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खेसारी दाल से पाबंदी हटाकर छत्तीसगढ़ को 'दाल का कटोरा' बनाने की तैयारी

शिरीष खरे | Updated on: 26 January 2016, 20:24 IST
QUICK PILL
  • दाल संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार करीब पांच दशक पहले स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिबंधित की जा चुकी खेसारी दाल को वापस लाने की तैयारी कर रही है.
  • सरकार का कहना है कि खेसारी दाल की तीन नई किस्में स्वास्थ्य की दृष्टि से \r\nतो अनुकूल हैं ही, इसके चलते पैदावार भी कई गुना बढ़ जाएगी.
  • हर साल देश में 220 लाख टन दाल की खपत होती है. इसमें से लगभग 40 लाख टन दाल भारत, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया आदि देशों से आयात करता है.
  • यानी कुल खपत का 20 प्रतिशत आयात होने वाली दाल से उबरने के लिए केंद्र सरकार खेसारी दाल से प्रतिबंध हटाने की तैयारी कर रही है.
छत्तीसगढ़ में लंबे समय से खेसारी दाल की पारंपरिक खेती की जाती है. जब देश में इसकी खेती प्रतिबंधित थी तब भी यहां 3 लाख 47 हजार हैक्टेयर में खेसारी दाल की खेती की जाती है.

मानव शरीर को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए वैज्ञानिकों ने जिन खेसारी की तीन नई किस्में ईजाद की हैं. इनमें प्रतीक और महातिवड़ा किस्में छत्तीसगढ़ के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने ही तैयार की हैं.

केंद्र सरकार 54 साल से खेसारी दाल पर लगी पाबंदी हटाने की तैयारी कर रही है. एक तरफ इस दाल के सेवन से शरीर को होने वाले नुकसान को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दालों की लगातार बढ़ती मांग के चलते कुछ लोग सरकार के इस कदम को जायज भी ठहरा रहे हैं.

सरकार का कहना है कि खेसारी दाल की तीन नई किस्में स्वास्थ्य की दृष्टि से तो अनुकूल हैं ही, इसके चलते पैदावार भी कई गुना बढ़ जाएगी.

केंद्र सरकार 54 साल से खेसारी दाल पर लगी पाबंदी हटाने की तैयारी कर रही है

गौरतलब है कि खेसारी दाल खाने से पैरों में लकवा मारने की शिकायतों के बाद केंद्र ने 1961 में खेसारी की खेती पर रोक लगा दी थी. मगर अब कृषि मंत्रालय ने खेसारी की खेती पर प्रतिबंध हटाने का प्रस्ताव भारतीय खाद्य सुरक्षा व मानक प्राधिकरण, नई दिल्ली को भेजा है. मंत्रालय के मुताबिक नई किस्मों में नुकसानदायक तत्वों की मात्रा को सौ गुना तक कम कर दिया गया है.

खेसारी दाल पर सरकार का रुख बदलने के लिए जिन राज्यों ने मजबूर किया उनमें छत्तीसगढ़ अग्रणी है. यह राज्य बीते कुछ वर्ष से खेसारी दाल की नई प्रयोगशाला बन गया है. यहां न केवल खेसारी दाल की नई-नई किस्मों को तैयार करने के लिए अनुसंधान कार्य चल रहे हैं, बल्कि अधिक से अधिक पैदावार बढ़ाने के लिए परियोजनाएं भी संचालित की गई हैं.

यही वजह है कि राज्य में इसकी खेती के रकबे और उत्पादन के आंकड़ों में बढ़ोत्तरी के बाद उत्साहित होकर सरकार ने अब इसकी खेती से प्रतिबंध हटाने की पहल की है.

पढ़ें: जहरीली खेसारी दाल को वापस लाने के मायने

छत्तीसगढ़ को दाल का प्रमुख उत्पादक राज्य बनाने की पूरी योजना खेसारी दाल से पाबंदी हटाने पर निर्भर है. दरअसल, दालों के संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार जिस खेसारी की नई किस्मों को बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है उसके लिए छत्तीसगढ़ सबसे उपयुक्त है. वजह है कि यह पाबंदी के बावजूद प्रदेश के 3 लाख 47 हजार हैक्टेयर में खेसारी की खेती की जाती है. देश में इसका सालाना उत्पादन साढ़े तीन लाख टन से अधिक है, जिसमें अकेले छत्तीसगढ़ का योगदान 60 प्रतिशत है.

