Home » इंडिया » Cauvery dispute: Karnataka assembly refuses to release water, Tamil Nadu set to move SC again
 

कावेरीः कर्नाटक का पानी देने से इनकार, तमिलनाडु फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

रामकृष्ण उपध्या | Updated on: 7 February 2017, 8:25 IST
QUICK PILL
  • कावेरी विवाद पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने कहा है, ‘यह बिल्कुल अलग तरह की स्थिति है. मेरा इरादा अदालत के आदेश को चुनौती देना नहीं है लेकिन हमें जनता ने चुनकर सत्ता में भेजा है, इसलिए मैं जनादेश को मानने को मजबूर हूं.
  • अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में 27 सितम्बर को होने वाली सुनवाई का इंतजार है क्योंकि तमिलनाडु सरकार पहले ही कर्नाटक के खिलाफ अवमानना याचिका लगाने पर विचार कर रही है. 

कावेरी नदी जल बंटवारे मामले पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को दरकिनार करते हुए कर्नाटक विधानसभा में शुक्रवार को सभी दलों ने एक साथ मिल कर सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर सरकार से कहा कि वह ‘पीने के पानी की जरूरत के अलावा’ कोई पानी नहीं छोड़ें. भाजपा के विपक्ष के नेता जगदीश शेट्टार और जनता दल के उप नेता वाईएसवी दत्ता ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया और रैठा संघ के के.एस. पुट्टैनैया ने इसका समर्थन किया. प्रस्ताव में कहा गया है ‘इस तनावपूर्ण हालात में जरूरी है कि सरकार यह आश्वासन दे कि मौजूदा भण्डारण से कावेरी बेसिन और बंगलोर के पीने के पानी की आवश्यकता पूरी करने के अलावा कोई पानी नहीं निकाला जाए.’

प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि कर्नाटक कृष्णा राज सागर, हेमवती, हरांगी और काबिनी का जल स्तर बेहद कम 27.6 टीएमसीएपफटी तक ही रह गया है और इससे बंगलोर और दूसरे कस्बों के 11 लाख लोगों की पेयजल जरूरतें पूरी करना मुश्किल है. प्रस्ताव में तमिलनाडु की मांग या सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कहीं जिक्र नहीं किया गया, जिसमें कर्नाटक को तमिलनाडु की 15 लाख एकड़ में खड़ी सांबा फसलों के लिए ज्यादा पानी देने के लिए कहा गया है. 

विधानसभा की कार्रवाई सुबह 11 बजे शुरू होनी थी लेकिन दो घंटे देर से शुरू हुई क्योंकि बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की मीटिंग में सभी दलों के प्रस्ताव की भाषा को लेकर एकमत नहीं थे. कथित तौर पर ये नेता इस बात पर सहमत हुए कि न्यायपालिका के साथ विवाद नहीं किया जाए लेकिन ‘सही बात’ बता दी जाए.’

मेरा इरादा न्यायपालिका को चुनौती देने का नहीं है, लेकिन मैं जनता की बात मानने को मजबूर हूं।

बहस में भाग लेने वाले लोग न्यायपालिका पर हमला करने से बचते नजर आए लेकिन कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से कर्नाटक की भावनाएं आहत हुई हैं. इसलिए वे चुप नहीं बैठेंगे. बहस का विषय था कि कर्नाटक के किसानों को भी 2.9 लाख एकड़ में खड़ी फसलों की सिंचाई और पीने का पानी जमा करने या रिजर्व में रखने के लिए मना कर दिया गया है. लेकिन तमिलनाडु अपनी अगली फसल के लिए पानी की मांग कर रहा हैै, जबकि उसके पास रिजर्व में पहले से ही काफी पानी जमा है. 

अदालत का अपमान नहीं

मुख्यमंत्री सिद्ध रामैया, जो कि स्वयं एक वकील हैं, ने न्यायपालिका के प्रति आदर भाव व्यक्त करते हुए ने कहा, उनका इरादा अदालत का अपमान करने का नहीं है.‘ हमारे चारों जल स्रोतों में केवल 27.6 टीएमसीएफटी पानी है, जबकि रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए मई 2017 तक 24.11 टीएमसीएफटी पानी की जरूरत पड़ेगी. हमें अपने पशु पक्षियों के लिए भी पानी चाहिए. अगर हम तमिलनाडु को पानी देते हैं तो क्या यह वापस मिलेगा?

उन्होंने कहा, तमिलनाडु में मेट्टूर में 52 टीएमसीएफटी पानी है लेकिन फिर भी यह कावेरी जल विवाद प्राधिकरण के आदेश पर कर्नाटक से ही पानी मांग रहा है.  

