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हक के लिए हबूड़ों का संघर्ष

रोहित घोष | Updated on: 3 November 2015, 17:24 IST
QUICK PILL

 इतिहास 

  • हल्दीघाटी\r\nमें हुई लड़ाई में कई लड़ाकू\r\nजनजातियों ने अकबर के खिलाफ\r\nमहाराणा प्रताप का साथ दिया\r\nथा. उनमें हबूड़ा जनजाति भी थी.
  • उनके\r\nनिर्वासन के बाद यह जनजातियां\r\nउत्तर दिशा में फैली और उत्तर\r\nप्रदेश तक जा पहुंचीं.
  • ब्रिटिश\r\nसरकार ने उन्हें आपराधिक\r\nजनजाति बताकर कई स्थानों\r\nपर बनीं खुली जेलों में कैद कर दिया.

 वर्तमान 

  • कानपुर\r\nमें मौजूद सीटीएस बस्ती भी\r\nएक ऐसी ही ओपन जेल (खुली\r\nजेल) है,\r\nजहां आज भी\r\nयह जनजाति रहती हैं
  • थोड़ी-थोड़ी\r\nकरके उत्तर प्रदेश सरकार उन्हें पूर्व में दी गई सारी\r\nजमीनें वापस ले रही है.
  • अभी\r\nतक यह भूमि सरकार के अधीन आती\r\nहै और उसका स्वामित्व जनजातियों को नहीं\r\nदिया गया है.
  • सरकार\r\nकहती है कि ये लोग जमीन का\r\nदुरुपयोग कर रहे हैं,\r\nसरकार इस\r\nजमीन पर एक अस्पताल बनवाना\r\nचाहती है.
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रमेश कुमार भांतू की उम्र साठ साल से ऊपर है. वो किसी पारंपरिक स्कूल शिक्षक जैसे दिखते हैं, मोटे ग्लास वाला चश्मा पहनते हैं, रुक-रुक कर तार्किक रूप से बात करते हैं. लेकिन वो कभी स्कूल टीचर नहीं रहे. वो भारतीय सेना के लिए पैराशूट बनाने वाली कानपुर की ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में कई दशकों तक काम करते रहे हैं.

भांतू के व्यक्तित्व और पेशेवर जिंदगी से यह पता नहीं चलता कि वो रहते कहां हैं. वो कानपुर जिले के कल्याणपुर में बनी सीटीएस (क्रिमिनल ट्राइब सेटलमेंट) बस्ती में रहते हैं. इस बस्ती को अपराधियों की कॉलोनी भी कहा जाता है. वे यहीं पर पैदा हुए, पले-बढ़े और आज भी यहीं रहते हैं.

रमेश को देखकर नहीं लगता कि उनके पुरखे कभी अपराधी और उससे भी पहले योद्धा माने जाते थे.

राणा प्रताप के सहयोगी

कानपुर के सामाजिक कार्यकर्ता राबी शर्मा सीटीएस बस्ती में रहने वालों के इतिहास पर काम कर चुके हैं.

राबी ने कैच को बताया, "इनका इतिहास 16वीं शताब्दी से शुरू होता है. जब हल्दीघाटी में अकबर और राणा प्रताप के बीच लड़ाई हुई थी."

शर्मा कहते हैं, "मुगल सम्राट के खिलाफ राणा प्रताप की लड़ाई में कई जनजातियों ने उनका साथ दिया. वे राणा प्रताप के प्रति वफादार बने रहे. जब राणा अपने साम्राज्य से निर्वासित हुए तो यह भी उनके साथ चले गए. जब राणा प्रताप की मृत्य हुई तब यह जनजाति उत्तरी भारत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) की ओर चली आई.

ये जनजाति युद्ध कला में माहिर थी इसलिए उत्तर भारत के कई राजा और सामंत उन्हें अपनी सेना में शामिल करना चाहते थे. लेकिन हबूड़े एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहे क्योंकि उन्होंने कसम खाई थी कि जब तक राणा प्रताप अपना साम्राज्य वापस नहीं पा लेते वे एक जगह नहीं रुकेंगे.

यह देशभक्त जनजाति थी इसलिए जब 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ पहला स्वतंत्रता संग्राम हुआ तो इन्होंने फिर से हथियार उठाकर मोर्चा लिया.

जब ब्रिटिशों ने भारतीय सैनिकों का हरा दिया तब उनका ध्यान इन जनजातियों की ओर गया. शर्मा बताते हैं, "ब्रिटिशों ने यह महसूस किया कि ये जनजाति उनके लिए गंभीर खतरा है. ये युद्ध कला में माहिर थीं और अपने नेता के कहने पर वे तुरत-फुरत एकजुट हो सकती थीं. इसलिए इनकी सेना को नष्ट करने के लिए इन्हें अपराधी घोषित कर दिया गया."

