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कावेरी विवाद पर कर्नाटक ने नहीं माना सुप्रीम कोर्ट का आदेश, राज्य में संवैधानिक संकट

रामकृष्ण उपध्या | Updated on: 23 September 2016, 19:41 IST
QUICK PILL
  • कावेरी नदी का पानी पड़ोसी राज्य तमिलनाडु को दिए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का यह एक पखवाड़े के भीतर तीसरा आदेश है.
  • कर्नाटक सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने की बजाय विधानसभा में ध्वनिमत से प्रस्ताव पारित कर दिया है. 
  • सर्वोच्च न्यायालय का आदेश नहीं मानने पर संवैधानिक गतिरोध की स्थिति पैदा हो गई है और न्यायालय इस आधार पर राज्य सरकार को बर्खास्त करने के लिए केंद्र सरकार से कह सकता है.

कावेरी नदी का पानी पड़ोसी राज्य तमिलनाडु को दिए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का यह एक पखवाड़े के भीतर तीसरा आदेश है. कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार अदालत के इस आदेश से बेहद सकते में है. बावजूद इसके, उन्होंने आदेश मानने की बजाय इसके ख़िलाफ़ विधानसभा में ध्वनिमत से प्रस्ताव पारित कर दिया है.

नदी के जल प्रवाह को तमिलनाडु से रोकने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवज्ञा का नतीजा काफी खतरनाक हो सकता है. क्योंकि इससे संवैधानिक गतिरोध की स्थिति पैदा हो गई है और अब न्यायालय “संवैधानिक संकट” पैदा हो जाने के आधार पर राज्य सरकार को बर्खास्त करने के लिए केंद्र सरकार से कह सकता है. इसके बाद अदालत अपने इस आदेश की अनुपालना राज्य में राष्ट्रपति शासन के तहत करा सकती है. 

कांग्रेस शासन के अंतर्गत इस समय सिर्फ कर्नाटक ही बड़ा राज्य है, और सिद्धारमैया सरकार के कार्यकाल के अभी 20 महीने बाक़ी हैं. सवाल यह है कि अभी हाल ही में अरुणाचल प्रदेश गवांने के बाद कांग्रेस आला कमान कर्नाटक भी गंवाने का इतना बड़ा जोखिम उठाएगी, देखना है. 

संकट गंभीर, प्रधानमंत्री चुप

राज्य ने दो बार केंद्र से मामले में हस्तक्षेप के लिए लिखा था, इसके बावजूद इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी बरकरार रही. दूसरी ओर जेडीएस, जिसका कावेरी घाटी में अधिक प्रभाव है, सिद्धारमैया का पूरी तरह से समर्थन कर रहा है और प्रदेश अध्यक्ष एचडी कुमारस्वामी ने इस बैठक में भाग लेने का आश्वासन दिया है. इन परस्पर कट्टर प्रतिद्वंद्वियों के बीच ऐसा सौहार्द दुर्लभ है. सिद्धारमैया ने पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा को मिलने और परामर्श के लिए आमंत्रित किया था. 

गौड़ा ने पिछले सप्ताह नई दिल्ली में मोदी से मुलाकात कर उन्हें मानसून की विफलता के बाद कर्नाटक में मौजूदा गंभीर जल संकट की स्थिति से अवगत कराया था. सक्रिय भूमिका की मांग करते हुए गौड़ा ने चार बड़े जलाशयों की बात की थी और मीडिया के साथ भी उन्होंने अपनी टिप्पणी के साथ रिक्त जलाशयों के दृश्यों साझा किया था.

इस महीने की शुरूआत से ही, तमिलनाडु से उसके “सांबा” फसलों के लिए कावेरी नदी से जल छोड़े जाने के लिए कर्नाटक सरकार पर लगातार दबाव था. कर्नाटक राज्य से यह नदी बहकर तमिलनाडु होते हुए समुद्र में मिलती है. इस वजह से जल के प्रवाह में तमिलनाडु के हिस्से को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में वह बचाव की स्थिति में है. 

अदालत ने प्रारंभ में एक सप्ताह के लिए 15,000 क्यूसेक पानी प्रतिदिन छोड़े जाने का आदेश दिया. इसके विरोध में राज्य स्तर पर प्रदर्शन हुए और यहां तक कि बेंगलुरु में बंद के दौरान हिंसा में 200 से अधिक वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया.

इस साल 48 फ़ीसदी कम हुई बारिश

यह विषय जब अदालत के सामने आया, तो उसने आदेश की तौहीन करने के लिए कर्नाटक सरकार को फटकारा और इस प्रकार उसे कथित अवमानना के लिए दंडित किया. इसके साथ अदालत ने 15,000 क्यूसेक प्रतिदिन से घटाकर 12,000 क्यूसेक पानी प्रतिदिन दिए जाने के आदेश के साथ 10 दिन की मोहलत बढ़ा दी.   

कर्नाटक की उम्मीदें अब केंद्रीय जल संसाधन सचिव की अध्यक्षता में तकनीकी विशेषज्ञों को लेकर गठित कावेरी निगरानी समिति पर टिकी थीं. कर्नाटक ने इसके सम्मुख अपना पक्ष प्रस्तुत किया कि इस साल 48 प्रतिशत कम वर्षा हुई है और वह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण ने सामान्य वर्षा वर्ष के लिए जो पानी दिए जाने की जो तालिका तैयार की है, वह उसके अनुसार पानी दे सकने में असमर्थ है.

