 13 सूखा प्रभावित जिलों का दौरा करके लौटे हैं. यह देश के सूखा प्रभावित क्षेत्रों का उनका तीसरा दौरा था. अक्टूबर के महीने में उन्होंने सात राज्यों का दौरा किया था और फिर इसके बाद नवंबर के महीने में बुंदेलखंड के सूखा क्षेत्रों का भी सर्वेक्षण किया.

यह तमाम यात्राएं उनके स्वराज अभियान के झंडे तले आयोजित हुईं जिसकी स्थापना उन्होंने आम आदमी पार्टी से अलग होने के बाद की है. आम आदमी पार्टी की भ्रष्टाचार विरोधी छवि से बिल्कुल अलग यादव ने स्वराज अभियान को किसानों को अपनी चिंता के केंद्र में रखा है. हालांकि अभियान अभी तक स्वयं को राजनीतिक दल नहीं कहता है लेकिन यादव का कहना है कि यह एक राजनीतिक संस्था है जो एक ‘चुनावी ताकत‘ बनने की तैयारी में है.

कैच न्यूज संवादाता निहार गोखले के साथ बातचीत में योगेंद्र यादव बताते हैं कि बुंदेलखंड का सूखा, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा से भी बदतर हैं.

किसानों की उपेक्षा के मुद्दे पर बात करते हुए यादव बताते हैं कि कैसे किसानों पर आधारित राजनीति बंटी हुई है और क्यों उन्हें एक झंडे के तले लाना ‘भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण आवश्यकताओं’ में से एक है.

पढ़ें बातचीत का अंश-

आप कई सूखा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं. किस तथ्य ने आपको दोबारा बुंदेलखंड का रुख करने को मजबूर किया?

जैसे-जैसे हमने अपनी संवेदना यात्रा के तहत देश के गंभीर सूखाग्रस्त जिलों की यात्रा की आगे बढ़ाई, हमें यह स्पष्ट हो गया कि सूखे का मुख्य केंद्र मराठवाड़ा नहीं है जैसा कि लोगों द्वारा समझा जा रहा है.

सूखे का मुख्य केंद्र बुंदेलखंड है. शायद मराठवाड़ा में बारिश की स्थिति अधिक बदतर थी और पानी का स्तर अधिक नीचे चला गया था. लेकिन बुंदेलखंड वह इलाका है जहां सूखे ने अकाल का रूप ले लिया है. इसे बिल्कुल ही अलग नजरिए और भयावह खतरे के रूप में देखने की जरूरत है. बीते मानसून में बारिश काफी कम हुई थी लेकिन इस तथ्य ने इसे और अधिक विनाशकारी बना दिया था कि यह भयंकर सूखा दो फसलों के बर्बाद होने के बाद आया था.

वर्ष 2014 की खरीफ की फसल सूखे के चलते और वर्ष 2015 की रबी की फसल ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश के चलते बर्बाद हो चुकी थी और बुंदेलखंड में यह बर्बादी का लगातार तीसरा वर्ष था. ऐसे हालात में किसान पहले ही अपनी जमापूंजी से हाथ धो बैठे थे. इस क्षेत्र में ऐसी चुनौतियों को सहन करने और बुनियादी ढांचे की क्षमता देश की किसी भी अन्य हिस्से की तुलना में काफी कम है और यही हमारे सामने मुख्य चुनौती थी.

इसी के चलते हम दोबारा नवंबर में वहां सर्वेक्षण करने के लिए गए. हमने ऐसा मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के क्षेत्र में किया क्योंकि हमारे हिसाब से वहां कि स्थिति ज्यादा खराब थी. हमने जीन द्रेज से अपने साथ शामिल होने और एक वैज्ञानिक सर्वेक्षण को डिजाइन करने में मदद करने का अनुरोध किया. इससे प्राप्त हुए नतीजे काफी निराशाजनक हैं.

आपने अपने इस सर्वेक्षण में क्या पाया?

मीडिया लगातार फिकार का उल्लेख करता रहा या फिर घास की रोटी को मुख्य रूप से सामने लाता रहा. लेकिन यह हमारे सर्वेक्षण का केंद्रीय नतीजा नहीं रहा. मेरे लिये सबसे दुखद हिस्सा वह रहा जहां बुंदेलखंड के 40 प्रतिशत ग्रामीणों ने कहा कि उन्होंने बीते 30 दिनों से दाल नहीं खाई है.