खुली जेलों में किया अलग-थलग

1871 में अंग्रेजों ने आपराधिक जनजाति अधिनियम पारित किया. इस अधिनियम के दायरे में छह जनजातियां शामिल की गई थीं, जिनमें सोलंकी, पवार, दाबी और मकवाना नामक जातियां थीं.

शर्मा कहते हैं, "इसमें दो और जनजातियां थीं लेकिन राणा प्रताप की मृत्यु के बाद वे यूरोप की ओर चले गए. वर्तमान में वो कहां हैं इस बारे में कुछ भी पता नहीं है."

ब्रिटिशों ने पहले इन जनजातियों को अलग-अलग किलों में रखा. 1922 में उन्होंने इन्हें खुली जेलों में रखने का फैसला किया. इन खुली जेलों के लिए कानपुर, मुरादाबाद, लखीमपुर खीरी, लखनऊ और गोरखपुर जैसी जगहें चुनी गईं.

कानपुर की ओपन जेल को सीटीएस (क्रिमिनल ट्राइब सेटलमेंट) का नाम दिया गया. सीटीएस के एक ओर गंगा नदी है जबकि दूसरी ओर दिल्ली और कोलकाता को जोड़ने वाली जीटी रोड. 159 एकड़ में फैले सीटीएस में खेती की जमीन, कॉलोनियां, स्कूल, हॉस्टल और चौड़ी सड़कें भी हैं.

शर्मा के मुताबिक, "सीटीएस को अपराधियों की कॉलोनी के रूप में बदनामी मिली. लेकिन उनका एकमात्र अपराध था अंग्रेजों से लड़ना. यहां तक कि इस बस्ती में जन्म लेने वाले बच्चों पर भी अपराधी का ठप्पा लग जाता था. जब वह बड़ा होता तो भी उसके साथ ये ठप्पा चिपका रहता है. आज भी कुछ लोगों के लिए सीटीएस भय और नफरत का पर्याय है."

सीटीएस को हबूड़ा बस्ती के नाम से भी जाना जाता है. शर्मा कहते हैं, "लोग सोचते हैं कि हबूड़ा किसी जनजाति का नाम है. लेकिन हबूड़ा शब्द की उत्पत्ति हिंदी के बुरा शब्द से हुई. ब्रिटिश इन लोगों को बुरा कहते थे. इसका अपभ्रंश होते-होते यह बुरा से हबूड़ा हो गया."

सदियों पुराने रीति-रिवाज

हल्दीघाटी की लड़ाई करीब चार सौ साल पहली हुई थी लेकिन ये जनजाति अब भी कुछ पुराने रीति-रिवाजों का पालन करती हैं. हबूड़ा बस्ती की एक निवासी सलीना देवी कहती हैं, "मुगल सैनिकों से बचने के लिए हमारी जनजाति की महिलाएं-लड़कियां अपने चेहरे पर गोदना बनवाकर छिपा लेती थीं. आज भी इस जनजाति की महिलाओं-लड़कियों में गोदना बनवाना आम बात है."

इस जनजाति की कई टोलियां आज भी एक जगह से दूसरी जगह घूमती रहती हैं और तंबुओं में रहती हैं.

राणा प्रताप के अपने राज्य से निर्वासन के दौरान उनके साथ रहते हुए अकबर के सैनिकों से बचने के लिए ये लोग सूर्यास्त से पहले ही अपना खाना पका लेते थे, ताकि अंधेरे में आग न जलानी पड़े. आज भी, तमाम जनजातीय परिवार सूर्यास्त से पहले अपना खाना खा लेते हैं.

मुस्लिम सुअर को अपवित्र मानते हैं. मुगल सैनिकों को दूर रखने के लिए, ये जनजातियां सुअर पालती थीं. जब मुगल उनपर हमला करते यह सुअरों को उन पर छोड़ देते.

एक जमाने में तलवारें और भाले बनाने वाली ये जनजाति आज कुल्हाड़ियां, फ़ावड़े, खुरपे इत्यादि बनाकर गुजारा करती है.

इनकी शादियों के जुलूसों में अक्सर मुगल सैनिक हमला कर देते थे. ऐसे हमलों से बचने के लिए शादियों में दूल्हा अपने कंधे पर सुअर का कटा हुआ सिर लेकर चलता था.

