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चाबहार बंदरगाहः पाकिस्तान खुद जिम्मेदार है अलग-थलग पड़ने का

तिलक देवाशर | Updated on: 13 June 2016, 7:35 IST
(एजेंसी)
QUICK PILL
  • ईरान भारत के साथ अपने सम्बंध बढ़ा रहा है और इससे पाकिस्तान को डर है कि कहीं वह चाबहार बंदरगाह बनाए और उसे बाइपास करके अफगानिस्तान के लिए अलग रास्ता न बना ले
  • वहीं भारतचाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट के पहले चरण में 200 मिलियन डॉलर से अधि‍क का निवेश करने जा रहा है. इससे अफगानिस्तान की निर्भरता पाकिस्तान से कम हो जाएगी

अपनी ढेर सारी समस्याओं- पनामा लीक्स, नवाज शरीफ का स्वास्थ्य, अमरीकी ड्रोन हमले में आमिर अख्तर मंसूर की मौत के अलावा भी पाकिस्तान कई अन्य समस्याओं से घिरा है. पाकिस्तान की चिन्ताएं ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के लिए भारत, अफगानिस्तान और ईरान के बीच गत 23 मई को हुए त्रिपक्षीय समझौते के बाद और बढ़ गईं हैं.

पाकिस्तान को उम्मीद थी कि वह चीन पाकिस्तान इकोनामिक कॉरिडोर (सीपीईसी) के जरिए अपनी अर्थव्यवस्था को सुधार लेगा, पर यह समझौता कर भारत ने सामरिक नजरिये से पाकिस्तान को करारा जवाब दिया है. पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के बरक्स चाबहार पोर्ट भारत के लिए अहम है.

पकिस्तान के रिटायर्ड जनरल और टीवी एकंरों ने इस समझौते पर तीखी प्रतिक्रिया जताई है. वे इस समझौते को ग्वादार और सीपीईसी के विकास के लिए खतरे के रूप में देखते हैं.

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पाकिस्तान की सैन्य चिन्ताओंं को अगर छोड़ भी दिया जाय तो ये लोग इस त्रिपक्षीय समझौते को ताकत के क्षेत्रीय संतुलन के खिलाफ देखते हैं. कुछ लोगों ने साफ तौर पर कहा भी है कि इस समझौते से स्पष्ट है कि ईरान भारत के साथ अपने सम्बंध बढ़ा रहा है और भारत अपने पड़ोसी पाकिस्तान को बाइपास करके अफगानिस्तान के लिए रास्ता बनाएगा.

पाकिस्तान के दो रिटायर्ड जनरलों ने, जो रक्षा सचिव भी रह चुके हैं, अपनी सबसे तीखी प्रतिक्रिया दी है. इस्लामाबाद में एक कार्यक्रम में बोलते हुए ले. जन. (रि) आसिफ यासीन मलिक ने भारत-अफगानिस्तान और ईरान के बीच हुए इस गठबंधन को पाकिस्तान के लिए सुरक्षा खतरा बताया है और देश में पूर्णकालिक विदेश मंत्री न होने के लिए अपनी सरकार को कोसा है.

इसी सेमिनार में ले. जन. (रि) नदीम लोधी ने इसे पड़ोस में–अजेय गठबंधन बताया है. उन्होंने आशंका जताई है कि इस तरह के ब्लॉक से पाकिस्तान की भविष्य की क्षेत्रीय आर्थिक एकता,आंतरिक शांति और सीमा के शांतिपूर्ण रख-रखाव पर प्रभाव पड़ेगा.

पाकिस्तान की चिंता

पहली बात तो यह कि पाकिस्तान को चिंता है कि जब चाबहार बंदरगाह बन जाएगा और अफगानिस्तान तक रोड-रेल लिंक आपरेशन में आ जाएंगे तो भारत के लिए अफगानिस्तान में निवेश के दरवाजे खुल जाएंगे. ट्रांसपोर्ट की कनेक्विटी बढ़ने से मध्य एशिया में अन्य देशों के साथ भारत के आर्थिक सम्बंधों को और मजबूती मिलेगी.

पाकिस्तान इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ है कि भारत ने अफगानिस्तान में पुर्ननिर्माण और पुर्नवास की प्रक्रिया के लिए दो अरब डॉलर का निवेश किया है और एक तथ्य यह भी है कि रूस के सम्बंध भारत के साथ पाकिस्तान की अपेक्षा हमेशा से अच्छे रहे हैं.

चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट के पहले चरण में भारत 200 मिलियन डॉलर से अधि‍क का निवेश करने जा रहा है. इसमें फरवरी में दिया गया 150 मिलियन डॉलर भी शामिल है. भारत इस प्रोजेक्ट पर कुल 500 मिलियन डॉलर निवेश करेगा.

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दूसरी बात यह कि चाबहार बंदरगाह के जरिए भारत अपने पड़ोसी पाकिस्तान को बाइपास करके अफगानिस्तान के लिए रास्ता बनाएगा. बताते चलें कि अफगानिस्तान की कोई भी सीमा समुद्र से नहीं‍ मिलती और भारत के साथ इस मुल्क के सुरक्षा सम्बंध और आर्थिक हित जुड़े हैं.

पाकिस्तान को डर है कि चाबहार बंदरगाह से अफगानिस्तान की निर्भरता पाकिस्तान पर कम हो जाएगी.

