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स्वच्छ भारत को बांटती और स्वच्छ पानी को डांटती है सरकार

निहार गोखले | Updated on: 8 May 2016, 8:18 IST
QUICK PILL
  • केंद्र सरकार ने 19 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि देश में 33 करोड़ से\r\n ज्यादा लोग सूखे से प्रभावित हैं लेकिन कुछ नहीं कर सकती क्योंकि सूखे से निपटना \r\nराज्य सरकारी की जिम्मेदारी है.
  • जबकि केंद्र ग्रामीण इलाकों में पेयजल उपलब्ध कराने की योजना का बजट कम करती जा रही है. सरकार का ज्यादा जोर स्वच्छ भारत अभियान पर है.

केंद्र सरकार ने 19 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि देश में 33 करोड़ से ज्यादा लोग सूखे से प्रभावित हैं लेकिन कुछ नहीं कर सकती क्योंकि सूखे से निपटना राज्य सरकारी की जिम्मेदारी है.

ये अलग बात है कि केंद्र का दावा सच से दूर है. केंद्र सरकार के पास ग्रामीण इलाकों में पीने का पानी पहुंचाने की योजना है लेकिन वो इसका फंड कम करती जा रही है.

2015 से नेशनल रूरल ड्रिंकिंग वाटर प्रोग्राम (एनआरडीडब्ल्यूपी) का बजट पहले की तुलना में काफी कम कर दिया गया है. इस योजना के फंड में कमी 2014 में ही आनी शुरू हो गई थी जब केंद्र की एनडीए सरकार ने 'स्वच्छ भारत अभियान' शुरू किया.

पर्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमिटी की छह मई को जारी हुई एक रिपोर्ट के अनुसार सरकार 2017 तक आधे ग्रामीण भारतीय घरों तक नल से पानी पहुंचाने की योजना सफल नहीं हो पाएगी.

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इस रिपोर्ट में पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के उस बयान का हवाला दिया गया है, जिसमें मंत्रालय ने कहा है कि एनआरडीडब्ल्यूपी के लिए फंड की मांग को वित्त मंत्रालय, नीति आयोग और प्रधानमंत्री कार्यालय बार-बार ठुकरा दे रहा है. मंत्रालय अब विश्व बैंक से कर्ज लेने जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है.

केंद्र सरकार ने ग्रामीण इलाकों में पेयजल उपलब्ध कराने की योजना का बजट आधे से भी कम कर दिया है

दूसरी तरफ स्वच्छ भारत अभियान(ग्रामीण) का बजट बढ़ा दिया गया है. इस अभियान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विशेष समर्थन प्राप्त है. इस योजना को सरकार से मिलने वाले समर्थन का अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसके लिए विशेष स्वच्छता उपकर(सेश) लगाया गया है.

सरकार के रवैये को एक हालिया घटना से समझा जा सकता है. महाराष्ट्र का तीन-चौथाई इलाका सूखे से प्रभावित है. पूरे देश में सबसे अधिक किसानों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की है.

25 अप्रैल को पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने महाराष्ट्र में 'रीच आउट' कार्यक्रम की घोषणा की. मंत्रालय के सचिव और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस इलाके का दौरा करने पहुंचे. लेकिन हैरानी की बात है कि दोनों ने केवल स्वच्छ भारत अभियान कार्यक्रम की समीक्षा की. फणनवीस ने जनता से वादा किया कि वो 2017 तक 10 हजार गांवों को 'खुले में शौच' से मुक्त बना दिया जाएगा.

ये विडंबना ही है कि दोनों को राज्य के सूखा प्रभावित 15,747 की कोई याद नहीं आई. उन दोनों के रवैये से मोदी सरकार की प्राथमिकताओं की बानगी मिलती है.

2012 से 2015 के बीच पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय को हर साल 14 हजार करोड़ रुपये मिलते थे. इसमें बड़ा हिस्सा एनआरडीडब्ल्यूपी का था.2015 के बाद से स्थिति बदल गई. एनआरडीडब्ल्यूपी के बजाय स्वच्छ भारत पर ज्यादा पैसा खर्च किया जाने लगा.

