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सोनोवाल की चुनौतियां: असम में अवैध अप्रवासी का मुद्दा सबसे ऊपर

सादिक़ नक़वी | Updated on: 23 May 2016, 23:27 IST
(कैच न्यूज)
QUICK PILL
  • असम बीजेपी गठबंधन पर उम्मीदों का भारी दबाव होगा. इसे वोट देने वाले चाहेंगे कि यह उन वादों को पूरा करे जो इसने चुनाव से पहले किए थे.
  • इस बात का अंदेशा भी है कि यह गठबंधन अवैध अप्रवासियों जैसे जटिल मसलों पर टकराव की स्थिति में न पहुंच जाए.

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने असम में स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया और इसमें खुद भाजपा ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 60 सीटें हासिल की हैं, जो बहुमत से महज चार सीटें कम है. अब दबाव इस गठबंधन, जिसमें असम गण परिषद (एजीपी) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) भी शामिल हैं, पर है कि यह उन वादों को पूरा करे जो इसने असम के लोगों से किये हैं.

हालांकि इस बात का अंदेशा भी है कि यह गठबंधन अवैध अप्रवासियों जैसे जटिल मसलों पर टकराव की स्थिति में न पहुंच जाए.

अप्रवासियों का मसला

प्रोफेसर ननिगोपाल महंता, एक शिक्षाविद जिन्होंने भाजपा की चुनावी रणनीति बनाने के दौरान काफी करीब से काम किया था, कहते हैं, 'अवैध अप्रवासी उन सबसे अहम मसलों में से एक है जिनके आधार पर यह गठबंधन सत्ता में आया है. वह कहते हैं, “अब उन्हें जल्द से जल्द कुछ करके दिखाना होगा.”

महंता कहते हैं कि नयी सरकार को यहां के मूल निवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी और उस पर उन्हें संविधान के तहत सुरक्षा मुहैया कराने का दबाव होगा. वो आगे कहते हैं, “इसकी एक पुख्ता योजना बाद में बनती रहेगी, लेकिन उन्हें इस दिसा में काम शुरू करना होगा.”

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यह ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और एजीपी जैसे संगठनों की लंबे वक्त से चली आ रही मांग है. इन्होंने भाजपा की मदद की क्योंकि इसने वादा किया था कि यह वृहद असमिया समाज के हितों की रक्षा करेगी. आसू (एएएसयू) के सलाहकार समुज्ज्ल भट्टाचार्या ने कैच को बताया था कि यह नयी सरकार पर अपने वादों को पूरा करने के लिए दबाव बनाती रहेगी.

संभावित टकराव

असम आंदोलन पर एक किताब लिख चुके प्रोफेसर मोनिरुल हुसैन कहते हैं कि यह मसला भाजपा और इसके सहयोगी दल एजीपी के बीच टकराव बढ़ा सकता है. वह इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इस मसले पर दोनों दलों की राय जुदा है. एजीपी की राय है कि असम समझौते को लागू किया जाये.

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने असम में स्पष्ट बहुमत हासिल किया है

असम समझौते में कहा गया है कि साल 1971 के बाद राज्य में आये सभी प्रवासियों को देशनिकाला दे दिया जाये, चाहे वे किसी भी धर्म के हों. दूसरी ओर, भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना के जरिये उन बंगाली हिन्दुओं को नागरिकता अधिकार देने का रास्ता साफ कर दिया है जो बांग्लादेश में उत्पीड़न के डर से असम आकर बस गये हैं.

स्थानीय संगठनों को केंद्र सरकार का यह कदम रास नहीं आया है और वे यह मांग कर रहे हैं कि पार्टी असम समझौते के मुताबिक चले. भाजपा के मुख्यमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार सर्बानंद सोनोवाल, जो अवैध अप्रवासियों के खिलाफ अभियान के नायक रहे हैं, ने नतीजों के तुरंत बाद कहा कि नयी सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए सीमा को बंद करेगी कि कोई घुसपैठ न हो. उन्होंने कहा कि गृह मंत्री राजनाथ सिंह पहले ही यह कह चुके हैं कि यह काम दो वर्षों के भीतर हो जायेगा.

गायें और ब्रह्मपुत्र की समस्या

राजनाथ ने हाल ही में यह भी कहा था कि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) यह सुनिश्चित करे कि गायों की तस्करी न हो. हालांकि यह काम इतना आसान नहीं है.कई जगहों पर ब्रह्मपुत्र नदी भारत और बांग्लादेश को अलग करती है, जिसकी वजह से सुरक्षा बलों का काम कठिन हो जाता है.

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दरअसल इसी नदीय सीमा के जरिये पशुओं की तस्करी भी होती है.जब यह रिपोर्टर इससे पहले बांग्लादेश से लगी सीमा वाले असमिया क्षेत्रों में गया था, तो पुलिस अधिकारियों ने बताया था कि ताजा घुसपैठ के मामलों में काफी कमी आई है. हालांकि सीमा की देखभाल कर रहे बीएसएफ के अधिकारियों ने साफ किया था कि गायों की तस्करी को रोकना काफी मुश्किल है.बीएसएफ के अधिकारियों ने यह शिकायत भी की कि बांग्लादेश की ओर से की गयी शिकायत के बाद केंद्र से ऐसे निर्देश आये हैं कि गोली तब तक न चलायी जाये, जब तक जान को खतरा न हो. इस निर्देश ने बीएसएफ का मनोबल गिरा दिया है.

