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केयर्न इंडिया और वेदांता के विलय के पीछे अनिल अग्रवाल की मंशा क्या है?

QUICK PILL
  • लंदन में लिस्टेड वेदांत रिसोर्सेज के मालिक अनिल अग्रवाल भारत में लिस्टेड दो कंपनियों केयर्न इंडिया और वेदांत इंडिया के विलय की पुरजोर कोशिशों में लगे हुए हैं.
  • विलय के बाद अग्रवाल को केयर्न इंडिया के 2.8 अरब डॉलर की नकदी दोहन करने का मौका मिलेगा और इससे वह वेदांत रिसोर्सेज पीएलसी के कर्ज को कम कर सकेंगे जिसमें वह सबसे बड़े शेयरधारक हैं.

बंगाल पाक कला में मछली के तेल से ही मछली बनाने की मशहूर कहावत है. क्या इस कहावत की मदद से कुछ पेचीदा कॉरपोरेट लेन-देन के मामलों को समझ सकते हैं? यह कहानी भारतीय मूल के उस सबसे धनी व्यक्ति की है जो दुनिया की सबसे बड़ी निजी माइनिंग और मेट कंपनी का मालिकाना हक रखता है. उनकी कोशिश ऐसे समय में अपने बैलेंस शीट को मजबूत करने की है जब पूरी दुनिया में कमोडिटी की कीमतें धाराशायी हो चुकी हैं.

यह कहानी वेदांत रिसोर्सेज पीएलसी के  संस्थापक और चेयरमैन अनिल अग्रवाल की है जो कर्ज के बोझ से लदी अपनी कंपनी के खाते को दुरुस्त करने के लिए हर संभव जुगत में लगे हुए हैं. कर्ज बोझ के बावजूद उनकी कंपनी मजबूत स्थिति में है. 

लंदन में लिस्टेड वेदांत रिसोर्सेज के मालिक अनिल अग्रवाल भारत की दो लिस्टेड कंपनियों केयर्न इंडिया और वेदांत इंडिया का विलय कराने की जीतोड़ कोशिशों में लगे हुए हैं. केयर्न इंडिया को उन्होंने 2011 में खरीदा था.

वेदांत रिर्सोसेज लंदन स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड कंपनी है और यह अग्रवाल की प्रमुख कंपनी है. वेदांत रिर्सोसेज अग्रवाल के दुनिया भर में फैले कारोबार को नियंत्रित करती है.

अग्रवाल 62 के होने जा रहे हैं और वह भारत में सूचीबद्ध अपनी दो कंपनियों वेदांता इंडिया (पहले सेसा स्टरलाइट) और नकदी से भरपूर तेल उत्पादक कंपनी केयर्न इंडिया का विलय करने के लिए बेचैन है. केयर्न इंडिया को उन्होंने 2011 में केयर्न एनर्जी पीएलसी से खरीदा था. 

अग्रवाल की कोशिश केयर्न इंडिया के फंड से अपनी मूल कंपनी को मजबूत करने की है. लेकिन इस मामले में एक माइनॉरिटी शेयरहोल्डर ने अग्रवाल की राह में रोड़ा अटका दिया है. द हिंदू में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक आर दासगुप्ता के पास केयर्न इंडिया का 10,000 शेयर हैं और उन्होंने प्रस्तावित विलय के खिलाफ बंबई हाई कोर्ट में याचिका दी है.

आर दासगुप्ता ने केयर्न इंडिया और वेदांत इंडिया के विलय को बंबई हाई कोर्ट में  चुनाैती दे रखी है

दासगुप्ता के मुताबिक प्रस्तावित विलय से सरकारी कंपनी एलआईसी समेत अन्य शेयरधारकों को नुकसान होगा. दासगुप्ता का आरोप है कि प्रस्तावित विलय कानून का उल्लंघन है जबकि वेदांता के प्रवक्ता ने इस आरोप का खंडन किया है.

अग्रवाल का कारोबार कई महाद्वीपों में फैला हुआ है. भारी लेन देन की वजह से वेदांत की बैलेंस शीट कर्ज बोझ में दब चुकी है जिसे अब संभालना मुश्किल हो रहा है.

वेदांत पर 37,579 करोड़ रुपये का कर्ज है जबकि इस वित्तीय वर्ष में कंपनी को 5,350 करोड़ रुपये के आमदनी की उम्मीद है. 31 मार्च 2014 तक भारत की सबसे बड़ी जिंक और अल्युमिनियम कंपनी सेसा स्टरलाइट पर अकेले 29,769 करोड़ रुपये का कर्ज है. 

भारी कर्ज के अलावा पिछले कई सालों के दौरान कमोडिटी की कीमतों में तेज गिरावट आई है. इस चुनौती से निपटना कंपनी के लिए बेहद मुश्किल है.

