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एमनेस्टी का देशद्रोह: यह हमारे पक्षपातपूर्ण रवैए और कानून के दुरुपयोग का एक और नमूना है

कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन के विरुद्ध एमनेस्टी इंडिया की लड़ाई को सरकार ने देशद्रोह करार देकर इस स्वतंत्रता दिवस पर उन्हें हथकड़ी पहनाने का फैसला किया.

दरअसल एमनेस्टी इंडिया ने कई शहरों में चलने वाले अपने कार्यक्रम 'ब्रोकेन फेमिली' का शुभारंभ बेंगलुरु के यूनाइटेड थियोलॉजिकल कॉलेज परिसर में 13 अगस्त से किया था.

एबीवीपी ने इस कार्यक्रम में कथित तौर पर भारत-विरोधी नारे लगाने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया.

एमनेस्टी इंडिया ने अपना कार्यक्रम उस मुहिम के तहत आयोजित किया था, जिसके बारे में पहले से सार्वजनिक सूचना थी. यह रिपोर्ट- 'इनकार: जम्मू-कश्मीर में सैनिकों द्वारा मानवाधिकार हनन की जवाबदेही में विफलता' नाम से थी जिसे जुलाई 2015 में प्रकाशित किया गया था.

रिपोर्ट उन कठिनाइयों का जिक्र करती है जो मानवाधिकारों का हनन करने वालों के खिलाफ न्याय पाने के रास्ते में आती है. इसका मानना है कि यह उल्लंघन भारतीय सैनिकों ने जम्मू-कश्मीर में किया.

यह रिपोर्ट सशस्त्र सेना (जम्मू और कश्मीर) विशेषाधिकार अधिनियम (अफ्स्पा) की धारा 7 पर खासतौर से ध्यान केंद्रित करती है, जो सैनिकों को इस बात की छूट देती है कि कथित मानवाधिकारों के हनन के लिए उन पर सिविल कोर्ट में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.

आफ्स्पा के तहत मानवाधिकारों का उल्लंंघन करने वाले सैनिकों पर सिविल कोर्ट में केस दर्ज नहीं कराया जा सकता

एमनेस्टी की इस मुहिम में बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली आदि शहरों में कार्यक्रमों के दौरान कश्मीर की उन महिलाओं को भी शामिल करने की योजना थी जिन्होंने अफ्स्पा के कारण अपने परिजनों को खोया. इसका मकसद आमजनों के साथ संवाद और भारत बाकी हिस्से द्वारा उनके दुख में सहानुभूति प्रकट करना था.

पर शनिवार (13 अगस्त) को इस पूरी योजना ने एक अप्रत्याशित मोड़ लिया. यह कार्यक्रम, जो अस्थाई दर्शकों के साथ शांति से चल रहा था, अपने आखिरी मुकाम पर उस समय भड़क गया, जब पैनल का एक सदस्य भारतीय सेना के पक्ष में बोलने लगा.

ऑडियंस के बीच कुछ लोग भी चिल्लाने लगे, नारे लगाए गए और एमेस्टी ने शांति बनाए रखने की गरज से अपना कार्यक्रम समय से पहले ही समाप्त कर दिया.

दो दिन बाद, एबीवीपी के सदस्यों ने एमनेस्टी इंडिया की पूरी संस्था के खिलाफ देशद्रोह की शिकायत दर्ज कराई. आरोप था कि आतंकवाद के पक्ष में, पाकिस्तान और आईएसआई के पक्ष में राष्ट्र-विरोधी, भारत-विरोधी नारों से लेकर शारीरिक हिंसा की गई. एमनेस्टी ने एक स्टेटमेंट में हर आरोप का खंडन किया, जो यहां जारी किया गया.

एफआईआर आईपीसी धारा-142, 143, 147, 124-ए, 153-ए के तहत दर्ज कराई गई है.

इसके विरुद्ध प्रतिक्रिया करने से पहले एमनेस्टी इंडिया एफआईआर की विस्तृत कॉपी का इंतजार करेगा.

देशद्रोह पर दोहरा रवैया

एमनेस्टी के साथ घटी इस घटना के एक दिन बाद, भारत के 70वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर मेरठ में एबीएचएम के कार्यालय पर अखिल भारतीय हिंदू महासभा के सदस्यों ने भारतीय संविधान के विरोध में 70वां 'काला दिवस' मनाने के लिए काले झंडे लहराए.

हिंदू संस्था के नेताओं का दावा है कि वे भारत को 'हिंदू राष्ट्र' घोषित करने की मांग और भारत को धर्मनिरपेक्ष देश घोषित करने वाले संविधान का विरोध करने के लिए पिछले 69 सालों से 15 अगस्त को 'काला दिवस' के रूप में मना रहे हैं. पर मेरठ में राज्य की पुलिस को सार्वजनिक रूप से भारत का विरोध करने वाले इन तत्वों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की.

पत्रकार सीमा मुस्तफा कहती हैं, 'देशद्रोह का कानून मूलत: उन लोगों को डराने-दबाने के लिए जानबूझकर उपयोग में लिया जाता है, जो इस सरकार के कार्यों से असहमत हैं.'

