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पशुधन की नई 'देशी' नस्ल

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 26 August 2016, 13:31 IST

भारत ने इस साल पशुधन और कुक्कुट (पॉल्ट्री) की नौ नई 'देशी' नस्लों की पहचान की है और उसका पंजीकरण कराया है. अब 40 गायों और 13 भैंसों समेत स्वदेशी नस्लों की कुल संख्या 160 हो गई है. गायों, भैंसों और मुर्गे की नई नस्लों की पहचान और पंजीकरण का काम भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा किया जाता है.

पशुधन और मुर्गियों की नस्ल में नौ नई नस्लें जुड़ जाने से देश में देशी नस्लों की सूची 160 तक पहुंच गई है. पंजीकृत कराई गई नई नस्लों में से कुछ में अन्य देशी नस्लों की अपेक्षा बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा है.

पशुधन और मुर्गियों की जिन नौ नई नस्लों को पंजीकरण की स्वीकृति दी गई है उसमें गाय की एक, बकरी की दो, भेड़ की दो, सुअर की तीन और मुर्गे की एक नस्ल शामिल हैं.

राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, करनाल (एनबीएजीआर) के पास इन नस्लों के पंजीकरण का प्रभार है. यानी यह देश के पशुधन, कुक्कुट की पहचान और जीवद्रव्य के पंजीकरण के लिए नोडल एजेंसी है. पंजीकरण के लिए जो प्रस्ताव आते हैं, उन्हें नॉलेज, स्किल्स, तकनीक और स्थानीय समुदायों के बॉयोलॉजिकल संसाधनों के आधार पर जांचा-परखा और सत्यापित किया जाता है.

पशुधन और मुर्गियों की नस्ल में नौ नई नस्लें जुड़ जाने से देश में देशी नस्लों की सूची 160 तक पहुंच गई है

पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी करने के लिए कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. इसमें जेनेटिक मैटेरियल्स का डॉक्युमेन्टेशन भी शामिल है. नई पंजीकृत स्वदेशी नस्लों को अनुमति वैज्ञानिक साक्ष्यों पर दी गई है.

पंजीकरण की प्रक्रिया और डॉक्यूमेन्टेशन के पीछे विचार एक अधिकृत राष्ट्रीय डॉक्यूमेन्टेशन व्यवस्था बनाना है ताकि ज्ञात विशिष्टताओं के आधार पर महत्वपूर्ण सार्वभौमिक जेनेटिक नस्लों का संरक्षण हो सके.

पंजीकृत और पहचानी गई नस्लों में (नगालैंड), निकोबारी सुअर (निकोबार आइसलैंड), डूम सुअर (असम), बद्री गाय (उत्तराखंड), टेरेसा बकरी (निकोबार बकरी), कोडि अडू बकरी (तमिलनाडु), चीव्वाडू भेड़ (तमिलनाडु), केन्द्रपाड़ा भेड़ (ओडिशा), टेनी वो सुअर और कौनायेन चिकन (मणिपुर) शामिल है.

कुछ पंजीकृत प्रजातियों की सूची इस प्रकार है:

बद्री गाय (उत्तराखंड)

उत्तराखंड की देशज गाय की चमड़ी का रंग कई तरह का होता है. ज्यादातर ये काली, ब्राउन, लाल, सफेद और ग्रे रंग की होती हैं. अन्य नस्लों की तुलना में इनकी बीमारियों से प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा होती है. और पहाड़ी इलाकों और किसी भी जलवायु में आसानी से रह लेती हैं. राज्य में 16 लाख बद्री गायें हैं.

टेरेसा बकरी (निकोबार आइसलैंड)

टेरेसा बकरी निकोबार आइलैंड में पाई जाती है. इसमें बीमारियों से प्रतिरोधक क्षमता सबसे ज्यादा होती है. ये बकरियां आइलैंड की मूल निवासी नहीं है. इन्हें अंग्रेज उपनिवेशवादियों ने यहां पहुंचाा था. सरकार ने पिछले दशकों में इन बकरियों की नस्लों को विकसित करने की दिशा में काफी काम किया है और बकरी पालन में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा दिया है. वर्तमान में अनेक टेरेसा बकरियां कृत्रिम तरीके से निशेचन के जरिए पैदा की गई हैं.

भेड़ की चीव्वाडू नस्ल

मूल रूप से इस भेड़ का पालन-पोषण मांस और खेतों में खाद आदि डालने के लिए किया जाता है. सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में भेड़ की इस विशेष नस्ल की महत्वपूर्ण भूमिका है. विभिन्न सामाजिक, धार्मिक अनुष्ठानों में भी इसकी रस्म होती है. इस नस्ल की कुल कितनी भेड़ें हैं, इसका थोड़ा ही अनुमान है लेकिन पूरे दक्षिणी राज्यों विशेषकर तमिलनाडु में यह आम तौर पाई जाती है.

केन्द्रपाड़ा भेड़ (ओडिशा)

ओडिशा में कुल 1,23,000 केन्द्रपाड़ा भेड़ हैं. यह भेड़ विश्व में किसी भी नस्ल की तुलना में काफी अधिक संख्या में मेमने को जन्म देती है. फिशरीज एंड एनीमल रिसोर्सेज डेवलपमेन्ट (एफएआरडी) के एक साल तक चले लम्बे शोध के बाद इसकी खासियत का पता चला है. भेड़ का पालन-पोषण मांस के लिए किया जाता है.

निकोबार सुअर

निकोबार सुअर को आइलैंड की स्थानीय भाषा में हाउन कहा जाता है. इसका जुड़ाव स्थानीय संस्कृति और परम्पराओं से है. ये सुअर आइलैंड में स्थानीय जनजातियों के साथ निर्विघ्न घूमते रहते हैं. मांस के लिए लोग इसे पालते हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार यहां के जनजातीय लोग खेती से भली प्रकार वाकिफ नहीं हैं.

व्यापारिक उद्देश्य के लिए इन्हें नहीं पाला जाता है. मुक्त वातावरण में ये स्वच्छंद विचरते रहते हैं. इस नस्ल के सुअरों के लिए निकोबार का स्थानीय वातावरण पूरी तरह अनुकूल है और स्थानीय लोगों के साथ ये आराम से घुल मिल जाते हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार इन सुअरों के लुप्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया है और इसके संरक्षण के प्रयास जल्द करने की जरूरत है. 

First published: 26 August 2016, 13:31 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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