मुख्यमंत्री ने कहा, बीस साल पहले कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र ने चेन्नई में पेयजल की कमी दूर करने के लिए प्रत्येक ने कृष्णा बेसिन से 5 टीएमसीएफटी पानी तमिलनाडु को दिया था. ऐसा कहकर उन्होंने यह संकेत देने की कोशिश की कि वे ऐसा ही अब चाहते हैं.

सिद्धरामैया सरकार पर स्वेच्छा से सुप्रीम कोर्ट का आदेश न मानने का आरोप लगने की संभावना कम है.

उन्होंने कहा, ‘यह बिल्कुल अलग तरह की स्थिति है. मेरा इरादा अदालत के आदेश को चुनौती देना नहीं है लेकिन हमें जनता ने चुनकर सत्ता में भेजा है, इसलिए मैं जनादेश को मानने को मजबूर हूं.

कावेरी विवाद पर बुधवार की सर्वदलीय बैठक का बहिष्कार करने पर सफाई देने से बचते हुए भाजपा नेता जगदीश शेट्टार ने कहा राज्य के साथ ‘बहुत बड़ा अन्याय’ हुआ है क्योंकि अदालत ने यहां के तनावपूर्ण हालात पर ध्यान दिए बगैर बार-बार पानी छोड़ने की ही बात कही. उन्होंने कहा, यह सरकार पर निर्भर है कि वह अदालत के आदेश को कितना संवैधानिक मानती है, कितना नहीं. 

उन्होंने कहा, सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी सुपरवाइजरी कमेटी के आदेश में भी फेरबदल कर दिया, जिसने कर्नाटक को 3,000 क्यूसेक पानी छोड़ने को कह दिया और इसलिए यह प्रस्ताव कन्टैम्प्ट ऑफ कोर्ट नहीं माना जाएगा. 

कानूनी अड़चनें

अब सभी को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में 27 सितम्बर को होने वाली सुनवाई का इंतजार है क्योंकि तमिलनाडु सरकार पहले ही कर्नाटक के खिलाफ अवमानना याचिका लगाने पर विचार कर रही है. यह याचिका वह कर्नाटक द्वारा सुप्रीम कोर्ट का आदेश नहीं मानने के आरोप में लगाएगी. 

कर्नाटक के पूर्व महाधिवक्ता उदय होला ने कहा, कर्नाटक विधानसभा का अदालत पर हमला न करना सराहनीय है लेकिन इस बात की गारंटी नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट भी सरकार के प्रति सहानुभूति रखेगी. उन्होंने कहा, ‘बात दरअसल यह है कि कर्नाटक तमिलनाडु को पानी देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का विरोध कर रहा है.  विधायिका ने जनभावना को सर्वोपरि रखते हुए अपनी ड्यूटी निभाई है लेकिन किसी भी कानूनी मसले में अदालत का आदेश सर्वोपरि होता है और कोई भी इसके आदेश को न माने, यह इसे मंजूर नहीं है. क्या इसका मतलब यह माना जाए कि कर्नाटक को अदालत की अवमानना करने के परिणाम भुगतने होंगे?

होला का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही कावेरी जल प्रबंधन बोर्ड के गठन का आदेश दे दिया है, वह केंद्र को आदेश दे सकता है कि वह जल विवाद का त्वरित निपटारा करे और पानी छोड़ने का जिम्मा बोर्ड को दे दे. उन्होंने कहा ऐसा नहीं लगता कि अदालत की अवमानना पर सुप्रीम कोर्ट सरकार बर्खास्त करने जैसी कोई बात कहेगा. सिद्धरामैया सरकार पर इस संबंध में शायद ही जानबूझ कर अवमानना का आरोप लगे, इसलिए ऐसी संभावना कम ही है कि अदालत इस हद तक जाए.

एक अन्य महाधिवक्ता अशोक हरनल्ली ने कहा राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट में मुश्किल हो सकती है, भले ही विधानसभा की कार्यवाही से सकारात्मक संकेत मिलें’ 

उन्होंने कहा, इस बात की अत्यधिक संभावनाएं हैं कि सुप्रीम कोर्ट में मुख्य सचिव को बुलाया जाए और उनसे पूछा जाए कि अदालत के आदेश को क्यों नहीं माना गया? उन्होंने कहा ‘सुप्रीम कोर्ट अपने आदेश की पालना में कोताही की उम्मीद नहीं करता; इसलिए कर्नाटक सरकार द्वारा पारित प्रस्ताव सिद्धरामैया सरकार के लिए नैतिक आधार पर जीत से ज्यादा साबित नहीं होगा.

First published: 25 September 2016, 7:23 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी