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क्या मोदी सरकार साल भर के भीतर भारत-बांग्लादेश सीमा वास्तव में सील कर पाएगी?

राजीव भट्टाचार्य | Updated on: 20 June 2016, 22:44 IST

केंद्र में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार ने असम में भारत-बांग्लादेश सीमा को पूरी तरह सील करने के लिये अगले वर्ष जून तक की समय सीमा जारी की है. इस काम को करने की यह कोई पहली समयसीमा नहीं है, पूर्व की सरकारें भी कई बार इसी तरह की घोषणा कर चुकी हैं.

बीजेपी ने 2014 के आम चुनावों के दौरान अपने प्रचार अभियान और असम विधानसभा के हालिया चुनावों के दौरान लगातार देश और प्रदेश की जनता से सीमा को सील करने और असम में होने वाली अवैध घुसपैठ को रोकने का वायदा किया था. यह नवीनतम सीमयसीमा इसी वायदे को पूरा करने की ओर एक कदम है.

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गृह मंत्रालय ने दो जून को इस बात का खुलासा किया कि सीमा के 60.7 किलोमीटर के क्षेत्र के 122 ‘‘चिन्हित स्थान’’ बिना किसी वास्तविक अवरोध या बाड़ के खुले हैं. लिहाजा यह निर्णय लिया गया है कि 11.9 किमी के दायरे में 100 स्थानों की तारबंदी की जाएगी और 48.8 किमी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 22 स्थानों पर ‘‘तकनीकी अवरोध’’ स्थापित किये जाएंगे. और यह काम जून 2017 तक निबटा लिया जाएगा.

बीजेपी ने चुनाव प्रचार के दौरान असम में होने वाली अवैध घुसपैठ को रोकने का वायदा किया था

बड़े पैमाने पर की गई घोषणाओं के अनुसार जल्द ही पंटून पुल, स्लूस गेट, हाई रिसाॅल्यूशन कैमरों, वाॅच टावरों, स्टैटिक एरियल प्लेटफॉर्म्स, ग्राउंड सेंसर्स और रडार भी स्थापित किये जाएंगे. इन घोषणाओं को देखने पर यह प्रथम दृष्टया प्रतीत होता है कि जल्द ही बेहद उच्च तकनीक का निगरानी तंत्र पूरी सीमा को सील कर देगा.

कैच ने सीमा की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के कुछ सेवारत और सेवानिवृत्त अधिकारियों से बात की और इस दावे की हकीकत को समझने का प्रयास कि क्या सरकार द्वारा घोषित किये गए उपाय वास्तव में कोई बदलाव लाने में सफल होंगे?

अधिकतर अधिकारियों ने सरकार की इन घोषणाओं का स्वागत किया लेकिन साथ ही उनका कहना था कि सीमा क्षेत्र की सुरक्षा को और अधिक सुदृढ़ बनाने की दिशा में उनके द्वारा पेश किये गए कई सुझावों को अबतक गृहमंत्रालय ने स्वीकार नहीं किया है.

बीएसएफ के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक पीके मिश्रा कहते हैं, ‘‘गृह मंत्रालय को कई बार बीएसएफ की पिछले काफी समय से लंबित पड़ी मांगों के बारे में अवगत करवाया जा चुका है लेकिन अबतक कोई निर्णय नहीं हो सका है. भारत-बांग्लादेश सीमा के बेहतर प्रबंधन के लिये सरकार को इन मांगों को अविलंब स्वीकार करना चाहिये.’’

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आखिर बीएसएफ की मांग क्या हैं? उचित लैंडिंग सुविधाओं के साथ हेलीकाॅप्टर, ड्रोन, ब्रह्मपुत्र नदी की गश्त के लिये 30 स्पीडबोट, ईंधन की निर्बाध आपूर्ति, बीएसएफ की एक और बटालियन, फोर्स की ‘‘रिवर विंग’’ के लिये अधिक सैनिक और सीमावर्ती क्षेत्रों का ढांचागत विकास.

अन्य अधिकारी भी मिश्रा के विचारों से पूरी तरह सहमत हैं. वे हाई रिसाॅल्यूशन इंफ्रारेड सेंसर्स की स्थापना, विशेषकर मानकचर वाले नदी के क्षेत्र में, ‘‘आभासी अवरोध’’ को लेकर अपना मत स्पष्ट कर चुके हैं.

यह एक ऐसा इलाका है जहां सीमावर्ती चौकियां साल के तीन महीने पूरी तरह से जलमग्न रहती है. यह तकरीबन पंजाब में भारत-पाकिस्तान की सीमा पर स्थापित तंत्र के जैसा ही होगा.