मुस्तफा एमनेस्टी के कार्यक्रम के एक सेशन में हिस्सा ले रही थीं. उन्हें भारत-विरोधी नारे और विरोध को उकसाने के लिए एबीवीपी की शिकायत में खासतौर से निशाना बनाया गया है. वे पूछती हैं, 'गरीबी या मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ विरोध करना भारत-विरोधी कैसे है?' वे आगे कहती हैं, 'आज कश्मीरी आजादी के नारे लगा रहे हैं. उन मानदंडों के हिसाब से तो पूरी घाटी के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया जाना चाहिए.'

एमनेस्टी इंडिया के वरिष्ठ नीति सलाहकार शैलेश राय के मुताबिक, इवेंट का मकसद उस माफी पर एक खुली बहस करना था, जो कश्मीर में सुरक्षा बलों को प्राप्त है. राय कहते हैं, 'महबूबा मुफ्ती ने कहा है कि संवाद ही एक रास्ता है. कल लाल किले से पीएम ने कहा कि यह कश्मीरियों का नसीब है कि उन्हें शेष भारत जैसी ही आजादी है. अब एमनेस्टी इंडिया का वही बात कहना देशद्रोह कहा जा रहा है. ऐसे इवेंट्स के दौरान उत्तेजित होना स्वाभाविक है. वास्तविक हिंसा से ध्यान हटाने के लिए इन मुद्दों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है.'

देशद्रोह कानून की अप्रासंगिकता

यह घटना भारत में अनोखी है क्योंकि पहली बार किसी नागरिक समाज संगठन के विरुद्ध देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया है. अब तक देशद्रोह का जुर्म केवल व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज किया गया है, एनजीओ के खिलाफ कभी नहीं.

एमनेस्टी इंडिया ने अपनी प्रेस-विज्ञप्ति में इस बात पर जोर दिया है कि इवेंट के आयोजन से पहले उसने पुलिस से सभी आवश्यक अनुमति ले ली थी. एमनेस्टी इंडिया के कार्यकारी निदेशक आकार पटेल ने टीवी मीडिया से बात करते हुए बताया कि किसी इवेंट में जो जनता कहती है, उसके लिए आयोजक को पूरी तरह से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, ठीक उसी तरह से जब उनका सदस्य कभी देशद्रोही टिप्पणी कर दे तो टेलीविजन चैनल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

वरिष्ट वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि पुलिस की कार्रवाई चिंतनीय है. महज नारेबाजी, यदि कोई उसे आपत्तिजनक पाता है, तो भी उस पर देशद्रोह का आरोप नहीं लगाया जाना चाहिए. देशद्रोह के जुर्म की लंबे समय से विधिक पंडित आलोचना करते रहे हैं, और अस्पष्ट होने के कारण उसे निर्मम भी कहा जाता है.

अभिषेक मनु सिंघवी के मुताबिक महज नारेबाजी किसी पर देशद्रोह का आरोप लगाने के लिए पर्याप्त कारण नहीं हो सकता

हाल में जब जेएनयू आंदोलन शिखर पर था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विद्वान लॉरेंस लियांग ने विरोध को मौलिक अधिकार बताया था. उन्होंने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए, इतनी अस्पष्ट है कि इसका इस्तेमाल सभी और किसी भी मामले में किया जा सकता है.

धारा कहती है कि 'जो भी'...शब्दों, कार्यों या हाव-भाव से देश का अनादर करता है, उस पर देशद्रोह का आरोप लगाया जा सकता है. और चूंकि कानून में 'जो भी' को परिभाषित नहीं किया गया है, सरकार या उनके हरकारे किसी भी व्यक्ति और किसी भी संस्था या कंपनी अथवा दोनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर सकते हैं, चाहे वह एनजीओ हो या व्यक्ति या कारपोरेशन.

इस मामले का एक और पहलू है. केंद्र ने अब एमनेस्टी इंडिया के एफसीआरए नियमों की जांच-पड़ताल और धन जुटाने के स्रोत जांचने का फैसला किया है. हाल के दिनों में सरकार ने एनजीओ पर 'शिकंजा कसा है', खासकर उन पर जो ग्रीनपीस और फोर्ड फाउंडेशन से चंदा ले रहे हैं.

एनजीओ की बात मानने की वजह है क्योंकि केंद्र केवल उन लोगों के खिलाफ कदम उठा रहा है, जो बीजेपी के सत्ता में आने से पहले उनकी, उनकी नीतियों और कार्यों की आलोचना कर रहे थे. जैसे ही एनजीओ को पैसा मिलने पर रोक लगा दी जाएगी, एनजीओ अपनी दुकान बंद करने को बाध्य हो जाएंगे.फिलहाल एमनेस्टी ने कश्मीरी मांओं का दौरा स्थगित कर दिया है. योजना के अनुसार अब यह मुंबई में तुरंत आयोजित नहीं होगा. आगे बड़ी मुश्किल लड़ाई है और उन्हें खुद को बचाए रखने के लिए पहले से ज्यादा एकजुट होने की जरूरत है ताकि वे दूसरों को न्याय दिलाने के लिए लड़ सकें.

First published: 18 August 2016, 7:48 IST
 
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