60 प्रतिशत लोग अपने बच्चों को दूध तक नहीं पिला पाते हैं और 40 प्रतिशत ग्रामीण परिवार मजबूरी में अपने पालतू जानवरों को बेच रहे हैं. बीते एक वर्ष में करीब एक चौथाई लोगों को अपनी जमीन गिरवी रखनी पड़ी है और करीब इतने ही लोगों को अपने जेवर गिरवी रखने पड़े. इस तथ्य ने हमारे उस संदेह की पुष्टि की कि यह हम सबकी उम्मीद से भी बड़ी त्रासदी है.

दिसंबर के आखिर में एक बार फिर एक रिपोर्ट सामने आई कि बुंदेलखंड में स्थिति फिर गंभीर होती जा रही है और मुझे लगा कि मुझे एक बार फिर वहां वापस जाकर सब कुछ नजदीक से देखना चाहिये.

बुंदेलखंड के अधिकतर लोगों का कहना है कि उन्होंने बीते काफी समय से इतना भयावह सूखा नहीं देखा. क्या आपको लगता है कि ऐसी भयंकर स्थिति में राज्य की ओर से पर्याप्त सहयोग मिला है?

जब लोग यह कहते हैं कि यह सबसे भयंकर सूखा है, तो हो सकता है कि यह उन्हें गलत लगे जो सिर्फ मौसम संबंधी उन आंकड़ों पर विश्वास करते हैं जो यह दिखाता है कि देश पूर्व में इससे भी भयंकर सूखे का सामना कर चुका है. अगर सिर्फ बारिश के डाटा को ही केंद्र में रखें तो बुंदेलखंड उससे भी बुरे सूखे से गुजर रहा है.

इसके अलावा हम बहुआयामी संकट के भी साक्षी बन रहे हैं. वहां पर सिंचाई के लिये पानी उपलब्ध नहीं है. पीने और घर के दैनिक कामों को करने के लिये पानी का भारी संकट है और जानवरों के लिये तो पानी एकदम आपात स्थिति जैसा है. वहां पर चारे का संकट भी गंभीर हो गया है और किसान अपने पालतू जानवर बेचने को या फिर उन्हें ऐसे ही छोड़ने को मजबूर हैं.

इसके बाद वहां पर रोजगार के अवसर न होने के चलते लोगों की क्रयशक्ति भी न के बराबर है. इसके चलते वहां के मूल निवासी रोजगार के अवसरों की तलाश में बुंदेलखंड के बाहर का रुख कर रहे हैं. जिसके चलते वे पहले से कहीं अधिक बिचैलियों और दलालों के चंगुल में फंस रहे हैं. कुछ मामलों में तो श्रमिकों की मांग में कमी और उपलब्धता ज्यादा होने के कारण मिलने वाली मजदूरी भी कम हो जा रही है. इसका खामियाजा यह होता है कि वे वापस बुंदेलखंड लौटने और बेरोजगार रहने को मजबूर होते हैं.

इसके अलावा वहां के लोग भारी कर्ज के नीचे दबे हुए हैं और किसान अपने बकाया ऋण का भुगतान नहीं कर पा रहे हैं. उनके द्वारा फसल के लिये लिया गया कर्ज डूब चुका है. ऐसे में जब उन्हें पैसे की सबसे अधिक आवश्यकता है, तब संस्थाएं उन्हें ऋण देने को तैयार नहीं हैं और वे स्थानीय साहूकारों से कर्ज लेने को मजबूर हैं. ये साहूकार उनसे ऐसा ब्याज वसूलते हैं जिसकी शहरी लोग तो कल्पना भी नहीं कर सकते. 60 प्रतिशत प्रतिवर्ष की ब्याज दरें कोई अनोखी बात नहीं है. यानी यह एक बहुआयामी संकट है जो हम बुदेलखंड में देख पा रहे हैं.

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि सूखा अदृश्य है. सूखा की त्रासदी में कोई चकाचौंध नहीं होती, इसमें कोई फुटेज नहीं है, न ही कोई ब्रेकिंग खबर है. ये ऐसी कहानियां भी नहीं हैं जिसमें खुशहाल लोग शामिल हों क्योंकि अधिकतर उन्हीं कहानियों को मार्मिक ढंग से कहा जाता है जिनमें पाठक को यह अनुभूति हो कि वह उनकी जगह पर है. यही वजह है कि सूखा दिल को छूने वाली कहानियों में तब्दील नहीं हो पाता है. सूखे के शिकार लोग हमारे सामाजिक दायरे से इतनी दूर हैं कि हमारे लिये उनके प्रति सहानुभूति दिखाना भी मुश्किल है.

इतने विकट हालात में केंद्र और राज्य सरकार की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?