ब्रिटिश कालीन कॉलोनी

इन खुली जेलों में बच्चों के लिए किंडरगार्टेन, स्कूल और महिलाओं के लिए सिलाई स्कूल भी थे. ब्रिटिश नहीं चाहते थे कि यह जनजाति स्थानीय लोगों से मिले जुलें. यहां तक कि मृतकों के अंतिम संस्कार के दौरान भी इन्हें आम लोगों से दूर रखने की कोशिश की गई. इसके लिए उन्हें बस्ती के बीच में ही एक कब्रिस्तान दे दिया गया.

पहले ये आदिवासी मृतकों को दफना देते थे, लेकिन अब हिंदुओं की तरह वो मृतकों को जलाते हैं.

सलीना देवी को अपनी उम्र का ठीक-ठीक अंदाजा नहीं है. वो कहती हैं, "शायद 50 के आसपास होगी. सबसे पहले मेरी परदादी सीटीएस में आकर बसी थीं. मैंने अपनी मां और दादी से सुना है कि ब्रिटिश शासन में सीटीएस का इंतजाम काफी बेहतर था."

क्रेच और स्कूलों में भी कारागार होते थे. जहां पर अपने बच्चों को स्कूल न भेजने वाले अभिभावकों को दंडस्वरूप कुछ वक्त के लिए बंदी बनाकर रखा जाता था. सफाईकर्मी दिन में दो बार शौचालयों की सफाई करते थे. कुओं में नियमित रूप से कीटाणुनाशकों का छिड़काव किया जाता था.

अंग्रेजों ने खेती के लिए जो जमीनें मुहैया कराई थीं वो इन लोगों की आजीविका का मुख्य स्रोत थीं. महिलाएं भी सिलाई स्कूलों में पुलिस और सेना की वर्दी सिलती थीं. रोजाना सुबह अंग्रेजों द्वारा चलाई जाने वाली फैक्ट्रियों में पुरुषों को मजदूरों के रूप में ले जाया जाता था.

नेहरू और एससी-एसटी का बवाल


आजादी के समय सीटीएस का एक प्रतिनिधिमंडल जवाहरलाल नेहरू से मिला.

भांतू कहते हैं कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रतिनिधिमंडल से वादा किया था कि जब भारत का अपना संविधान बन जाएगा तब इन बस्तियों के लोग आजाद हो जाएंगे. 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ.

एक प्रतिनिधिमंडल फिर नेहरू से मिला लेकिन वो एक समय अपराधी मानी जाने वाली इस जनजाति को आजाद किए जाने को लेकर सशंकित थे. प्रतिनिधिमंडल काफी जिरह के बाद नेहरू को यह समझाने में कामयाब रहा कि इस बस्ती में पैदा होने वाले मासूम बच्चों को भी अपराधी मान लिया जाता है.

आजादी के बाद आदिवासियों ने खुद को अनुसूचित जातियों में वर्गीकृत कराया क्योंकि इस वर्ग को ज्यादा आरक्षण मिला था. भांतू कहते हैं, "नेहरू ने खुद इस मामले का संज्ञान लिया और 31 अगस्त 1952 को आखिरकार हमें डिनोटिफाइड कर आजाद घोषित कर दिया."

भांतू के मुताबिक नेहरू ने केंद्रीय अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग से सीटीएस के लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए सुझाव मांगे थे.

भांतू कहते हैं, "दिल्ली के करीब होने के कारण आयोग के सदस्यों ने मुरादाबाद स्थित बस्ती का दौरा किया. सीटीएस निवासियों को खुद को अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के रूप में दर्ज कराने का विकल्प दिया गया. उन्हें बताया गया कि एससी समुदाय को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं आदि में 18 फीसदी आरक्षण मिलेगा. जबकि एसटी समुदाय को चार फीसदी आरक्षण मिलेगा. सीटीएस के लोग 18 फीसदी आरक्षण के लालच में आ गए और खुद को अनुसूचित जाति घोषित कर दिया. अब यही हमारे लिए अभिशाप बन गया है."

वो कहते हैं, "यह कितना हास्यापद है कि पहले हमें आदिवासी के रूप में अधिसूचित किया गया लेकिन बाद में अनुसूचित जाति घोषित कर दिया गया. क्या सरकार को पहले से अपना होमवर्क नहीं करना चाहिए था."

करीब 20 साल बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी नेे कहा था कि सीटीएस बस्ती में रहने वाले हर परिवार को खेती के लिए एक एकड़ जमीन दी जाएगी.

भांतू कहते हैं, "हमको जमीन दी गई लेकिन सरकारी कागजातों में उसे हमारे नाम पर नहीं किया गया, न ही आबकारी विभाग में, न ही सामाजिक कल्याण विभाग में. जबकि हम हर साल की फसल के लिए सरकार को लगान देते रहे हैं."