समिति ने संबंधित राज्यों से जलाशयों और खड़ी फसल की स्थिति, केन्द्रीय जल आयोग से आंकडे़, जो कि वह देश में 91 प्रमुख बांधों मॉनिटर द्वारा नियमित रूप से एकत्र करता है, आदि सभी प्रासंगिक जानकारियां प्राप्त कीं। उसने कर्नाटक को 3,000 क्यूसेक पानी प्रतिदिन छोड़ने से 30 सितंबर तक राहत दी जिसका कर्नाटक में व्यापक स्वागत किया गया.

अदालत ने इस पर नाराजगी जाहिर करते हुए सख्ती से कहा 'आप लोग कब तक इस तरह आपस में लड़ते रहेंगे.'

इस मामले को तय करने के लिए गठित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और उदित ललित की न्यायापीठ के सामने कर्नाटक सरकार अपना पक्ष स्वीकार कराने में कामयाब नहीं हो पाई. वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरीमन की दलील थी कि अब और पानी दिया जाना कत्तई मुमकिन नहीं है क्योंकि जलाशयों में मात्र 15 टीएमसीएपफटी पानी ही रह गया है, जो कि बेंगलुरू और मैसूर के लोगों ने पीने के लिए आवश्यक है. अदालत ने इस पर नाराजगी जाहिर करते हुए सख्ती से कहा 'आप लोग कब तक इस तरह आपस में लड़ते रहेंगे.'   

इसके पहले कई मौकों पर, सर्वोच्च न्यायालय ने निगरानी समिति द्वारा लिए गए निर्णयों को स्वीकार किया था. लेकिन, इस मामले में न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि, 'हमें एक विशेषज्ञ के रूप में पर्यवेक्षी समिति की जरूरत इसलिए है कि वह यह देखें कि पंच निर्णय कार्यान्वित किया गया है, और वह वर्षा की कमी एवं आपदा जैसे मुद्दों पर गौर करे. इस मामले में समिति ने  निर्णय किया है जो कि उसका काम नहीं है.' न्यायालय ने कर्नाटक द्वारा तमिलनाडु के लिए 27 सितंबर तक छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा दोगुनी कर 6,000 क्यूसेक पानी प्रतिदिन कर दी. अब अदालत 28 सितंबर को फिर से इस मामले की सुनवाई करेगी. हालांकि यह मामला अभी लंबित है. कर्नाटक को एक और झटका देते अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देशित किया है वह चार सप्ताह के भीतर कावेरी जल प्रबंधन बोर्ड (सीडब्ल्यूएमबी) का गठन करे.  

ज़रूरत है कावेरी जल प्रबंधन बोर्ड की

कावेरी न्यायाधिकरण ने अपने 2007 के अंतिम आदेश में पानी के वितरण के प्रबंधन के लिए कावेरी जल प्रबंधन बोर्ड (सीडब्ल्यूएमबी) के गठन की आवश्यकता का उल्लेख किया था, लेकिन कर्नाटक और तमिलनाडु सहित विवाद से संबंधित सभी पक्षों ने इस पर आपत्तियां प्रस्तुत की हैं जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अभी अलग से सुना जाना शेष है. 

सीडब्ल्यूएमबी में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष और दो पूर्णकालिक सदस्य होंगे, जो कि सिंचाई और कृषि के क्षेत्र में विशेषज्ञ होंगे. इन तीनों की नियुक्ति केंद्र सरकार के द्वारा होनी है. इसके अतिरिक्त मुख्य अभियंता की श्रेणी के दो अन्य अधिकारी केंद्र द्वारा नामित, और केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और पुडुचेरी प्रत्येक राज्य सरकारों से एक-एक प्रतिनिधि कमेटी के सदस्य होंगे. 

सीडब्ल्यूएमबी के गठन को लेकर कर्नाटक को सदैव आशंका रही है, कि बोर्ड उसके चारों जलाशयों, कृष्णराज सागर (केआएस), काबिनी, हरांगी और हेमावती पर नियंत्रण कर लेगा और इस तरह से पानी को विनयमित करेगा कि अन्य राज्यों को ही लाभ होगा.

हालांकि तमिलनाडु के जलाशय मेत्तूर, भवानी सागर  और अमरावती भी बोर्ड की निगरानी के अंतर्गत होंगे, तमिलनाडु को सिर्फ 7 हजार मिलियन क्यूबिक फीट ही जल पुडुचेरी को देना होगा जबकि कर्नाटक को बिलिगुडनलु से तमिलनाडु के लिए 192 हजार क्यूबिक फीट पानी देना सुनिश्चित करना होगा. 

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन कर्नाटक सरकार द्वारा दायर याचिका का हवाला देते हुए पूर्व महाधिवक्ता अशोक हरनाहाल्ली का कहना है, 'समझ में नहीं आता कि बोर्ड के गठन की ऐसी जल्दबाजी क्या है. यह लाजमी है कि कर्नाटक सरकार अब इस मामले में कड़ा रुख लेगी.'

मांड्या जिले के विधायकों और सांसदों ने इस्तीफा देने की पेशकश की है और कर्नाटक के अन्य सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों के द्वारा त्यागपत्र देने की मांग भी तेज हो रही है। बेंगलुरू और कर्नाटक के अन्य कावेरी घाटी के क्षेत्रों में खामोश बैचैनी उमड़ रही है। सामान्य जीवन का अस्त-व्यस्त होना तय है, बेंगलुरू में जो हुआ वह भयानक आगाज हो सकता है। अब जो भी है चीजे़ वैसी ही रहने वाली नहीं हैं, जैसी थीं। 

First published: 23 September 2016, 19:41 IST
 
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