भारत में अग्रवाल के विशाल कारोबार में जबरदस्त नकदी वाली कंपनी केयर्न इंडिया और हिंदुस्तान जिंक शामिल है. हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड पहले सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी थी जिसे अप्रैल 2002 के बाद से चरणबद्ध तरीके से अग्रवाल ने अधिग्रहीत किया है.

स्टरलाइट अपॉचुर्निटीज एंड वेंचर्स लिमिटेड अग्रवाल की मालिकाना हक की कंपनी है जो एचजेडएल में 65 पर्सेंट हिस्सेदारी रखती है और ऐसे में इस कंपनी की नकदी का इस्तेमाल करने की अग्रवाल की बेचैनी समझी जा सकती है.

दोनों कंपनियों ने पैरेंट कंपनी को विशेष लाभांश दिया है. दोनों कंपनियों ने इंटर-कॉरपोरेट लोन ले रखा है लेकिन इससे भी वेदांत को कर्ज की समस्या का समाधान करने में मदद नहीं मिली. इसलिए उनकी योजना भारतीय स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध कुछ कंपनियों को विलय करने की है.

हालांकि जैसे ही विलय की खबर सार्वजनिक हुई, अग्रवाल ने पीटीआई को बताया, 'यह सब कुछ शेयरधारकों पर निर्भर करता है..कि वैल्यू कैसे क्रिएट की जाए.'

बार्कलेज के एक विश्लेषक ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, 'हमारी स्थिति के मुताबिक केयर्न में रिस्क/रिवार्ड का अनुपात वेदांत के साथ विलय होने के बाद के मुकाबले स्वतंत्र केयर्न में ज्यादा होगी.' इसकी वजह यह है कि कमोडिटी की कीमतें में गिरावट हो रही है और वेदांत अल्युमिनियम की राह में नियामकीय अड़चने हैं.

इसका मतलब यह है कि एचजेडएल को छोड़कर वेदांत का विलय होता है तो भी बैलेंस शीट पर दबाव रहेगा. खासकर वैसी स्थिति में वेदांत रिसोर्सेज पीएलसी को अपने कर्ज चुकाने में सहयोग लेना पड़े.

स्वाभाविक तौर पर एलआईसी समेत केयर्न इंडिया के माइनॉरिटी शेयरहोल्डर को विलय से कोई उम्मीद नहीं होगी क्योंकि इसमें उन्हें कंपनी के मौजूदा भाव से कम का ऑफर मिलेगा.

प्रक्रिया और समस्या

अग्रवाल बेहद धूर्त हैं. वह केयर्न इंडिया का वेदांत इंडिया के साथ विलय कर उसकी नकदी से वह कर्ज चुकाना चाहते हैं जिसे उन्होंने केयर्न इंडिया का अधिग्रहण करने के दौरान लिया था. दासगुप्ता ने इसी पर आपत्ति की है.

उनके मुताबिक यह विलय कंपनी एक्ट 2013 के खिलाफ होगा जो किसी भी अधिग्रहण की सेल्फ फंडिंग को सिरे से नकारता है. दासगुप्ता ने कहा कि यह विलय केयर्न इंडिया और इसके सार्वजनिक शेयरधारकों के खिलाफ होगा. 

विलय के बाद अग्रवाल को केयर्न इंडिया के 2.8 अरब डॉलर की नकदी दोहन करने का मौका मिलेगा और इससे वह वेदांत रिसोर्सेज पीएलसी के कर्ज को कम कर सकेंगे जिसमें वह सबसे बड़े शेयरधारक हैं.

वेदांत ग्रुप ने वेदांत लिमिटेड और ट्विनस्टार मॉरीशस होल्डिंग्स लिमिटेड की मदद से केयर्न इंडिया में 58.5 पर्सेंट हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया था. ट्विनस्टार मॉरीशस होल्डिंग्स लिमिटेड स्पेशल पर्पज व्हीकल थी जिसका मालिकाना हक वेदांत रिसोर्सेज के पास था.

टीएमएचएल के अधिग्रहण की फंडिंग बैंकों की तरफ से लिए गए 4.43 अरब डॉलर से की गई थी जिसकी गारंटी केयर्न इंडिया के शेयरों और वेदांत रिसोर्सेज के आधार पर दी गई. 

अगस्त 2013 में वेदांत लिमिटेड ने टीएमएचएल का वेदांत रिसोर्सेज से अधिग्रहण कर लिया. केयर्न इंडिया का अधिग्रहण करने के दौरान वेदांत इंडिया ने यह मान लिया कि केयर्न इंडिया के अधिग्रहण कर्ज से उन्हें छुटकारा मिल जाएगा. इसलिए केयर्न इंडिया की नकदी से खुद को मदद करने की योजना बनाई गई और इसके लिए वेदांत और केयर्न इंडिया के विलय का प्रस्ताव रखा गया.

