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भूमि अधिग्रहण में असफल केंद्र की नजर अब रक्षा विभाग की जमीनों पर

समीर चौगांवकर | Updated on: 14 January 2016, 8:48 IST
QUICK PILL
  • सरकार में शामिल सूत्रों के\r\n हवाले से खबर है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने अब विकास की रुकी पड़ी योजनाओं के लिए रक्षा मंत्रालय की खाली पड़ी जमीनों का इस्तेममाल करने का फैसला किया है. पीएमओ ने रक्षा \r\nमंत्रालय से इस तरह की खाली जमीनों का ब्यौरा मंगा है.
  • एक आकलन है\r\n कि रक्षा मंत्रालय के पास करीब 17.3 लाख एकड़ जमीन होने के साथ ही रक्षा \r\nमंत्रालय की जरूरत से करीब 81,000 एकड़ सरप्लस जमीन है.

जमीन का मुद्दा राजनीतिक हो जाने के बाद अब केंद्र सरकार के सामने अपनी विकास और तमाम दूसरी परियोजनाओं को लागू करने में तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. इसके चलते अर्थव्यवस्था की गाड़ी पटरी से उतरती दिख रही है. नए भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर सरकार की तमाम कोशिशों औंधे मुंह गिर चुकी हैं. अब सरकार ने इसे लागू करवा पाने की उम्मीद भी छोड़ दी है.

इससे निपटने का सरकार ने एक वैकल्पित तरीका खोजा है. केन्द्र सरकार अब अपने मातहत मंत्रालयों की जमीनों का अधिग्रहण करके विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने की नीति पर काम कर रही है.

सरकार में शामिल एक महत्वपूर्ण सूत्र के हवाले से खबर है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने रक्षा मंत्रालय की इस्तेमाल नहीं हो रही जमीनों को नई परियोजनाओं के लिए चुन लिया है. पीएमओ ने रक्षा मंत्रालय की बेकार पड़ी खाली जमीनों का ब्यौरा मंगाया है. गौरतलब है कि देश में सबसे ज्यादा जमीन रक्षा मंत्रालय के नाम से आवंटित है. एक आकलन है कि रक्षा मंत्रालय के पास करीब 17.3 लाख एकड़ जमीन होने के साथ ही रक्षा मंत्रालय की जरूरत से करीब 81,000 एकड़ सरप्लस जमीन है.

सूत्रों के मुताबिक केन्द्र सरकार की नजर रक्षा मंत्रालय की इस सरप्लस जमीन पर है. यही नहीं देश का रक्षा मंत्रालय पहले से अधिग्रहीत की गई 50 हजार एकड़ से ज्यादा जमीन का कोई इस्तेमाल नहीं कर सकी है. सरकार ने रक्षा मंत्रालय से इतनी बड़ी जमीन के इस्तेमाल की योजना पूछने पर रक्षा मंत्रालय कोई संतोषजनक उत्तर दे पाने में असफल रहा.

केन्द्र सरकार को एक-एक इंच जमीन अधिग्रहीत करने मेें दिक्कतें आ रही हैं जबकि रक्षा मंत्रालय के पास बड़ी मात्रा में जमीन मौजूद है

केन्द्र सरकार को एक-एक इंच जमीन अधिग्रहीत करने मेें दिक्कतें आ रही हैं जबकि रक्षा मंत्रालय के पास इतनी बड़ी मात्रा में जमीन मौजूद है. अगर सरकार को इन जमीनों का स्वामित्व मिल जाता है तो उसकी तमाम रुकी पड़ी योजनाओं की गाड़ी चल निकलेगी और आर्थिक मोर्चे पर जूझ रही सरकार की कई समस्याएं हल हो जाएंगी.

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लेकिन पेंच यह फंस रहा है कि रक्षा मंत्रालय अपनी बेकार पड़ी जमीन को केन्द्र सरकार को देने के लिए तैयार नहीं है. रक्षा मंत्रालय की दलील है कि रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया को सहयोग करने के लिए उसे इन जमीनों की जरूरत होगी.

रक्षा के क्षेत्र में निवेश कर रही विदेशी कंपनियों को आमंत्रित करने और स्वदेशी उपकरण बनाने के लिए भी जमीन की आवश्यकता होगी. इसलिए वह इन जमीनों को छोड़ नहीं सकता. रक्षा मंत्रालय के पास लंबी-चौड़ी भूमि का अंदाजा इस एक आंकड़े से लगाया जा सकता है कि 5000 एकड़ से ज्यादा जमीन तो रक्षा मंत्रालय के देश भर में फैले 95 गोल्फ कोर्स ने घेर रखी है.

प्रधानमंत्री कार्यालय के विश्वस्त सूत्रों के हवाले से खबर है कि केन्द्र सरकार भारत के नियत्रंक एवं महालेखा परीक्षक सीएजी की 25 मार्च 2011 को संसद में पेश रिपोर्ट को आधार बना रही है. इस सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया था कि रक्षा मंत्रालय के पास उपलब्ध अतिरिक्त जमीन का इस्तेमाल लोक कल्याण के दूसरे कामों में किया जाना चाहिए.

केन्द्र सरकार भारत के नियत्रंक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की 25 मार्च 2011 को संसद में पेश रिपोर्ट को आधार बना रही

सरकार इसी रिपोर्ट को आधार बना कर सेना की अतिरिक्त जमीन वापस लेकर अपनी अन्य योजनाओं को लागू करना चाहती है. वर्तमान में रक्षा मंत्रालय के पास कुल 17.31 लाख एकड़ जमीन है. इसमें से थल सेना के पास 80 प्रतिशत के करीब, वायु सेना के पास 9 प्रतिशत के करीब और नौ सेना के दो प्रतिशत के करीब है. इसके अलावा अन्य उपयोग के लिए नौ प्रतिशत और भी जमीनें हैं. इन जमीनों की अनुमानित बाजार कीमत 80 लाख करोड़ के करीब है.

2009 तक रक्षा मंत्रालय की लगभग 15,000 एकड़ जमीन अतिक्रमण का शिकार भी थी. इसका बाजार मूल्य लगभग 65,000 करोड़ के करीब है.

अधिग्रहण के बाद पूरे देश में रक्षा मंत्रालय की खाली पड़ी जमीन लगभग 58,500 एकड़ जमीन है, जिसका बाजार मूल्य लगभग 2,75,000 करोड़ रुपये के आसपास है.

First published: 14 January 2016, 8:48 IST
 
समीर चौगांवकर @catchhindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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