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भोपाल गैस त्रासदी: क्यों भूल गए लोग चाहतराम सिंह को?

पूजा सिंह | Updated on: 2 December 2015, 12:01 IST
QUICK PILL
  • चाहतराम सिंह ने दो दिसंबर, 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी की पहली एफआईआर दर्ज करायी थी. उनकी पत्नी भी इस हादसे का शिकार हुई थीं.
  • इस त्रासदी के तीन दशक बीत जाने के बाद भी सरकार ने घटना के दिन किए गए उनके साहसिक कार्यों को औपचारिक मान्यता नहीं दी. उनकी पत्नी को गैस पीड़ित का दर्जा तक नहीं मिल पाया.

अपने नायकों को याद रखना समाज का दायित्व है. यह सच है कि भारतीय समाज में ऐसी प्रवृत्ति नहीं है लेकिन जब उन नायकों को अपने योगदान की स्वीकृति के लिये कानूनी लड़ाई लड़नी पड़े और वे उसमें भी कामयाब न हो सकें तो मामला बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हो जाता है.

भोपाल गैस कांड के बारे में विस्तृत अध्ययन करने वालों में भी ऐसे लोग कम ही होंगे जिन्होंने चाहतराम सिंह का नाम सुना हो. चाहतराम सिंह वह व्यक्ति हैं जिन्होंने भोपाल गैस त्रासदी की प्रथम सूचना (एफआईआर) दर्ज करायी थी. लेकिन इस त्रासदी के तीन दशक बीत जाने के बाद भी कोई सम्मान देना तो दूर सरकार ने घटना के दिन किए गए उनके साहसिक कार्यों को औपचारिक मान्यता तक नहीं दी.

चाहतराम सिंह की उम्र अब 83 वर्ष हो चुकी है और उनको सुनायी देना करीब-करीब बंद हो चुका है. शरीर से पूरी तरह स्वस्थ चाहतराम सुनायी न देने के कारण ठीक तरह से बातचीत नहीं कर पाते लेकिन उपेक्षा का दंश उनकी आंखों में साफ झलकता है. मध्य प्रदेश पुलिस से डीएसपी के रूप में सेवानिवृत्त हुए चाहतराम दुर्घटना के वक्त भोपाल के बजरिया थाने में नगर निरीक्षक यानी टीआई के रूप में तैनात थे. 

चाहतराम बताते हैं, "मैं नियमित गश्त पर था जब मैंने लोगों को अफरातफरी की हालत में भागते हुए देखा. रोककर पूछा तो कुछ लोगों ने बताया कि यूनियन कार्बाइड कारखाने में 'कुछ' हुआ है. मैंने हालात की गंभीरता को समझा और तत्काल वायरलेस पर इसकी सूचना स्थानीय पुलिस कंट्रोल रूम को दी. इसकी सूचना विभाग तथा उच्चाधिकारियों को दी. मुझे एक बजकर 20 मिनट पर घटना की जानकारी हुई और 1.30 बजे मैंने पुलिस महानिरीक्षक स्वराज पुरी को इसकी जानकारी पहुंचा दी."

मध्य प्रदेश पुलिस से डीएसपी के रूप में सेवानिवृत्त हुए चाहतराम भोपाल त्रासदी के वक्त बजरिया थाने में बतौर नगर निरीक्षक तैनात थे

वो बताते हैं कि इसके बाद उन्होंने अपनी नियमित गश्त रोकी और तत्काल घटनास्थल की ओर रवाना हो गये. रास्ते में उन्होंने भोपाल रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर को घटना की जानकारी दी और फिर आगे बढ़े. भोपाल स्टेशन के तत्कालीन स्टेशन मास्टर ने ट्रेनों को स्टेशन पर न रोककर उन्हें आगे बढ़ा दिया था इससे बड़ी संख्या में लोगों की जान बची थी, हालांकि इस दौरान खुद उनकी मौत हो गयी. 

