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कावेरी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश नहीं मानेगा कर्नाटक

कैच ब्यूरो | Updated on: 23 September 2016, 19:21 IST
QUICK PILL
  • कावेरी नदी का पानी पड़ोसी राज्य तमिलनाडु को दिए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का यह एक पखवाड़े के भीतर तीसरा आदेश है.
  • कर्नाटक सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने की बजाय विधानसभा में ध्वनिमत से प्रस्ताव पारित कर दिया है. 
  • सर्वोच्च न्यायालय का आदेश नहीं मानने पर संवैधानिक गतिरोध की स्थिति पैदा हो गई है. न्यायालय इस आधार पर केंद्र सरकार से राज्य सरकार को बर्खास्त करने के लिए कह सकता है. 

कावेरी नदी का पानी पड़ोसी राज्य तमिलनाडु को दिए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट एक पखवाड़े के भीतर तीन आदेश दे चुका है. वहीं कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार ने अदालत के इस आदेश को मानने की बजाय इसके ख़िलाफ़ विधानसभा में ध्वनिमत से प्रस्ताव पारित कर दिया है. 

नदी के जल प्रवाह को तमिलनाडु से रोकने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवज्ञा का नतीजा काफी खतरनाक हो सकता है.

न्यायालय “संवैधानिक संकट” पैदा हो जाने के आधार पर केंद्र सरकार से राज्य सरकार को बर्खास्त करने के लिए कह सकता है. इसके बाद अदालत अपने इस आदेश की अनुपालना राज्य में राष्ट्रपति शासन के तहत करा सकती है.

 कांग्रेस शासन के अंतर्गत इस समय सिर्फ कर्नाटक ही बड़ा राज्य है, और सिद्धारमैया सरकार के कार्यकाल के अभी 20 महीने बाक़ी हैं. सवाल यह है कि अभी हाल ही में अरुणाचल प्रदेश गवांने के बाद कांग्रेस आला कमान कर्नाटक भी गंवाने का इतना बड़ा जोखिम उठाएगी. 

इस संकट पर चर्चा करने के लिए पिछले शनिवार को विधायिका का विशेष सत्र बुलाया गया जहां ध्वनिमत से सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विरुद्ध प्रस्ताव पारित हुआ. इससे पहले राज्य ने दो बार केंद्र से मामले में हस्तक्षेप के लिए लिखा था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी नहीं टूटी.

तमिलनाडु से उसके “सांबा” फसलों के लिए कावेरी नदी से जल छोड़े जाने के लिए कर्नाटक सरकार पर लगातार दबाव था.

दूसरी ओर जेडीएस, जिसका कावेरी घाटी में अधिक प्रभाव है, सिद्धारमैया का पूरी तरह से समर्थन कर रहा है और प्रदेश अध्यक्ष एचडी कुमारस्वामी ने इस बैठक में भाग लेने का आश्वासन दिया है. इन परस्पर कट्टर प्रतिद्वंद्वियों के बीच ऐसा सौहार्द दुर्लभ है. सिद्धारमैया ने पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा को मिलने और परामर्श के लिए आमंत्रित किया था. 

महीने की शुरूआत से ही, तमिलनाडु से उसके “सांबा” फसलों के लिए कावेरी नदी से जल छोड़े जाने के लिए कर्नाटक सरकार पर लगातार दबाव था. 

कर्नाटक राज्य से यह नदी बहकर तमिलनाडु होते हुए समुद्र में मिलती है. इस वजह से जल के प्रवाह में तमिलनाडु के हिस्से को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में वह बचाव की स्थिति में है. 

अदालत ने प्रारंभ में एक सप्ताह के लिए 15,000 क्यूसेक पानी प्रतिदिन छोड़े जाने का आदेश दिया था. इसके विरोध में राज्य स्तर पर प्रदर्शन हुए और यहां तक कि बेंगलुरु में बंद के दौरान हिंसा में 200 से अधिक वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया. 

यह विषय जब अदालत के सामने आया, तो उसने आदेश की तौहीन करने के लिए कर्नाटक सरकार को फटकारा और इस प्रकार उसे कथित अवमानना के लिए दंडित किया. इसके साथ अदालत ने 15,000 क्यूसेक प्रतिदिन से घटाकर 12,000 क्यूसेक पानी प्रतिदिन दिए जाने के आदेश के साथ 10 दिन की मोहलत बढ़ा दी.   

कर्नाटक की उम्मीदें अब केंद्रीय जल संसाधन सचिव की अध्यक्षता में तकनीकी विशेषज्ञों को लेकर गठित कावेरी निगरानी समिति पर टिकी थीं. कर्नाटक ने इसके सम्मुख अपना पक्ष प्रस्तुत किया कि इस साल 48 प्रतिशत कम वर्षा हुई है और वह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण ने सामान्य वर्षा वर्ष के लिए जो पानी दिए जाने की जो तालिका तैयार की है, वह उसके अनुसार पानी दे सकने में असमर्थ है.

First published: 23 September 2016, 19:21 IST
 
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