तीसरी बात यह है कि चाबहार और मुम्बई के बीच की दूरी मुम्बई और दिल्ली के बीच की दूरी से कम है. भारत के पश्चिमी समुद्री तट से इस बंदरगाह तक पहुंचना आसान है. इस बंदरगाह के जरिये भारतीय सामानों के ट्रांसपोर्ट का खर्च और समय एक तिहाई कम हो जाएगा. इससे ईरान की अर्थव्यवस्था भी भविष्य में मजबूत होगी.

वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध झेलते रहने के चलते ईरान को विनिवेश और विकास की जरूरत है. भारत वहां कुछ निवेश करने की हालत में है और वहां के तेल से अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरी करना चाहता है. भारत ईरान से तेल खरीदने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है. जबकि पाकिस्तान सऊदी अरब के देशों पर निर्भर है.

चौथी बात, पाकिस्तान की प्रतिक्रिया दो कारणों से और तीखी है. उसके इन दिनों अमरीका से संबंध गिरावट की तरफ हैं. अमरीकी कांग्रेस ने हालांकि आठ एफ-16 लड़ाकू विमानों की बिक्री पर रोक लगा दी है और हक्कानी नेटवर्क पर कार्रवाई का दबाव भी डाल रहा है.

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इस तरह सुपर पावर की ओर से पाकिस्तान की घेराबंदी की गई है. दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यूएई, सऊदी अरब, ईरान और कतर की यात्रा भी काफी सफल रही है. ये देश पाकिस्तान के परंपरागत मित्र रहे हैं. इन देशों में प्रधानमंत्री का गर्मजोशी से स्वागत हुआ है और महत्वपूर्ण समझौतों पर दस्तखत हुए हैं.

पांचवीं बात, पाकिस्तान के सर्वकालिक मित्र चीन ने चाबहार पर जो प्रतिक्रिया दी है उससे भी पाक खुश नहीं है. चीन के सरकारी अखबार–ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि भारत और ईरान के बीच मील का पत्थर साबित होने वाले समझौते हुए हैं, उससे चीन को कोई ईर्ष्या नहीं है.

अखबार ने आगे लिखा है कि भारत यहां ढांचागत विकास को बढ़ावा दे सकता है जिससे क्षेत्र में आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा. चीन के प्रधानमंत्री ली ने भी कहा है कि चाबहार और ग्वादार बंदरगाह एक दूसरे के पूरक हैं. चीन चाबहार के विकास को ग्वादार परियोजना या सीपीईसी को नजरअंदाज करने के प्रयास के रूप में नहीं देखता है.

इसी तरह इस्लामाबाद में ईरान के राजदूत मेहदी हॉर्नदोस्त ने भी कहा है कि चाबहार पर तीन देशों के बीच हुए समझौते से ग्वादार पर कोई असर नहीं पड़ेगा या सीपीईसी को कमतर नहीं आंका जाएगा. बल्कि इससे सभी को लाभ होगा.

पाकिस्तान की विफलता

वास्तव में पाकिस्तान अपनी असुरक्षा और साइडलाइन किए जाने के लिए खुद ही उत्तरदायी है. अभी अफगानिस्तान जाने के लिए भारत को पाकिस्तान की जमीन से होकर जाना होता है. अब भारत के पास नया विकल्प मिल जाएगा.

ईरान पर अभी तक प्रतिबंध लगे होने की वजह से ईरान-पाकिस्तान पाइप लाइन का काम पूरा नहीं हो सका है. मार्च 2016 में ईरान के राष्ट्रपति जब पाकिस्तान की यात्रा पर गए थे, तो उन्हें वहां अप्रिय हालात का सामना करना पड़ा था. आरोप लगाया था कि ईरान भारत के जासूसों को पाकिस्तान में आने से रोकने के प्रयास नहीं कर रहा है.

पाकिस्तान अभी यह नहीं देख रहा है कि तीन देशों के बीच जो समझौते हुए हैं वह भू-राजनीति से ज्यादा आर्थिक विकास के लिए मायने रखते हैं. चाबहार के जरिए भारत को ईरान तक पहुंचने का रास्ता मिलेगा तथा भारत को अफगानिस्तान और ईरान के लिए समुद्री रास्ते से व्यापार-कारोबार बढ़ाने का मौका मिलेगा और अफगानिस्तान को भी फायदा होगा.

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एक बात यह भी है कि पाकिस्तान बदलते वैश्विक माहौल में अपनी विदेश नीति का आधुनिकीकरण करने में विफल रहा है. पाकिस्तान का नेतृत्व यह नहीं समझ पा रहा है कि जहां शांति का माहौल होता है वहीं विकास और क्षेत्रीय व्यापार संभव हो सकता है.

पाकिस्तान की विदेश नीति बहुत कुछ वहां की रक्षा नीति के सहारे चलती है और रक्षा नीति केवल सैन्य लाभों को देखती है.पाकिस्तान को ग्लोबलाइज्ड वर्ल्ड की ओर देखना चाहिए जहां क्षेत्रीय सहयोग की महती जरूरत होती है.

पड़ोसी चार में से तीन देश एक समझौते तक पहुंच चुके हैं. पाकिस्तान ने क्षेत्रीय व्यापार के लिए खुद को सहायक होने के बजाए खराब देश के रूप में साबित किया है. चीन भी भविष्य की खातिर चाबहार को एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में देखता है. इन सबके बावजूद चीन की पहली कार्गो ट्रेन तेहरान पहुंच चुकी है.

First published: 13 June 2016, 7:35 IST
 
तिलक देवाशर @catchhindi

Tilak Devasher retired as Special Secretary, Cabinet Secretariat, to the Government of India. His book Pakistan: Courting the Abyss is releasing shortly.

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