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'अहंकारी अरविंद ने जनता को जनलोकपाल पर मूर्ख बनाया': आप विधायक

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 3 December 2015, 7:57 IST
QUICK PILL

दिल्ली के तिमारपुर विधानसभा क्षेत्र से दूसरी बार आम आदमी पार्टी के विधायक बने पंकज पुष्कर ने मौजूदा जनलोकपाल विधेयक के खिलाफ मुहिम छेड़ दी है. पार्टी के रुख से खुद को अलग करते हुए पुष्कर ने कहा है कि अरविंद केजरीवाल जो कर रहे हैं वह दरअसल आप के अस्तित्व के साथ खिलवाड़ है.

जिस जनलोकपाल के मुद्दे पर वे आंदोलनकारी से नेता बने अब उसी की हवा निकालने का काम कर रहे हैं. पुष्कर के मुताबिक अरविंद केजरीवाल ने जनता के साथ धोखा किया है.

उन्होंने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर कई दूसरे कई गंभीर आरोप भी लगाए हैं. साथ ही उन्होंने पार्टी के एक अन्य विधायक नितिन त्यागी पर आरोप लगाया है कि त्यागी ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी है.

पंकज पुष्कर से हुई विशेष बातचीत के अंश

आपको जान से मारने की धमकी किसने दी है?


वैसे तो पूरे सदन के अंदर ही डर और असहिष्णुता का माहौल है. दिल्ली विधानसभा में अपशब्दों और गालियों का प्रयोग होने लगा है. व्यक्तिगत रूप से हमारे ही पार्टी के विधायक हैं नितिन त्यागी. उन्होंंने मुझे जान से मारने की धमकी दी है.

केजरीवाल सरकार के जनलोकपाल बिल-2015 में आपको गड़बड़ी लगती है?


यह बिल कैबिनेट में पास होने से पहले विधायकों को दिखाया तक नहीं गया. केजरीवाल सरकार इस बिल को अंत समय तक छुपा रही थी. यह पर्देदारी क्यों थी, मेरी समझ में नहीं आया. वादे के अनुसार बिल की कॉपी को जनता के सामने क्यों नहीं रखा गया. बिल पर विधायक दल में भी कोई चर्चा नहीं हुई.

जनलोकपाल का मुद्दा पार्टी और सरकार से कहीं बड़ा है. यह हमारी पार्टी की नींव है. पार्टी इसी जनलोकपाल के मुद्दे पर बनी थी. आम आदमी पार्टी को जनलोकपाल के मुद्दे पर कोई बहाना या कोई समझौता नहीं करना चाहिए. केजरीवाल रामलीला मैदान में किए वादे से बच और भाग रहे हैं. ये मेरी चिंता का कारण है.

नया बिल हमारे पुराने जनलोकपाल का बिलकुल उल्टा है. जनलोकपाल का मूल सिद्धांत है कि यह संस्था सरकार और राजनीति से पूरी तरह मुक्त रहेगी. इस बिल में जनलोकपाल के बुनियादी सिद्धांत से ही समझौता कर लिया गया. दिल्ली सरकार के बिल में लोकपाल का चयन करने वाले चार लोगों में से तीन राजनीतिक है. उत्तराखंड की कांग्रेसी सरकार ने लोकपाल बिल में विधानसभा अध्यक्ष को नहीं रखा है लेकिन दिल्ली सरकार ने विधानसभा अध्यक्ष को रखा है.

दूसरा, लोकपाल को हटाने की शक्ति आप उन लोगों को नहीं दे सकते जिनकी जांच करनी है. इस बिल में विधानसभा के पास लोकपाल को हटाने का अधिकार दे दिया गया जबकि लोकपाल को विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री की ही जांच करनी है. इस बिल का विरोध पूर्व जस्टिस संतोष हेगड़े ने भी किया है. अन्ना ने भी दिल्ली सरकार को फटकार लगाई है. आज सिविल सोसाइटी के पांच लोगों में सिर्फ अरविंद ही राजनीति में है.

प्रशांत-योगेंद्र जैसे लोगों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा गया. क्या आपको लगता है कि अरविंद तानाशाह की तरह व्यवहार कर रहे हैं?


दरअसल तानाशाही के लक्षण बिलकुल साफ हैं. यह वास्तव में पार्टी विरोधी प्रवृति है. जो पार्टी स्वराज के मुद्दे पर बनी है उसमें अगर आपकी तानाशाही होगी तो पार्टी खत्म हो जाएगी.

