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सूखा, अकाल और सरकारी उपेक्षा के चलते दम तोड़ता बुंदेलखंड

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • बुंदेलखंड इलाक़ा लगातार तीसरे साल सूखे के चपेट में है. यूपी और एमपी सरकारें यहां की दिन-ब-दिन खराब होती स्थिति की अनदेखी कर रही हैं.
  • इस साल भी बहुत सारी फसल खराब होने की आशंका है. सूखा और भूखमरी से पीड़ित इलाक़े में पलायन और अपराध में हो रही है बढ़ोत्तरी.

बुंदेलखंड क्षेत्रफल और जनसंख्या के मामले में श्रीलंका के लगभग बराबर है. ये पूरा इलाक़ा अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी से गुजर रहा है. इलाक़े में लगातार तीसरे साल सूखा पड़ा है. अब चौथे साल इलाक़ा ख़राब पैदावार की समस्या से जूझ रहा है.

साल 2015 में ख़राब मॉनसून के कारण पहले से ही विशेषज्ञों ने इसके लिए आगाह किया था लेकिन सरकार ने उसपर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया.

बुंदेलखंड में कुल 13 ज़िले आते हैं. इनमें उत्तर प्रदेश के सात और मध्य प्रदेश के छह ज़िले शामिल हैं. ये इलाक़ा अपने रजवाड़ों के लिए विख्यात है. इनमें सबसे मशहूर हैं झांसी की रानी. 1857 में ब्रितानी शासन के ख़िलाफ़ भारतीयों की आजादी की लड़ाई में रानी की बहादुरी के क़िस्से घर घर में मशहूर हैं.

साल 2011 की जनगणना के अनुसार बुंदेलखंड की आबादी करीब एक करोड़ 83 लाख है. इसका क्षेत्रफल करीब 70 हज़ार वर्ग किलोमीटर है.

बुंदेलखंड इलाके में पिछले कई दशकों से लगातार सूखा पड़ रहा है. साल दर साल हालात और खराब हो रही है

ये इलाक़ा पहले भी सूखे की चपेट में आता रहा है लेकिन पिछले कुछ दशकों में सूखे की समस्या और गंभीर रूप धारण कर चुकी है. पिछले 15 सालों से ज्यादातर समय ये क्षेत्र सूखे के चपेट में रहा है.

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यूपी के हमीरपुर से गुजरने वाली केन नदी लगभग सूख चुकी है(तस्वीर- निहार गोखले)

इलाक़े के बुजुर्गों का कहना है कि इस साल जैसा सूखा उन्होंने कभी नहीं देखा था. इसके अलावा बेमौसम की बरसात ने भी इलाक़े के किसानों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है. साल 2014 और 2015 में फ़सल ख़राब होने की प्रमुख वजह बेमौसम बरसात ही रही.

इस इलाक़े के पांच ज़िलों के दौरा करने से ये साफ़ हो जाता है कि टीवी चैनलों पर दिखायी जा रही घास की रोटी खाने की खबर यहां की सबसे बड़ी ख़बर नहीं है. इस इलाक़े की असली ख़बर में शायद मीडिया को रुचि ही नहीं है.

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इस इलाक़े की सबसे बड़ी समस्या पीने और सिंचाई के पानी की भयानक कमी है. हर ज़िले में आम लोगों ने बताया कि उनके गांवों के हैंडपंप और कुओं में पर्याप्त पानी नहीं है. ज्यादातर लोगों का कहना है कि ये स्रोत भी अगले दो-तीन महीनों में खत्म हो जाएंगे.

एक समय इलाक़े में कई झीलें और तालाब थे. जिनमें से ज्यादातर सूख चुके हैं. कई जगहों पर इन झीलों और तालाबों में ट्यूबवेल लगाने के लिए खुदाई की जा रही थी ताकि जानवरों के लिए पीने के पानी की व्यवस्था की जा सके.

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बुंदेलखंड का एक खेत जिसकी जुताई तो हुई लेकिन उसपर बुवाई नहीं हुई(तस्वीर- निहार गोखले)

सिंचाई के पानी के कमी के कारण सर्दी में होने वाली बुवाई भी प्रभावित होगी. इलाक़े के खेतों की जुताई हो चुकी है लेकिन उनमें बुवाई करना बाक़ी है. कई गांवों के किसानों के कहना है इस साल इलाक़े के एक चौथाई से भी कम ज़मीन पर खेती हो पाएगी.

सूखे के चलते इलाके से बड़े पैमाने पर लोगों का पलायन हो रहा है. पिछले साल की तुलना में इस साल दोगुना पलायन हुआ है

फ़सल ख़राब होने का पहला असर दिखने लगा है. इलाक़े से बड़ी संख्या में लोगों का पलायन हो रहा है. गांववालों के अनुसार पलायन करने वालों की संख्या पिछले साल सो दोगुनी हो गयी है.

दिल्ली से हाल ही में लौटे किसान मूलचंद कहते हैं, "ऐसा लग रहा है कि इलाक़े में कर्फ्यू लगा हुआ है."

कभी उड़द और गेहूं की खेती करने वाले किसान अभ यूपी, दिल्ली और मध्य प्रदेश में ईंट-भट्टों और इमारती कामों में काम करने के लिए मजबूर हो रहे हैं.