अहम तथ्य यह है कि इससे मानव शरीर को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए वैज्ञानिकों ने जिन तीन नई किस्मों को ईजाद किया है उनमें प्रतीक और महातिवड़ा छत्तीसगढ़ के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने ही तैयार की हैं. कृषि वैज्ञानिकों ने इस दाल की अधिक से अधिक पैदावार के मकसद से बिलासपुर और दुर्ग के खेतों को प्रयोगशाला के तौर पर चुना है.

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों का दावा है कि सूखे और कम पानी के बावजूद दाल की इन किस्मों की खेती से प्रति हैक्टेयर 18 क्विंटल से भी ज्यादा उत्पादन संभव है. रबी की यह फसल बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, कवर्धा, रायपुर, बालोद और बेमेतरा जिलों में उगाई जाती है.

पाबंदी के बावजूद छत्तीसगढ़ के 3 लाख 47 हजार हैक्टेयर में खेसारी की खेती की जाती है

आंकड़े बताते हैं कि पाबंदी से पहले अकेले खेसारी दाल का राष्ट्रीय उत्पादन दस लाख टन था, जिसका ज्यादातर हिस्सा छत्तीसगढ़ से था. भारत में कनाडा और आस्ट्रेलिया से प्रतिवर्ष करीब 40 लाख टन दाल आयात होती है. लिहाजा दाल के मामले में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए छत्तीसगढ़ को अब 'दाल का कटोरा' बनाने की तैयारी की जा रही है.

अंतराष्ट्रीय शुष्क फसल अनुसंधान संस्थान, मोरक्को और केंद्र सरकार ने मिलकर प्रदेश में खोसारी दाल की पैदावार को बढ़ावा देने के लिए परियोजना चलाई है. इसके तहत कृषि विश्वविद्यालय की ओर से बिलासपुर जिले में खेसारी दाल को खाने के बाद स्वास्थ्य संबंधी नुकसान को और अधिक कम करने के लिए दो-एक साल में कुछ नई किस्में ईजाद की जा सकती हैं.

इस साल दुर्ग जिले में खेसारी दाल की नई किस्मों को 162 हैक्टेयर में उगाया गया है. कृषि विश्वविद्यालय ने इस साल 600 क्विंटल सुरक्षित बीज किसानों को बांटे. कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक इससे छत्तीसगढ़ दो फसली पैदावार लेने वाला राज्य बनेगा और मवेशियों के लिए चारे की समस्या का समाधान भी होगा.

छत्तीसगढ़ इंदिरा गांधी कृषि राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, रायपुर में  पादप प्रजनन के प्रमुख वैज्ञानिक और अखिल भारतीय दलहन योजना के प्रभारी डॉ. एचसी नंदा राज्य में खेसारी दाल की पैदावार को बढ़ावा देने को लेकर लगातार कार्य कर रहे हैं. उनका कहना है कि बीते 25-30 सालों से नुकसान का कोई मामला सामने नहीं आया है.

मगर इस दाल को और ज्यादा सुरक्षित किस्म बनाने के प्रयोग जारी है. सामान्य दाल के मुकाबले इसमें प्रोटीन काफी अधिक होता है. वे बताते हैं कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में इसकी खेती यदि प्रचलन में है तो इसकी वजह है कि छत्तीसगढ़ के किसान खरीफ की धान के बाद खाली पड़े खेतों में खेसारी के बीज डालकर छोड़ देते हैं. इससे 90 दिनों में फसल तैयार हो जाती है.

अब नए किस्मों के सेवन से भी सेहत खराब होती है या नहीं, यह तो आने वाले समय में होने वाले अनुसंधानों पर निर्भर है.

First published: 26 January 2016, 20:24 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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