इसके अलावा सुरक्षा अधिकारी हर कंपनी को अमरीका निर्मित लंबी दूरी की टोही प्रणाली (एलओआरआरओएस), प्रत्येक चौकी के लिये एक थर्मल इमेजर और हर पेट्रोलिंग पार्टी के लिये एक नाइट विजन उपकरण की आवश्यकता पर जोर देते हैं. इसके अलावा वे उचित उचित पोशाक, विशेषकर माॅनसून के दौरान उपलब्ध करवाने की मांग करने के अलावा फ्लडलाईट्स को अधिक प्रभावी बनाने हेतु निर्बाध विद्युत आपूर्ति की भी बात करते हैं.

इतना आासान नहीं है

इसके अलावा गृह मंत्रालय को दो किमी चौड़ी एक ‘‘बाॅर्डर बैल्ट’’ की आवश्यकता से भी अवगत करवाया जा चुका है जहां सुबह से लेकर शाम तक के लिये निषेधाज्ञा (धारा 144) लगाई जा सके. इसके अलावा मानकचर जैसे ‘‘अति संवेदनशील’’ इलाकों में कर्फ्यू लगाने जैसी छूट पर विचार करने के लिये भी कहा जा चुका है.

क्या सरकार द्वारा घोषित किये गए उपाय वास्तव में कोई बदलाव लाने में सफल होंगे?

बीएसएफ द्वारा सुझाये गए इन ‘‘समाधानों’’ को अलग रख दें तो भी सीमा को पूरी तरह से सील करने के काम में कई बड़ी बाधाएं हैं जो इतने कम समय में दूर होनी मुश्किल हैं. उदाहरण के लिये करीमगंज में सीमा पर 3.5 किमी के टुकड़े में बाड़ लगाने के काम को उस समय रोकना पड़ा जब बांग्लादेश ने शिकायत की कि बाड़ को कुशियारा नदी के किनारे खड़ा किया जा रहा है.

यह मामला अब संयुक्त नदी आयोग को भेजा गया है और अधिकारी यह बताने में पूरी तरह से असमर्थ हैं कि यह मसला कब तक सुलझ पाएगा.

इसके अलावा बीएसएफ असम पुलिस की भूमिका से भी खासी परेशान है. असम पुलिस की नियुक्ति अंतरराष्ट्रीय सीमा से दो किमी अंदर ‘‘रक्षा की दूसरी पंक्ति’’ के रूप में की जाती है. अधिकारियों के अनुसार इस उद्देश्य को पूरा करने के लिये गृह मंत्रालय से नियमित रूप से पैसा आवंटित किया जाता है लेकिन इस पैसे के उचित उपयोग को लेकर हमेशा शक रहता है.

बीएसएफ के एक अधिकारी कहते हैं कि पुलिस को पशु तस्करी को रोकने के लिये तैनात किया जा सकता है. उनका मानना है कि पशु तस्करी सीमा की चौकसी में सबसे बड़ी बाधा है. पुलिस चाहे तो पशुओं को भरकर ले जाने वाले वाहनों को सीमा तक पहुंचने से पहले ही रोक सकती है.

अधिकारी शिकायती लहजे में कहते हैं कि बीएसएफ ने करीब एक वर्ष पूर्व ही पशु तस्करी को रोकने से संबंधित एहतियाती उपायों की सूची सौंप दी थी लेकिन उन पर अब कोई ध्यान नहीं दिया गया है.

इन सब बातों को देखते हुए अधिकतर अधिकारियों को अगले वर्ष जून तक सीमा के पूरी तरह सील होने पर शक है.

नाम न छापने की शर्त पर बीएसएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘‘इस बात को लेकर कोई शक नहीं है कि सरकार द्वारा घाषित किये गए उपायों को तय समयसीमा से पहले पाया जा सकता है लेकिन अभी भी कई ऐसे कारक हैं जिन्हें ध्यान में ही नहीं लिया गया है और यही सबसे बड़ी अनिश्चितता है. सीधे शब्दों में कहें तो भारत-बांग्लादेश सीमा को सील करना संभव ही नहीं है. वहां पर खाली जगह तो रहेंगी ही लेकिन बेहतर बुनियादी सुविधाओं के जरिए प्रवेश मार्गों को बंद किया जा सकता है.’’

दिलचस्प बात यह है कि बीएसएफ द्वारा रखी गई मांगों में से कई का जिक्र असम के पूर्व राज्यपाल एसके सिन्हा द्वारा केंद्र सरकार को भेजी गई विस्तृत रिपोर्ट में भी किया गया है. असम के प्रबुद्ध नागरिक भी बीते कई वर्षों से नदी वाले क्षेत्रों में चलने वाली नावों का पंजीकरण करने जैसी मांग उठाते हुए सीमा प्रबंधन में सुधार के सुझाव देते आए है. लेकिन राज्य और केंद्र सरकार, दोनों ही इन सिफारिशों को लेकर कोई फैसला करने में नाकाम ही रही हैं.

First published: 20 June 2016, 22:44 IST
 
राजीव भट्टाचार्य @catchhindi

गुवाहाटी स्थित वरिष्ठ पत्रकार. 'रांदेवू विथ रिबेल्सः जर्नी टू मीट इंडियाज़ मोस्ट वांटेड मेन' किताब के लेखक.

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