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धारा 377 : समलैंगिकता अपराध है या नहीं, सुप्रीम कोर्ट में सरकार नहीं लेगी कोई स्टैंड

कैच ब्यूरो | Updated on: 11 July 2018, 16:27 IST

समलैंगिकता को लेकर केंद्र सरकार ने फैसला पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दिया है. केंद्र सरकार ने कहा कि धारा 377 तहत सहमति से समलैंगिक संबंध बनाना अपराध है या नहीं यह अदालत खुद ही तय कर ले. सरकार ने कहा इस पर वह अपना स्टैंड नहीं लेगी. सरकार की ओर से अडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हम 377 के वैधता के मामले को सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ते हैं और अगर सुनवाई का दायरा बढ़ता है, तो सरकार हलफनामा देगी.

आईपीसी की धारा 377 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा सुनवाई कर रही है. बुधवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा अगर दो बालिग व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से संबंध बनते हैं तो इसे अपराध करार नहीं दिया जा सकता.

 

इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को संविधान पीठ द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के विरुद्ध याचिकाओं पर 10 जुलाई को प्रस्तावित सुनवाई स्थगित करने की मांग करने वाली केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर दी थी. केंद्र ने मामले के संबंध में जवाब दाखिल करने के लिए अदालत से समय मांगा. न्यायालय ने कहा कि मामला कुछ समय से लंबित पड़ा हुआ है और केंद्र को अपना जवाब दाखिल करना चाहिए. इसके साथ ही अदालत ने कहा, "हम प्रस्तावित सुनवाई करेंगे. हम इसे स्थगित नहीं करेंगे. आप सुनवाई के दौरान कुछ भी दाखिल कर सकते हैं."

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First published: 11 July 2018, 16:27 IST
 
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