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भाजपा का विपक्षमुक्त भारत: अरुणाचल, उत्तराखंड के बाद दिल्ली की बारी!

आकाश बिष्ट | Updated on: 13 April 2016, 10:39 IST

अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों को अस्थिर करने के बाद लगता है केंद्र सरकार का अगला निशाना दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार है. सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार दिल्ली हाईकोर्ट में एक हलफनामा दाखिल करने की तैयारी में है.

यह हलफनामा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा (आरएमएम) नाम के एनजीओ की याचिका से जुड़ा है जिसमें आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाने को लेकर चुनौती दी गई है.

याचिका में कहा गया है कि विधायकों को अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए क्योंकि वो एक साथ लाभ के दो पदों पर बैठे हैं.

लिहाजा संसदीय सचिव के तौर पर उनकी नियुक्ति गैर कानूनी है. मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र, दिल्ली सरकार और दिल्ली के उपराज्यपाल से जवाब मांगा है.

13 जुलाई को अगली सुनवाई

मामले की अगली सुनवाई हाईकोर्ट में 13 जुलाई को होनी है. जिसमें केंद्र सरकार की ओर से दाखिल किया जाने वाला संभावित हलफनामा आम आदमी पार्टी के लिए कानूनी संकट खड़ा कर सकता है.

एनजीओ आरएमएम की ओर से याचिका दाखिल करने वाले रविंदर कुमार का कहना है कि पहले केंद्र सरकार ने हलफनामा नहीं दाखिल करने का फैसला लिया था लेकिन अब लगता है कि वो इसे दाखिल करेंगे.

अदालत ने केंद्र से 21 मार्च तक जबाव मांगा था लेकिन केंद्र ने जवाब नहीं दिया. लेकिन हमें उम्मीद है कि केंद्र जल्द ही अपना हलफनामा कोर्ट में पेश करेगा जो कि हमारे पक्ष में होना चाहिए.

विधायकों को संसदीय सचिव बनाने के दिल्ली सरकार के फैसले का बीजेपी विरोध कर रही है. साथ ही पार्टी ने इसे असंवैधानिक भी करार दिया था. बीजेपी का मानना है कि एलजी की सहमति के बगैर नियुक्तियों का फैसला लिया गया लिहाजा ये असंवैधानिक है.

एलजी नजीब जंग ने उठाए थे सवाल

यही नहीं एलजी नजीब जंग ने भी एक न्यूज़ चैनल को दिए इंटरव्यू में विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया था. एलजी का कहना है कि नियमों के मुताबिक संसदीय सचिव का पद लाभ के पद की श्रेणी में आता है.

साथ ही इंटरव्यू के दौरान एलजी ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली एक्ट के मुताबिक यहां केवल एक संसदीय सचिव हो सकता है जिसका संबंध मुख्यमंत्री कार्यालय से होना चाहिए.

इससे पहले भी एलजी ने नियुक्तियों को लेकर दिल्ली सरकार के बिल पर सवाल उठाते हुए अपने फैसले को सही साबित करने का कदम बताया था. 

13 मार्च 2015 को एलजी ने गृह मंत्रालय और राष्ट्रपति को इस मामले में कड़ी रिपोर्ट भेजी थी. जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के 21 संसदीय सचिव नियुक्त करने के आदेश पर सवाल उठाए गए थे.

इन विधायकों को उसी दिन मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से शपथ भी दिला दी गई थी. इसके बाद आरएमएम की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए जनहित याचिका दाखिल की गई.

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 239 (ए) का उल्लंघन के आरोप में विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने की मांग की गई. याचिकाकर्ता रविंदर का कहना है, " अनुच्छेद 239 के मुताबिक केवल 10  फीसदी विधायक ही मंत्री बन सकते हैं.

इस लिहाज से केवल सात मंत्री होने चाहिए जबकि दिल्ली सरकार ने 21 अतिरिक्त विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त कर दिया."

जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली सरकार ने विधायकों की संसदीय सचिव पद पर नियुक्ति के लिए बिना एलजी की इजाजत के आदेश पारित कर दिया.

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने मांगा था जवाब


20 मई 2015 को चीफ जस्टिस जी रोहिणी और जस्टिस आरएस एंडला की डिवीजन बेंच ने इस मामले में राज्य सरकार से जवाब मांगा था.

