Home » इंडिया » Censors wanted Pankaj Butalia to chop two scenes from his documentary on Kashmir. Delhi HC said no
 

कश्मीर और सेंशरशिप: फिल्म निर्देशक बुटालिया को मिली बड़ी जीत

सौरव दत्ता | Updated on: 16 February 2016, 22:48 IST
QUICK PILL
  • सेंसर बोर्ड ने बुटालिया की हालिया फिल्म टेक्सचर्स ऑफ लॉस से दो सीन काटने को कहा था. लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच ने कहा है कि सेंसर बोर्ड का यह फैसला अवैध और मनमाना है.
  • 25 मई को दिल्ली हाईकोर्ट के बेंच ने कहा था कि बुटालिया को उनकी निर्देशकीय स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाना चाहिए. सरकार ने इस फैसले के खिलाफ डिविजन बेंच में अपील की थी लेकिन उसे वहां झटका खाना पड़ा.

विचारधाराओं के बावजूद राजनीतिक दल कश्मीर को लेकर बेहद सतर्क रहते हैं. लेकिन 15 फरवरी को पंकज बुटालिया को अदालत से एक मामले में बड़ी जीत मिली है जो कश्मीर मुद्दे को लेकर सरकार की उस कोशिश को झटका दे सकती है जिसकी मदद से वह कश्मीर से जुड़े विचारों को सेंसर करती रही है.

सेंसर बोर्ड ने बुटालिया की हालिया फिल्म टेक्सचर्स ऑफ लॉस में दो सीन को काटे जाने की मांग की थी. लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा है कि सेंसर बोर्ड का यह फैसला अवैध और मनमाना है. फिल्म आतंकवाद की पीड़ा और आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी समस्याओं के बारे में बताती है. सेंसर बोर्ड ने बुटालिया को दो सीन काटने के लिए कहा था.

25 मई को दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि बुटालिया को उनकी निर्देशकीय स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाना चाहिए. सरकार ने इस फैसले के खिलाफ डिविजन बेंच में अपील की थी लेकिन उसे वहां झटका खाना पड़ा.

टर्निंग प्वाइंट

आदर्श तौर पर एक डॉक्यूमेंट्री निर्माता को इस बात का अधिकार होना चाहिए कि वह क्या दिखाना चाहता है और क्या नहीं. उसके वाक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा मामला है. हालांकि सेंसर बोर्ड को बुटालिया की फिल्म के कुछ हिस्से आपत्तिजनक लगे और बोर्ड ने इन सीनों को डिस्क्लेमर के साथ चलाने के लिए कहा.

डिस्क्लेमर में कहा गया था, 'डॉक्यूमेंट्री में दिखाए गए विचार पूरी तरह से निजी विचार हैं. इसका मकसद किसी भी व्यक्ति, जाति, समुदाय, धर्म, संस्थान और संगठन को बदनाम या उसे नुकसान पहुंचाना नहीं है.' इसके अलावा सेंसर ने दो सीन को काटे जाने भी मांग की थी.

राहत की उम्मीद

दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों दृश्यों को फिल्म में बनाए रखे जाने का आदेश दिया है. बुटालिया को इस फैसले से निराशा हुई थी. उन्होंने कहा कि मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं धमकाया जा रहा हूं क्योंकि कोर्ट मुझसे कुछ ऐसा करने को कह रहा था जिसकी इजाजत कानून नहीं देता है.

बुटालिया के मुताबिक सेंसरशिप के दिशानिर्देश संविधान के अनुच्छेद 19(2) से ज्यादा सख्त हो रहे थे. वास्तव में निर्देशक ने सेंसरशिप की वैधता को चुनौती दी और दिल्ली हाई कोर्ट इस मामले में सुनवाई कर रही है. इस मामले की अगली सुनवाई अप्रैल महीने में होनी है बावजूद इसके बुटालिया अंतिम फैसले को लेकर ज्यादा सकारात्मक हैं. 

First published: 16 February 2016, 22:48 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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