उनकी इस सूझबूझ की तारीफ आज भी की जाती है. चाहतराम आज भी गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं.

चाहतराम कहते हैं, "मैंने अपनी वर्दी के रुतबे का प्रयोग किया और उस समय उस इलाके से गुजर रही तमाम गाड़ियों को रुकवाया. पीड़ितों को उनमें डलवाया और अस्पताल तथा सुरक्षित इलाकों की ओर रवाना किया. गैस का रिसाव बंद होने के बाद भी मैं लगातार तीन दिनों तक उस पूरे इलाके में राहतकार्यों में लगा रहा."

Chahat Ram

चाहतराम सिंह अपनी पत्नी के साथ

इस बीच उनकी पत्नी तथा बच्चों ने हजारों अन्य लोगों के साथ स्थानीय जेल पहाड़ी पर जाकर शरण ली और अपनी जान बचायी. हालांकि उनकी पत्नी गैस के असर से अछूती नहीं रह सकीं और साल 1998 में कैंसर से उनकी मौत हो गयी. चाहतराम को मलाल है कि तमाम प्रयासों के बावजूद उनकी पत्नी को गैस पीड़ित का दर्जा नहीं दिया गया.

चाहतराम कहते हैं, "इसमें कोई छिपी बात नहीं. भोपाल गैस कांड के बाद शहर में अचानक ऐसे धंधेबाज उग आये जिनके लिये गैस कांड एक वरदान की तरह था. उन्होंने लाखों-करोड़ों के वारे न्यारे किये. जो लोग उस समय शहर में नहीं थे उनको गैस पीड़ित का मुआवजा दिलाया गया जबकि मेरी पत्नी समेत कई वास्तविक पीड़ित यूं ही मर खप गये."

अपनी भूमिका साबित करने के लिये मुझसे प्रमाण मांगे जा रहे हैं और आवेदन करने के लिए कहा जा रहा है

चाहतराम ने थक हार कर अपने काम की मान्यता के लिये सरकार के दरवाजे पर दस्तक दी तो उन्हें कहा गया कि उन्हें इसके लिये आवेदन करना चाहिये था. वह हैरत जताते हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदियों में से एक में अपनी भूमिका साबित करने के लिये उनसे प्रमाण मांगे जा रहे हैं और कहा जा रहा है कि आपने आवेदन क्यों नहीं किया.

आवेदन के बाद भी कोई सुनवायी नहीं होने पर चाहतराम ने प्रदेश सरकार के समक्ष सूचना के अधिकार का प्रयोग किया. दो बार सूचना के अधिकार के तहत उनको दो अलग-अलग जानकारियां मिलीं. एक बार कहा गया कि उनका आवेदन मध्य प्रदेश सरकार ने खारिज कर दिया तो दूसरी बार जानकारी दी गयी कि उनका आवेदन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने खारिज किया है.

अत्यंत बुजुर्ग हो चुके भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार मनोहर चौरे को चाहतराम सिंह की याद है. वह कहते हैं कि भोपाल गैस कांड की कवरेज के दौरान तत्कालीन एसपी स्वराज पुरी के मुंह से उन्होंने चाहतराम सिंह का नाम कई बार सुना है लेकिन बाद में वह उनके बारे में कोई जानकारी नहीं रख सके. चौरे आश्चर्य जताते हैं कि चाहतराम सिंह को अपने काम की मान्यता के लिये लड़ाई लड़नी पड़ रही है.

चाहतराम सिंह को ताजा झटका तब लगा जब कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस संबंध में उनकी याचिका खारिज कर दी. अदालत का कहना है कि उनको घटना के तीन महीने के भीतर इस संबंध में आवेदन करना चाहिये था. चाहतराम निराश जरूर हैं लेकिन हताश नहीं. अब उनकी तैयारी इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से मुलाकात की है.

First published: 2 December 2015, 12:01 IST
 
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