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एनआरडीडब्ल्यूपी राज्यों को ग्रामीण इलाकों में पानी का नल पहुंचाने के लिए वित्तीय, नीतिगत और तकनीकी मदद देती है. (संविधान के अनुसार पानी राज्य की सूची में है इसलिए केंद्र इसे सीधे लागू नहीं कर सकता)

मंत्रालय ने साल 2017 तक 50 प्रतिशत घरों में और साल 2022 तक 90 प्रतिशत घरों में पीने का पानी की व्यवस्था करने का लक्ष्य रखा है.

पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय का 2011 में गठन हुआ था. वित्त वर्ष 2012-13 और 2013-14 में  एनआरडीडब्ल्यूपी के लिए 11 हजार करोड़ रुपये आवंटित हुए थे. साल 2014 में एनडीए जब केंद्र में आई तो उसने इसके लिए 11 हजार करोड़ रुपये देने का वादा किया था बाद में उसने केवल 9250 करोड़ रुपये ही दिए.

2015 में एनआरडीडब्ल्यूपी का बज़ट 2,611 करोड़ रुपये कर दिया गया. हालांकि बाद में इसे 4,373 करोड़ रुपये कर दिया गया.

वित्त वर्ष 2016-17 में एनआरडीडब्ल्यूपी के लिए पांच हजार करोड़ रुपये आवंटित किए गए. जबकि मंत्रालय ने 16 हजार करोड़ रुपये मांगे थे.

पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय, नीति आयोग और पीएमओ में लगाई थी बजट बढ़ाने की गुहार

संसदीय कमिटी की रिपोर्टे के अनुसार मंत्रालय के सचिव ने कहा, "2012-13 की तुलना में एनआरडीडब्ल्यूपी का बजट आधा कर दिया गया है ऐसे में हम आधे पैसे से लक्ष्य कैसे हासिल करेंगे."

सचिव ने बताया, "हम वित्त मंत्रालय से और अधिक फंड के लिए अनुरोध करेंगे. लेकिन एक व्यावहारिक कदम ये हो सकता है कि बाहरी संस्थाओं से संपर्क किया जाए."

सचिव ने कहा, "जिन पांच बाहरी एजेंसियों से संपर्क किया जा सकता है वो हैं, वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलमेंट बैंक, द न्यू डेवलमेंट बैंक, द एशिया इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंशियल बैंक और जेआईसीए. इनके अलावा भी कुछ द्विपक्षीय संस्थाएं हैं जो वित्तीय मदद कर सकती हैं."

एनआरडीडब्ल्यूपी के बजट में कमी के एक अन्य प्रमुख कारण 14 वित्त आयोग द्वारा करों में राज्यों का हिस्सा बढ़ाया जाना भी है. इसके बाद से राज्यों से एनआरडीडब्ल्यूपी पर ज्यादा खर्च करने की उम्मीद की जाती है.

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हालांकि संसदीय कमिटी की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र को एनआरडीडब्ल्यूपी के बजट का 60 प्रतिशत केंद्र को देना है और बाकी राज्य को. यानी केंद्र ने पांच हजार करोड़ दिया है तो राज्य का हिस्सा मिलाने के बाद कुल राशि 8333 करोड़ रुपये ही होगी. जो 2015 से पहले के फंड से 25 प्रतिशत कम होगी.

तीन फरवरी को मंत्रालय ने राज्यों के मंत्रियों, सचिवों और नीति आयोग के अधिकारियों के साथ वार्ता की थी.

मंत्रालय ने संसदीय कमिटी को बताया, ""सभी राज्यों के मंत्रियों और सचिवों ने एनआरडीडब्ल्यूपी का फंड बढ़ाने की मांग की थी ताकि ग्रामीण इलाकों तक पीने का पानी पहुंचाने का लक्ष्य पूरा किया जा सके."

संसदीय कमिटी की रिपोर्ट में कहा गया है, "कमिटी को लगता है कि पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय को ज्यादा फंड दिए जाने की सख्त जरूरत है. जिससे ग्रामीण इलाकों मे पेयजल की समस्या को दूर किया जा सके."

First published: 8 May 2016, 8:18 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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