जमीन के लिए कानूनी लड़ाई

राबी शर्मा इन आदिवासियों को उनकी जमीन का कानूनी हक दिलाने के लिए अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं.

वे कहते हैं, "सीटीएस बस्ती के लोग बेबस हैं. जब भी राज्य सरकार को जमीन की जरूरत होती है वो सीटीएस की जमीन ले लेती है. सीटीएस को शुरुआत में कुल 159 एकड़ जमीन दी गई थी. पिछले करीब 20 सालों में सरकार 30 एकड़ जमीन वापस ले चुकी है. सरकार ने वादा किया था कि जिनकी भी जमीन ली गई है उन्हें मुआवजा दिया जाएगा लेकिन सालों बीत जाने के बावजूद मुआवजा नहीं मिला है."

अब राज्य सरकार सीटीएस की 25 एकड़ जमीन पर एक अस्पताल बनवाना चाहती है. यहां के निवासियों को जमीन खाली करने का नोटिस भी जारी कर दिया गया है.

भांतू कहते हैं, "एक वक्त था जब हम खानाबदोश की तरह रहते थे. लेकिन अंग्रेजों ने हमें बसाया. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि हमें जमीन दी जानी चाहिए. अब राज्य सरकार क्यों फिर से हमें खानाबदोश बनाना चाहती है? क्या हम भारत के नागरिक नहीं हैं."

कानपुर के जिलाधिकारी रोशन जैकब ने कैच न्यूज़ को बताया, "सीटीएस के लोगों ने जमीन का दुरुपयोग किया. उन्हें खेती के लिए जमीन दी गयी थी लेकिन वो उसपर घर या दुकानें बना रहे हैं. यह जमीन जीटी रोड से लगी हुई है इसलिए यह बेशकीमती है. भूमाफिया इसे हड़पना चाहते हैं. यह जमीन राज्य सरकार की है और हम इसे सही तरीके से इस्तेमाल करना चाहते हैं. इसलिए सीटीएस में एक अस्पताल बनाने का प्रस्ताव लाया गया है, लेकिन इस पर अंतिम फैसला लेना बाकी है."

पिछली खामियों को दुरुस्त करना

कानपुर स्थित पीपीएन कॉलेज के सामाजिक विज्ञान विभाग प्रमुख तेज बहादुर सिंह कहते हैं, "सीटीएस के निवासियों को मुख्यधारा में लाने के लिए सरकार को कुछ जरूरी कदम उठाने चाहिए. वे भी भारत के नागरिक हैं और उनके खिलाफ कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. पहले ही काफी लंबे अर्से तक उनके साथ भेदभाव किया गया है."

शर्मा कहते हैं कि अभी भी सीटीएस में रहने वाले आदिवासियों के साथ काफी भेदभाव किया जाता है. उन पर अभी भी 'अपराधी' का ठप्पा लगा हुआ है. जब भी कानपुर में कोई आपराधिक वारदात होती है तो सबसे पहले शक की सुई हबूड़ा बस्ती की ओर उठती है.

शर्मा के अनुसार, "कानपुर की इस जनजाति की हालात सबसे ज्यादा दयनीय थी. कानपुर में बनाया गया सीटीएस सबसे बड़ा था. आज यहां की जनसंख्या करीब 10 हजार है. जिला प्रशासन का दावा है जमीन उसकी है. जिसे यहां के निवासियों के नाम पर कानूनी रूप से स्थानांतरित करने की जरूरत है. दूसरे शहरों के सीटीएस निवासियों की हालत काफ़ी अच्छी है. जैसे, मुरादाबाद में हर सीटीएस परिवार के पास छह एकड़ खेती की जमीन है."

केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने 2006 में पहले 'अपराधी' घोषित किए गए ऐसे आदिवासियों की स्थिति का जायजा लेने के लिए एक समूह का गठन किया था.

समूह ने अपनी रिपोर्ट में कहा, "पूरे आदिवासी समुदाय के प्रति नैतिक जिम्मेदारी के तौर पर, सरकार को आदिवासी बहुत इलाकों में युद्ध स्मारकों की तर्ज पर उनके लिए कुछ स्मारक बनवा सकती है."

इसे दूर का सपना बताते हुए शर्मा कहते हैं, "यह स्मारक करीब डेढ़ सौ सालों में इन लोगों के साथ हुए ऐतिहासिक और सामूहिक अन्याय की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति होगी. यह स्मारक इस बात की भी याद दिलाएगा कि जनजातियों के साथ होने वाला अत्याचार रोकना राज्य और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है."

First published: 3 November 2015, 17:24 IST
 
रोहित घोष @catchnews

संवाददाता, कैच न्यूज़

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