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6 समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा भाजपा की दूरगामी रणनीति है

राजीव भट्टाचार्य | Updated on: 28 May 2016, 19:24 IST
(कैच न्यूज)

केंद्र सरकार असम के छह स्थानीय समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की हड़बड़ी में है. केंद्र सरकार के इस कदम को पूर्वोत्तर के इस सीमांत राज्य को बांग्लादेश की ओर से निरंतर हो रहे जनसांख्यिकी हमले से बचाने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

सरकारी सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) इस मामले पर पैनी नजर रखे हुए है और जनजातीय मामलों के मंत्रालय से इस मामले से संबंधित फाइल प्राप्त करने के बाद फरवरी के महीने में एक समिति के गठन के निर्देश भी जारी किये जा चुके हैं.

सरकार के इस आदेश के अनुपालन में गृह मंत्रालय के विशेष सचिव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन कर दिया गया है जिसमें एक रजिस्ट्रार जनरल, दो संयुक्त सचिव, एक निदेशक और असम में विद्रोहियों के साथ शांति वार्ता में शामिल सरकार के प्रतिनिधि सदस्य के रूप में शामिल हैं.

इस समिति का उद्देश्य, ‘‘ओबीसी और एसटी के लिये उपलब्ध मौजूदा आरक्षण में से ही आवश्यक आरक्षण के लिये तौर तरीकों को सुझाना और ऐसा करते हुए मौजूदा जनजातियों के हितों की रक्षा करना और साथ ही एक ऐसा तंत्र विकसित करना जो इन छह जनजातियों के बीच आरक्षण में निष्पक्षता बनाए रखते हुए संबंधित सुरक्षा मानकों का भी ध्यान रखे.’’

गृह मंत्रालय द्वारा जारी किये गये आदेश में इस संबंध में 31 मई तक एक रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश भी दिये गए हैं. इसके अलावा विशेष सचिव ने इस मामले पर असम सरकार का रवैया जानने के लिये उसे भी एक पत्र लिखा है और साथ ही इस समिति के सदस्य के रूप में मनोनीत करने के लिये एक सदस्य को नामित करने के लिये भी कहा है.

समुदायों ने किया स्वागत

अहोम, मोरन, मटक, चाय जनजाति, चुटिया और कोच-राजवंशी इस प्रक्रिया से लाभांवित होने वाले छह समुदाय हैं. एक तरफ जहां पहले तीन समुदाय असम के ऊपरी यानि पूर्वी जिलों में निवास करते हैं वहीं दूसरी तरफ कोच-राजवंशी मुख्यतः राज्य के पश्चिमी क्षेत्रों के मूल निवासी हैं. चाय जनजाति पूरे राज्य में बिखरी हुई है लेकिन पूर्वी क्षेत्र में ये बहुलता से पाये जाते हैं.

ऑल मोरन स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष अरुण ज्योति मोरन कहते हैं, ‘‘हम इस पूरी प्रक्रिया को अंतिम रूप देने के लिये केंद्र सरकार द्वारा 31 मई तक कि समय सीमा तय करने के निर्णय का स्वागत करते हैं. इस संबंध में जल्द ही गृह मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठक आयोजित होने की संभावना है.’’

इन सभी समुदायों के प्रतिनिधियों से सुसज्जित चाय जनगोष्ठी महा सम्मेलन द्वारा 15 मई को गुवाहाटी में आहूत की गई एक बैठक में एक पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति के गठन के सुझाव का समर्थन किया गया. यह समिति सरकार के सामने पेश करने के लिये एक रिपेार्ट तैयार करेगी.

इसके अलावा इस बैठक में राज्य की तमाम वास्तविक जनजातियों के प्रतिनिधित्व वाला एक व्यापक मंच तैयार करने का भी फैसला लिया गया. इसके अलावा यह समिति सरकार को चाय जनजातियों में आने वाले समृद्ध वर्गों को अनुसूजित जनजातियों की श्रेणी में न रखना भी सुनिश्चित करेगी.

गैरकानूनी घुसपैठ

बांग्लादेश से बेरोकटोक आने वाले घुसपैठियों की एक बड़ी संख्या को देखते हुए राज्य के कई संगठन और व्यक्ति बीते 20 वर्षों से इन समुदायों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग उठाते आए हैं. राज्य की पूर्ववर्ती कांग्रेस और उल्फा का वार्ता समर्थक गुट भी इस मांग के पक्ष में हैं.

वास्तव में राज्य में हुए पिछले विधानसभा चुनावों में ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के 18 सीट जीतने के बाद खतरे की घंटी बजी थी. इत्र व्यापारी मौलाना बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व वाली एआईयूडीएफ को स्थानीय असमिया समुदाय के लोग अवैध अप्रवासियों का समर्थन करने वाली पार्टी के रूप में देखते हैं.