ग़रीब तबके में पलायन की समस्या ज्यादा गंभीर है. टीकमगढ़ गांव के 80 फ़ीसदी आदिवासी पलायन कर चुके हैं. लेकिन पलायन से सबको राहत नहीं मिली. कई लोग दिल्ली और इंदौर जैसे शहरों से गांव वापस आ गए हैं क्योंकि उन्हें वहां नौकरी नहीं मिली.

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इलाक़े में लोग किसी तरह पेट पाल रहे हैं. ललितपुर ज़िले के राजवाड़ा गांव में लोग पेड़ों की छाल और जड़ इकट्ठा करके पास के बाज़ार में बेचते हैं. इससे उन्हें मुश्किल से एक दिन में 5-15 रुपये की कमायी हो पाती है.

इंसानों के साथ जानवरों के लिए भी इस आपदा में भोजन मिलना मुश्किल होता जा रहा है. हमीरपुर चारे की कीमत एक हजार रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुकी है. जबकि पिछले साल इसकी कीमत 500  रुपये प्रति क्विंटल थी. एक क्विंटल चारा चार जानवरों के लिए करीब दो हफ्ते का राशन हुआ.

कई गांववालों ने बताया कि वो महीने में अधिक से अधिक एक बार दाल खा पाते हैं. कुछ ने आखिरी बार दिवाली में दाल खायी थी

जय किसान आंदोलन के नेता योगेंद्र यादव ने सात जनवरी से 10 जनवरी तक इस इलाक़े का सर्वे किया. इस सर्वे में सामने आया कि ज्यादातर गांववाले महीने में अधिक से अधिक एक दिन दाल खाते हैं. कुछ गांववालों ने तो यहां तक कहा कि उन्होंने आखिरी बार दाल दिवाली में खायी थी.

इलाके के कई परिवारों को दिन में एक बार खाना मिल पा रहा है. छोटे बच्चों को दूध भी नहीं मिल पा रहा है.

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यूपी के महोबा जिले में मनरेगा के तहत काम करते लोग(तस्वीर-निहार गोखले)

प्रकृति की मार को यूपी और एमपी सरकार की अनदेखी ने और त्रासद बना दिया है. दोनों राज्यों ने इलाक़े के सूखा पीड़ित किसानों के लिए जो कुछ किया है ऊंट के मुंह में जीरा ही कहा जा सकता है.

यूपी सरकार ने पिछले हफ्ते इलाके के कामगारों को मनरेगा के तहत काम देना शुरू किया. लेकिन एमपी में सरकार की तरफ से की गयी ऐसी कोई पहल ज़मीन पर नहीं नज़र आयी.

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एमपी में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू है जिसके तहत चिह्नित जरूरतमंदों को सस्ते दर पर अनाज दिया जाता है. लेकिन कई गांववालों ने शिकायत की कि स्थानीय अधिकारियों को घूस न दे पाने के कारण उन्हें ये सस्ता अनाज नहीं मिल पाया.

टीकमगढ़ के बलदेवगढ़ ब्लॉक के एक गांव के हाल ही चुने गये सरपंच ने घूस लेने पर साफ कहा कि 'हमें ऊपर पैसा पहुंचाना होता है.'

फसल क्षतिपूर्ति का मुआवजा देने में एमपी की स्थिति यूपी से बेहतर है लेकिन ये भी पर्याप्त नहीं है. गांववालों ने आरोप लगाया कि पटवारी मुआवजे में से हिस्सा लेते हैं. किसकी कितनी फसल खराब हुई इसकी रिपोर्ट पटवारी ही भेजते हैं जिसके आधार पर मुआवजा तय होता है.

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एमपी का एक चेक डैम जो लगभग सूख चुका है(तस्वीर- निहार गोखले)

साल 2014 में भी सूखा पीड़ित होने के बावजूद दोनों राज्यों ने पर्याप्त कार्रवाई नहीं की थी. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिजास्टर मैनेजमेंट की रिपोर्ट में दोनों सरकारों को लताड़ लगायी थी. संस्थान ने इलाक़े में बार बार पड़ती सूखे की मार पर दोनों राज्यों के रवैये को 'नजरिये का सूखा' कहा था

प्रकृति की मार और सरकारों की अनदेखी से धीरे धीरे स्थिति हाथ से बाहर निकलती जा रही है.

प्रशासन की उपेक्षा के कारण इलाका अब पूरी तरह बारिश पर निर्भर है. अगर बारिश नहीं हुई तो सूखे की हालात और विकट हो जाएगी. बारिश न होने की स्थिति में अगली फसल के लिए अक्टूबर, 2016 तक इंतजार करना होगा.

सूखा, बारिश और फ़सल के अलावा पिछले कुछ समय में इलाक़े में अपराध में बढ़ोतरी देखी जा रही है. योगेंद्र यादव के सर्वे के अनुसार शराबखोरी और आर्थिक तनाव के चलते घरेलू हिंसा की घटनाओं में वृद्धि देखी गयी है.

सामाजिक कार्यकर्ता पवन बंसल कहते हैं, "अच्छे घरों के लड़कों को मोबाइल फ़ोन और मोटरसाइकिल चाहिए. शराबखोरी भी बढ़ रही है. ऐसे में पैसा कहां से आएगा?"

बंसल कहते हैं, "इलाक़े में लूटपाट की घटनाएं बढ़नी ही हैं. अगर आप अब से एक महीने बाद आएंगे तो देखेंगे कि शाम के बाद यहां कोई बाहर निकलेगा."

First published: 16 January 2016, 8:51 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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