कैच ने पहले यह खबर चलायी थी कि बीएसएफ की ओर से एक अतिरिक्त बटालियन लगा दिये जाने के बाद धुबरी में तस्करी कम हो गयी है. महंता कहते हैं कि सरकार इसराइल की सीमा सुरक्षा व्यवस्था से कुछ उपाय सीख सकती है, मसलन नदीय सीमा वाले क्षेत्रों में लेजर वाले बाड़ लगाने से स्थिति बेहतर हो सकती है.

आखिर कौन है असमिया?

सोनोवाल ने उम्मीद जतायी थी कि अभी चल रही नेशनल रजिस्ट्रेशन (एनआरसी) की प्रक्रिया राष्ट्रीयता के सवाल का हल निकाल देगी. लेकिन, आसू जैसे संगठन, जिनका रुख कड़ा है, इस पर किस तरह प्रतिक्रिया देंगे, यह स्पष्ट नहीं है. कैच से बात करते हुए भट्टाचार्य ने दावा किया था कि अवैध अप्रवासियों को वोट की अनुमति दिये जाने में राज्य के संगठनों की भी मिलीभगत रही थी.

राजनाथ सिंह ने हाल ही में कहा था कि बीएसएफ यह सुनिश्चित करे कि गायों की तस्करी न हो.

हालांकि, असम में भाजपा के वरिष्ठ नेता भट्टाचार्य की इस बात को अधिक गंभीरता से नहीं लेते और बताते हैं कि किस तरह असम में हर व्यक्ति बाहरी है. वह पूछते हैं, “कौन असमिया है? आप असमिया की परिभाषा किस तरह देंगे? असम में कौन प्रवासी नहीं है?”

यह बताते हुए कि खुद उनके परिवार की पृष्ठभूमि बंगाली रही है, वह कहते हैं, “यहां रह रहे लोगों में वर्षों का फर्क है कि कब वे यहां आये और बस गये. कुछ पांच सौ साल पहले आये, जबकि बाकी पिछली शताब्दी में आये.”

जनजातीय आरक्षण

इस बीच महंता यह भी याद दिलाते हैं कि देशी जनजातीय समुदायों का आरक्षण भी एक बड़ी चुनौती साबित होगा. छह जनजातीय समूहों- ताइ अहोम, कोच राजबोंगशी, सुता, मोरान, मुतोक और चाय के काम से जुड़ी जनजातियों (टी ट्राइब्स) की ओर से अनुसूचित जनजाति श्रेणी में शामिल किये जाने की मांग की जा रही है. केंद्र सरकार ने इन मांगों पर विचार करने के लिए एक समिति का गठन कर दिया है. इस बारे में अब तक फैसला नहीं हो सका है. यह वादा भाजपा के घोषणापत्र का हिस्सा भी था.

लेकिन, राभा और बोडो जैसे जनजातीय समूह इस मांग का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि इससे उनकी स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा. हालांकि चुनावों के दौरान भाजपा ने बीपीएफ, राभा और तिवा समूहों के साथ मिल कर अभी तक इनको एक साथ रखने में कामयाबी हासिल की है.

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सीएसडीएस की ओर से चुनाव के बाद किए गए एक विश्लेषण के मुताबिक, 68 फीसदी बोडो लोगों ने गठबंधन को वोट दिया, जबकि अन्य अनुसूचित जनजाति समूहों से 48 फीसदी लोगों ने इन्हें वोट दिया. इसके अलावा, विश्लेषण यह भी कहता है कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा मांग रहे छह समुदायों के 49 फीसदी मतदाताओं ने भी भाजपा गठबंधन को वोट दिया.

नौकरियों का सवाल

चुनाव अभियान के दौरान भाजपा ने विकास के मोर्चे पर बड़े-बड़े वादे किये थे. इनका प्रचार इस बात पर केंद्रित रहा कि गोगोई सरकार में कुशासन हुआ, राज्य के मंत्रालयों में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला, मानव विकास सूचकांकों में राज्य पिछड़ गया और कांग्रेस सरकार स्थानीय लोगों के लिए नौकरियों के अवसर बनाने में नाकामयाब रही.

महंता कहते हैं, “उन्होंने 25 लाख नौकरियों का वादा किया है. इसका मतलब है हर साल पांच लाख नौकरियां. ऐसा करना आसान नहीं होगा.”

वह यह भी कहते हैं कि विकास और नौकरियां सुनिश्चित करने के लिए नयी सरकार को एक विस्तृत औद्योगिक योजना लानी होगी. “अगर ये अपने वादों का दस फीसदी भी पूरा कर दें, तो लोग खुश हो जायेंगे,” यह बताते हुए हुसैन कहते हैं कि कांग्रेस सरकार ने अपने 15 सालों के कार्यकाल में “कोई काम नहीं किया”.

विशाल नदी का प्रबंधन

भाजपा की असम इकाई के पूर्व अध्यक्ष सिद्धार्थ भट्टाचार्य, जिन्होंने पूर्वी गुवाहाटी विधान सभा क्षेत्र से लड़ते हुए राज्य में दूसरी सबसे बड़ी जीत हासिल की है, कहते हैं, विशाल ब्रह्मपुत्र का प्रबंधन बड़ी चुनौतियों में से एक होगा. वह याद दिलाते हैं कि नदी के कटाव और बाढ़ की वजह से हर साल लाखों लोगों का जीवन प्रभावित होता है.

वह यह भी बताते हैं कि इस नदी का पूरा पानी बिना किसी इस्तेमाल के बह जाने दिया जाता है. “सिंचाई या बिजली उत्पादन के लिए पिछली सरकार के पास कोई उचित योजना नहीं थी.”

First published: 23 May 2016, 23:27 IST
 
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