2014 के लोकसभा चुनावों से पहले गुवाहाटी की एक रैली में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से वायदा किया था कि वे उनकी इस मांग को पूरा करने के लिये प्रतिबद्ध हैं और इसके रास्ते में आने वाली तमाम बाधाओं को जल्द से जल्द दूर किया जाएगा.

एनडीए सरकार द्वारा समय पर इस दिशा में उचित कार्रवाई न करने को लेकर लोगों में नाराजगी बढ़ने लगी थी और स्थानीय निवासी प्रधानमंत्री पर अपने वायदे से मुकरने का आरोप भी लगाने लगे थे. इसके अलावा असम के हालिया चुनावों से कुछ समय पहले ही कांग्रेस ने इसे चुनावी मुद्दा बनाने का पूरा प्रयास किया.

असम में सरकार और स्थानीय संगठनों का मानना है कि एक बार इन छह समुदायों को यह दर्जा देने के बाद इन्हें बांग्लादेशी घुसपैठियों से उचित बचाव भी मिल जाएगा.

राजनीतिक प्रभाव

वर्तमान में राज्य की विधानसभा की कुल 126 सीटों में 16 सीटें अनुसूचित जनजातियों और 8 सीट अनुसूचित जातियों के लिये आरक्षित हैं. इस बात की पूरी उम्मीद है कि इन 6 समुदायों को आरक्षित श्रेणी में शामिल करने के बाद 80 से भी अधिक सीट अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति की आरक्षित श्रेणी में आ जाएंगी.

काफी लंबे समय तक चलने वाली सरकारी प्रक्रिया के पूरे होने के बाद असम की विधानसभा और संसदीय सीटों के अलावा स्थानीय समुदायों के लिये आरक्षित की जाने वाले सीटों का भी परिसीमन किया जाएगा. अप्रवासी घुसपैठियों और संदिग्ध मूल के लोगों को चुनाव में भाग लेने से भी रोका जाएगा.

एक सरकारी अधिकारी ने इस बात का खुलासा किया कि इन समूहों को एसटी श्रेणी में शामिल करने का फैसला सरकार की एक दीर्घकालिक योजना का हिस्सा है जिसके द्वारा वह पूर्वोत्तर की अन्य जनजातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की व्यवहार्यता का आंकलन कर रही है.

एक अधिकारी ने दावा किया, ‘‘अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले में लीसस और पूर्वोत्तर के राज्यों के कुछ अन्य समूहों की मांग पर भी विचार किया जा रहा है. हालांकि इसके लिये एक समय सीमा निर्धारित करना काफी मुश्किल है क्योंकि वह मामला अलग होने के अलावा बिल्कुल विशिष्ट पृष्ठभूमि वाला है.’’ वे आगे जोड़ते हैं कि सरकार के एजेंडे के शीर्ष पर असम की ‘‘लंबे समय से चली आ रही मांग’’ है जो इस क्षेत्र की सुरक्षा के साथ भी जुड़ी हुई है.

विरोध के स्वर

ऐसा लगता है कि असम के स्थानीय समुदाय सरकार की इस अनुकूल पहल और रुख के समर्थन में हैं आौर इसे एक सकारात्मक कदम के रूप में देख रहे हैं.

लेकिन विरोध के स्वर भी गाहे-बगाहे सुनाई दे रहे हैं. विशेषकर राज्य में हाशिये पर रहने वाले जनजातीय समूहों द्वारा क्योंकि उन्हें लगता है कि नए समूहों को आरक्षण मिलने के फलस्वरूप सरकार द्वारा अब तक उन्हें मिलने वाली विशेष रियायत में कटौती हो जाएगी.

इस बात की पूरी संभावना है कि एक बार इन छह समूहों को आरक्षण की पुष्टि होने के बाद राज्य के अन्य समूह भी कुछ ऐसी ही मांग उठाएंगे और आरक्षण मांगने के लिये सामने आएंगे.

असम के कलिथा समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला एक संगठन अब अपने लिये अनुसूचित दर्जे की मांग के साथ सामने आ गया है. हालांकि यह समुदाय राज्य के सामाजिक रूप से उन्नत समुदायों में से एक है.

First published: 28 May 2016, 19:24 IST
 
राजीव भट्टाचार्य @catchhindi

गुवाहाटी स्थित वरिष्ठ पत्रकार. 'रांदेवू विथ रिबेल्सः जर्नी टू मीट इंडियाज़ मोस्ट वांटेड मेन' किताब के लेखक.

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