सरकारों की प्रतिक्रिया बिल्कुल उदासीन रही है. यह अगस्त के मध्य में ही स्पष्ट हो गया था कि हम एक भयंकर सूखे की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं. 30 सितंबर को मानसून के अंतिम दिन इसकी आधिकारिक घोषणा की गई. इसके बावजूद वर्ष के अंत तक या फिर नवंबर के अंत तक राज्य सरकार के द्वारा इस मामले में कोई भी योजना नहीं बनाई गई. अधिकांश राज्य सूखे की घोषणा तक करने में हिचक रहे थे. मध्य प्रदेश सरकार ने पहले ही सूखे की घोषणा कर दी लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने नवंबर तक ऐसा नहीं किया.

जल संकट बिल्कुल स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था. उत्तर प्रदेश में हैंड पंपों को ठीक करने का थोड़ा प्रयास जरूर किया गया लेकिन मुझे लगता है कि मध्य प्रदेश सरकार ने ऐसी कोई पहल भी नहीं की.अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में जब मैं उत्तर प्रदेश से गुजर रहा था. तब पालतू जानवरों को बड़े पैमाने पर खुला छोड़ा जा रहा था.

किसी को भी इस बात की चिंता नहीं थी कि लाखों की संख्या में पालतू जानवरों को छोड़ा जा रहा है. यह एक बेहद दुःखद दृश्य था. किसी को नहीं पता था कि क्या हो रहा है. जुलाई के अंत और अगस्त के प्रारंभ में इस क्षेत्र में नरेगा की वास्तविक आवश्यकता थी. वास्तव में इसका प्रारंभ अप्रैल के महीने में पिछली फसल के बर्बाद होने के बाद ही हो जाना चाहिये था लेकिन सात-आठ महीनों तक सरकारें हाथ पर हाथ रखकर बैठी रहीं.

उत्तर प्रदेश में यह अभी शुरू हुई है लेकिन मध्य प्रदेश अभी भी पीछे है. उत्तर प्रदेश में भी इसकी शुरुआत चुनिंदा और आंशिक तौर पर हुई है. अप्रैल में ही सरकारों को पता था कि किसानों के लिये फसल का मुआवजा समय की आवश्यकता है. इसके बावजूद उत्तर प्रदेश किसानों को मार्च के महीने में हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति करने में नाकाम रहा. इस मामले में मध्य प्रदेश तेज और जिम्मेदार रहा है.

हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस तथ्य से वाकिफ है कि किसान न तो अपना ऋण चुकाने की स्थिति में हैं और न ही बिजली की बकाया राशि चुकाने में. लेकिन सरकारें इसकी मांग कर रही हैं और बकायेदार किसानों को दंडित भी कर रही हैं. ऐसा तब हो रहा है जब वे देश के बड़े काॅर्पोरेट्स को पुर्नगठन पैकेज की पेशकश कर रहे हैं.

संकट की प्रकृति और विभिन्न सरकारों की प्रतिक्रिया के बीच भारी असंतुलन है जिसके चलते हमारे सिर शर्म से झुक जाते हैं. और यह समय लोकतात्रिक सिद्धांतों पर पुनर्विचार करने का है.

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 में चुनाव होने वाले हैं. क्या अपनी इस यात्रा के दौरान किसी भी मौके पर आपका ऐसे लोगों से सामना हुआ जिन्होंने कहा हो कि वे ऐसे प्रतिनिधियों को दोबारा नहीं चुनेंगे जिन्होंने इस स्थिति में भी उनकी सुध नहीं ली?

यही किसान राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी है और इसी वजह से मैंने पूर्व में लोकतात्रिक सिद्धांतों पर पुनर्विचार करने की बात कही. लोकतांत्रिक सिद्धांत अक्सर इस बात को भ्रम में रहता है कि अल्पसंख्यकों, विशेषकर बेहद छोटी संख्या वाले अल्पसंख्यकों के पास लोकतंत्र में आवाज कैसे हो सकती है. इसका कोई सीधा जवाब नहीं है. लेकिन यहां पर तो स्थितियां उलट हैं, एक बड़े बहुमत के पास भी आवाज नहीं है.

उनकी सबसे बुनियादी आवश्यकताएं भी अनसुनी और अधूरी रह रही हैं. ऐसा सिर्फ इसलिये है क्योंकि हर राजनीतिक दल को किसानों के वोट चाहिये और उन्हें पता है कि वे किसानों के रूप में वोट देने नहीं जा रहे हैं. वे यादव, जाट, ठाकुर या फिर कुछ और बनकर वोट देते हैं. इसी वजह से देश में किसानों की संख्याा 50 प्रतिशत होने के बावजूद इसका मतलब यह नहीं है कि उनके हाथ में 50 प्रतिशत वोटों का नियंत्रण है.