क्या आपके ऊपर भी पार्टी कोई कार्रवाई कर रही है?


मैं एमएलए बनने के लिए राजनीति में नहीं आया था. मैं व्यवसाय से प्राध्यापक और पत्रकार हूं. विधायक नहीं रहने पर भी मैं जनसेवा करता रहूंगा. विधायकी से बड़ी चिंता है कि इस देश के साथ क्या होगा, दिल्ली के साथ क्या होगा. साफ राजनीति की जो उम्मीद पैदा हुई थी उस हौसले का क्या होगा?

बिल की कॉपी मिलने के बाद क्या आपकी बात केजरीवाल या मनीष सिसोदिया से हुई?


बातचीत की स्थिति ये है कि पत्रों के जवाब नहीं आते हैं. केजरीवाल ने पूरी तरह से संवादहीनता की स्थिति पैदा कर दी है. उनके घर पर जाने पर भी वो नहीं मिलते हैं. घर पर होते हुए भी मना कर देते हैं. मुझको विधायक दल की बैठक में नहीं बुलाया जाता. उन्होंने संवाद की गुंजाइश खत्म कर दी है. यह बहुत चिंता और दुख की बात है.

अरविंद में चुनाव जीतने से पहले और चुनाव जीतने के बाद क्या बदलाव आया है?


बदलाव पूरा साफ दिख रहा है. वो अब राजा हो गए हैं. हालांकि, राजा भी कई बार अकेला हो जाता है, लोगों से कट जाता है और स्वार्थी-चापलूस लोगों से घिरा रहता है. मुझे लगता है कि अरविंद के साथ यही हुआ है. इसमें दोष उनका ही है. अगर आपको जिंदाबाद करने वाले, चापलूस लोग पसंद होंगे तो आप वैसे ही लोगों से घिरते जाएंगे. अरविंद आलोचकों को पास रखना बिलकुल भूल गए हैं. वे आलोचकों को बर्दाश्त ही नहीं कर पाते. अरविंद का जितना भला उनके चापलूस चाहते हैं उनसे सौ गुणा ज्यादा में चाहता हूं लेकिन देशहित के आगे मैं अरविंद जिंदाबाद के नारे नहीं लगा सकता.

अरविंद पूरी तरह से अहंकारी हो गए हैं और चापलूस लोगों से घिरे हुए हैं. अब उनको डर लगने लगा है. ऐसा तब होता है जब राजा को अपनी कुर्सी का डर हो. ऐसी स्थिति में केवल एक ही चिंता सर्वोपरि रह जाती है कि उसकी कुर्सी को बचाने वाले साथी कौन हैं. अरविंद बस अब अपनी कुर्सी की चिंता करते हैं.

आज की तारीख में पार्टी को कौन लोग चला रहे हैं?


आप में पार्टी विरोधी तत्वों का प्रभाव बढ़ गया है. जो आंदोलन से नहीं निकले है या उस भावना से नहीं जुड़े हैं उनका कब्जा पार्टी पर हो गया है. इसके अलावा मुझे लग रहा है कि कुछ प्राइवेट लॉबियों का दबाव भी केजरीवाल सरकार पर है. न जाने क्या मजबूरियां अरविंद और मनीष के सामने हैं जो उनके आगे झुके झुके नजर आते हैं. मुझको बहुत गंभीर खतरे दिखाई दे रहे हैं.

अरविंद की जो छवि जनता के सामने हैं उनसे किस तरह वो अलग हैं?


मैं उन्हें अच्छी तरह से जानता हूं लेकिन व्यक्तिगत चरित्र पर चर्चा करना मर्यादा के खिलाफ होगा. मैं बहुत सारी ऐसी बातें जानता हूं जो कहना उचित नहीं होगा. संबंधों की मर्यादा के कारण उन बातों को रहने दे. अब वह पुरानी छवि को छोड़कर  नई छवि बना रहे हैं. इसके लिए वे 520 करोड़ रुपए की भारी भरकम राशि खर्च कर रहे हैं. उनका विश्वास इतना हिला हुआ है कि एक दिन में दस बार रेडियो पर विज्ञापन देने की जरूरत महसूस होती है. मीडिया को मैनेज किया जाता है.

पार्टी जिस उद्देश्य से बनी थी उसके साथ ही धोखा कर रही है. सरकार चर्चा नहीं चाहती है. सरकार लोगों को सुनना नहीं चाहती है. एक झूठ को बार बार बोला जाता है. कार्यकर्ताओं को कठपुतली बना दिया गया है.

First published: 3 December 2015, 7:57 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

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