सात अक्टूबर 2015 को दिल्ली सरकार ने जबाव दिया, " संसदीय सचिव का प्रावधान केवल जनता से जुडा़व के लिए मंत्री की मदद और विधानसभा की कार्यवाही सुचारु तरीके से चलाने के लिए है."

जुलाई 2015 में दिल्ली सरकार ने इन संसदीय सचिवों को अयोग्य घोषित होने से बचाने के लिए विधानसभा में एक बिल पेश किया. बिल को मंजूरी के लिए एलजी और राष्ट्रपति के पास भेजा गया.

नए प्रावधान के तहत संसदीय सचिव के पद पर बने रहते हुए विधायकों पर संकट नहीं है. विधानसभा की ओर से पास बिल में कहा गया है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री और मंत्रियों से संबंधित संसदीय सचिवों को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता.

साथ ही उन्हें विधानसभा की सदस्यता से इस वजह से नहीं हटाया जा सकता कि उनकी संसदीय सचिव के पद पर नियुक्ति हुई है. संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त विधायकों को कोई भत्ता नहीं दिया जा रहा है.

लेकिन याचिका में आरोप लगाया गया है कि आने-जाने के लिए संसदीय सचिव सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल करने के साथ ही मंत्रियों के दफ्तर का भी अपने काम के लिए उपयोग कर रहे हैं.

चुनाव आयोग ने 19 मार्च को दिया था नोटिस


कैच ने जब इस मामले में आम आदमी पार्टी के नेताओं से संपर्क साधने की कोशिश की तो टिप्पणी के लिए कोई उपलब्ध नहीं था. वहीं चुनाव आयोग ने भी आरएमएम की याचिका पर संज्ञान लिया है.

आयोग ने 19 मार्च 2016 को विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा था कि उन्हें क्यों ना अयोग्य घोषित किया जाए. हालांकि दिल्ली सरकार ने साफ किया है कि ये विधायक अलग से तनख्वाह नहीं ले रहे हैं.

साथ ही उन्हें एक भी रुपया खर्च के लिए मुहैया नहीं कराया गया हैं क्योंकि बिल अब भी गृह मंत्रालय की मंजूरी का इंतजार कर रहा है. साथ ही सरकार का कहना है कि विधायकों को कोई लाभ, सरकारी गाड़ी और स्टाफ नहीं दिया गया है.

दिल्ली सरकार ने आरएमएम की याचिका पर अपने हलफनामे में कहा है कि ऐसी नियुक्तियां कई राज्यों में लंबे अरसे से चली आ रही हैं. साथ ही इन विधायकों के पास कोई वैधानिक शक्ति नहीं है क्योंकि फैसले करने का अधिकार केवल मंत्रियों के पास ही है.

अपने जवाब में दिल्ली सरकार ने कहा कि विधायकों की संसदीय सचिव के पद पर नियुक्ति के लिए अलग से सार्वजनिक दफ्तर बनाने की जरूरत नहीं है. साथ ही संबंधित मंत्री किसी दूसरे विधायक या व्यक्ति की राय ले सकता है.

पंजाब चुनाव से पहले झटके की तैयारी

2015 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी को भारी बहुमत मिला था. 70 सदस्यों वाली विधानसभा में पार्टी के 67 विधायक हैं.

ऐसे में 21 विधायकों के अयोग्य ठहराए जाने के बावजूद आम आदमी पार्टी के पास 46 विधायक बचेंगे जो बहुमत से काफी ज्यादा है. हालांकि पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही आम आदमी पार्टी के लिए ये बड़ा झटका हो सकता है.

अगर विधायक अयोग्य ठहराए जाते हैं तो इन इलाकों में दोबारा विधानसभा चुनाव होंगे जिसे बीजेपी विधानसभा में संख्याबल बढ़ाने के मौके के तौर पर देख रही है. अभी बीजेपी के पास दिल्ली विधानसभा में महज तीन विधायक हैं.

ऐसे में इस संख्या में कोई भी बढ़ोतरी निश्चित तौर पर दिल्ली में पार्टी का मनोबल बढ़ाएगी.

First published: 13 April 2016, 10:39 IST
 
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