जब तक किसानों को एकजुट करके यह नहीं समझाया जाएगा कि वे कुछ और होने से पहले सिर्फ एक किसान हैं यह विरोधाभास बना रहेगा. किसान राजनीति खड़ी करने में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसान बंटे हुए हैं. सबसे पहले तो वे देश की विशाल भू-जलवायु विविधता में ही बंटे हुए हैं.

बंगाल के जूट उगाने वाले किसान, राजस्थान में बाजरा उगाने वाले किसान या फिर केरल में वृक्षारोपण करने वाले किसान में कुछ भी समान नहीं है. वे एक-दूसरे से बिल्कुल ही अलग दुनिया में रहते हैं. इसके अलावा इनके बीच वर्ग-विभाजन की गहरी दीवार है. अमीर किसानों की राजनीति और मध्यम दर्जे के किसानों की राजनीति बिल्कुल जुदा है और इसमें भूमिहीन कामगार होना और भी बड़ा विरोधाभास होता है.

इन सबको एक साथ लाना लगभग असंभव है. तीसरा इनके बीच क्षेत्रीय विभाजन है. इसके बाद जाति और धर्म के आधार पर भी विभाजन है. अंत में, चूंकि कृषि राज्य का विषय है, कृषि नीतियां क्षेत्रीय और राज्य की रेखाओं के इर्द-गिर्द तैयार होती हैं तो एक तरह से किसान राजनीति लगातार और नियमित रूप से बिखरी रहती है. इसे किसान राजनीति के रूप में एक मंच पर लाना वास्तव में एक चुनौती है. लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता राजनीतिक दल किसानों के बारे में नहीं सोचेंगे.

क्या आप स्वयं को ‘किसान राजनीति' के नेता के रूप में देखते हैं?

जी हां, बिल्कुल. हमारे लिये यह जानते-बूझते किसान राजनीति तैयार करने का एक हिस्सा है. भारतीय लोकतंत्र में किसान राजनीति का तैयार होना सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक है. इसलिये किसानों का सामूहिक नेतृत्व करने के लिये उन्हें एक मंच पर लाना मौजूदा समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है. मेरा मानना है कि राजनीति इस युग का धर्म है, एक कर्तव्य है और इसीलिये किसान राजनीति करना मेरा कर्तव्य है. स्वराज अभियान के सदस्यों के रूप में हमने इस सूखा यात्रा से बहुत पहले ही जय किसान आंदोलन की नींव रख दी है.

हमने अगस्त के महीने में जय किसान आंदोलन के झंडे तले संसद तक मार्च किया था. हम पहले से ही जय किसान आंदोलन के मंच पर किसानों के कई दर्जन समूहों को साथ ला चुके हैं और हम देशभर के तमाम किसानों को एकसाथ लाने की संभावनाओं पर मंथन कर रहे हैं.

हमारा इरादा किसानों को फसल के मुआवजे, फसल बीमा (जो किसानों के साथ बहुत बड़ा धोखा है) और किसानों की आय के बड़े सवाल पर एक करने के प्रयास में हैं तो एक तरीके से हम पहले से ही किसान राजनीति में हैं और हमें उम्मीद है कि हम किसानों की दिक्कतों को लेकर एक दूसरे पर आरोप लगाने वाली पार्टियों की खोखली राजनीति से दूर रहने में सफल रहेंगे. हमें उम्मीद है कि यह गंभीर राजनीति है.

स्वराज अभियान चुनावी राजनीति में कब शामिल होगा?

स्वराज अभियान में हमने एक भी क्षण ऐसा नहीं कहा है कि हम एक एनजीओ हैं जो राजनीति से दूर रहेगा. हमने पहले ही दिन से कहा है कि वैकल्पिक राजनीति की ओर कदम बढ़ाएंगे साथ ही वैकल्पिक राजनीति में चुनावी राजनीति शामिल होनी चाहिये. लेकिन मुझे उम्मीद है कि वैकल्पिक राजनीति सिर्फ चुनावी राजनीति तक ही सीमित होकर न रह जाए.

बिल्कुल, जो कोई भी किसानों को एकजुट करना चाहता है उसके पास एक ऐसी चुनावी ताकत तैयार करने की महत्वाकांक्षा होनी चाहिये जो किसानों के मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीति का मामला बनाने में सक्षम हो. लेकिन ऐसा भी पर्याप्त तैयारी के बाद ही किया जाना चाहिये चाहे वह संगठनात्मक हो या वैचारिक.

First published: 15 January 2016, 8:41 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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