दासगुप्ता ने 2014-15 में केयर्न इंडिया की तरफ से कर्ज भुगतान में विस्तार दिए जाने को अवैध करार दिए जाने की मांग करते हुए विलय को रोके जाने की अपील की है. इसके साथ ही उन्होंने कोर्ट से कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक बुलाए जाने का आदेश देने की अपील की है ताकि केयर्न इंडिया के साथ वेदांत इंडिया की विलय की नई योजना पर रोक लगाई जा सके. 

अग्रवाल के पास फिलहाल नकदी की तंगी है. उन्हें वेदांत इंडिया के 3.89 अरब डॉलर के कर्ज के एक हिस्से का भुगतान करना है. कंपनी को इस रकम का भुगतान वेदांत यूके को करना है.

इसके लिए उन्होंने एक पेचीदा रास्ता निकाला. वेदांत यूके को 1.25 अरब डॉलर की रकम का भुगतान केयर्न इंडिया की सब्सिडियरी सीआईएचएल के जरिये किए जाने की जो कि टीएचएल जिंक की अप्रत्यक्ष रूप से सब्सिडियरी कंपनी थी.

जब बंबई स्टॉक एक्सचेंज ने 2014 में इस डील पर सवाल उठाया तो केयर्न इंडिया ने कहा कि कर्ज भुगतान उसकी सब्सिडियरी कंपनी की तरफ से किया गया. यह 'रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन' था जिसके लिए ऑडिट कमेटी की पूर्व मंजूरी ले ली गई थी.

दासगुप्ता की याचिका में आरोप लगाया गया है कि केयर्न इंडिया की प्रमोटर वेदांत इंडिया ने केयर्न इंडिया के शेयरों की खरीदारी के लिए करीब 8,000 करोड़ रुपये की रकम गलत तरीके से इस्तेमाल की.

याचिका में कहा गया है कि केयन इंडिया के प्रमोटर्स और डायरेक्टर्स ने कई सब्सिडियरी कंपनियों का इस्तेमाल कर लेन देन किया ताकि इस पूरे मामले को इतना जटिल बना दिया जाए कि इसमें हुई अनियमितता का पता ही नहीं चल सके.

अगला झटका

कर्ज भुगतान को लेकर उठा विवाद अभी थमा भी नहीं था कि जून 2015 में केयर्न इंडिया के शेयरहोल्डर्स को वेदांत इंडिया और केयर्न इंडिया के विलय की खबर से बड़ा झटका लगा.

31 मार्च 2015 को वेदांत पर कुल कर्ज करीब 35,000 करोड़ रुपये का था. एकीकृत आधार पर यह रकम 72,000 करोड़ रुपये से भी अधिक है. जबकि केयर्न इंडिया के पास लगातार हो रहे मुनाफे के अलावा 17,000 करोड़ रुपये की भारी नकदी है.

केयर्न इंडिया के शेयरधारकों के हितों के खिलाफ होने की खबरों के सामने आने के बावजूद स्टॉक एक्सचेंज ने 10 सितंबर को इस डील की मंजूरी दे दी. 14 सितंबर को बंबई स्टॉक एक्सचेंज ने वेदांत इंडिया से कर्ज भुगतान को लेकर स्पष्टीकरण की मांग की. अगले दिन कंपनी ने वहीं जवाब दिया जो उसने 30 जून 2014 की समाप्त तिमाही के परिणाम जारी करते वक्त दिया था.

कोर्ट ने केयर्न इंडिया और वेदांत इंडिया से 5 जनवरी तक अपना जवाब देने को कहा है. हमने याचिका में लगाए गए आरोपों के संदर्भ में अग्रवाल को सवालों की सूची भेजी है.

  • केयर्न इंडिया और वेदांत इंडिया का विलय कंपनी एक्ट के खिलाफ है.
  • विलय केयर्न इंडिया और इसके सार्वजनिक शेयरधारकों के हितों के खिलाफ है.
  • केयर्न इंडिया ने डायरेक्टर्स ने अपनी ड्यूटी के खिलाफ जाकर काम किया है.

वेदांत लिमिटेड में ग्रुप कम्युनिकेशंस के प्रेसिडेंट रोमा बलवानी ने कहा, 'हम सभी आरोपों का खंडन करते हैं और यह साफ करना चाहते हैं कि वेदांत लिमिटेड और केयर्न इंडिया समेत उसकी सब्सिडियरी कंपनी अपनी सभी गतिविधियों और संचालन में भारत के नियमों और कानूनों का निर्वहन करती है.

केयर्न इंडिया और वेदांत के बीच प्रस्तावित विलय और आपने जिस लोन ट्रांजैक्शंस का जिक्र किया है वह पूरी तरह से कंपनी एक्ट और लिस्टिंग के नियमों के मुताबिक है.'

 

First published: 21 December 2015, 7:40 IST
 
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