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क्या लोगों की उम्मीदों पर खरा उतर सकेंगी ममता बनर्जी?

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 23 May 2016, 10:10 IST
(कैच हिंदी)
QUICK PILL
  • ममता को यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि राजनीतिक भाग्य को बदलने में कुछ ही माह का वक्त लगता है. 2006 में उन्होंने 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी लेकिन उसी वर्ष सिंगूर कांड हो गया और उनका राजनीतिक भाग्य चमकना शुरू हो गया. 
  • समस्या यह है कि टीएमसी एक संगठित दल नहीं है. इस दल का कोई भी सशक्त राजनीतिक ढांचा नहीं है और जमीनी कार्यकर्ताओं के स्तर पर ममता बनर्जी के निर्देश अनसुने कर दिए जाते हैं.
  • ज्यादा ताकत से ज्यादा जिम्मेदारी आती है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की ऐतिहासिक जीत के बाद सवाल यह खड़ा होता है कि क्या वो लोगों की उनसे लगाई गई तमाम उम्मीदों को पूरा कर सकेंगी?

    उन्हें यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि राजनीतिक भाग्य को बदलने में कुछ ही माह का वक्त लगता है. 2006 में उन्होंने 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी लेकिन उसी वर्ष सिंगूर कांड हो गया और उनका राजनीतिक भाग्य चमकना शुरू हो गया. 

    ममता को बिल्कुल लापरवाह नहीं होना चाहिए बल्कि राज्य में मौजूद जनता की समस्याओं को दूर करना चाहिए.

    उद्योग और रोजगार

    बंगाल के लोगों को रोजगार चाहिए. भारी संख्या में युवाओं के पास या तो रोजगार नहीं है या फिर उन्हें राज्य छोड़कर कहीं और जाना पड़ रहा है. आप अपने मतों को सुरक्षित रखने के लिए बेरोजगारों को सब्सिडी दे सकती हैं लेकिन लंबी अवधि में रोजगार पैदा करना बहुत जरूरी है.

    जब हर बीतते माह में कारखानें बंद हो रहे हैं और बड़े औद्योगिक घराने राज्य में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे, भारी उद्योग और निर्माण क्षेत्र इस नई सरकार के लिए बेहद जरूरी हैं. 

    इसके लिए एक साफ भूमि अधिग्रहण नीति की जरूरत है. लेकिन सिंगूर और नंदीग्राम का अनुभव लें तो यह समझा जा सकता है कि औद्योगीकरण करने पर आपको चुनाव जिताने वाले ग्रामीण वोट बैंक के आपके ही खिलाफ हो जाने की संभावना है.

    राजनीतिक हिंसा पर नियंत्रण

    राज्य में राजनीतिक हिंसा काफी बढ़ी है. तकरीबन रोजाना हमें विपक्ष के लोगों की हत्या (कई बार टीएमसी के लोग भी मारे गए हैं), घरों को जलाने, पार्टी कार्यालय नष्ट करने संबंधी समाचार मिलते हैं.

    समस्या यह है कि टीएमसी एक संगठित दल नहीं है. इस दल का कोई भी सशक्त राजनीतिक ढांचा नहीं है और जमीनी कार्यकर्ताओं के स्तर पर ममता बनर्जी के निर्देश अनसुने कर दिए जाते हैं.

    उनका पहला काम अपनी पार्टी के अराजक तत्वों को हटाना है.

    स्वतंत्र और प्रभावी प्रशासन

    नौकरशाही विशेषरूप से पुलिस का प्रभाव पार्टी के शासन में समाप्त हो चुका है. यहां तक की टीएमसी के क्षेत्रीय नेता अक्सर पुलिस को धमकाते, मारते या हत्या करते मिल जाते हैं.

    ममता ने सबसे आगे रहते हुए इन हमलों का नेतृत्व किया है. हाल ही में जब उन्हें अपने काफिले का कुछ मिनट इंतजार करना पड़ा तो उन्होंने अपने सुरक्षाकर्मियों को धमकाया था, मनमाने ढंग से अधिकारियों का स्थानांतरण करा दिया और फिर उन्होंने कोलकाता पुलिस के मौजूदा आयुक्त को अप्रत्यक्ष रूप से धमकाया कि उन्हें सख्त और प्रभावी मतदान के लिए सज़ा भुगतनी पड़ सकती है.

    राज्य के उच्च मध्यम और मध्यम वर्ग के साथ ही सरकारी अधिकारियों के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए उन्हें अपना दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है. वरना इसी तरह की प्रतिष्ठा वाले उनके पूर्ववर्तियों और उनमें कोई अंतर नहीं रहेगा.

    First published: 23 May 2016, 10:10 IST
     
    शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

    संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.