Home » इंडिया » Catch Hindi: changing two words in your daily life can change your life overall
 

महज दो शब्द बदलने से बदल सकती है आप की जिंदगी

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST

आपकी जबान केवल दूसरों पर ही असर नहीं डालती. इसका आपके मस्तिष्क पर भी गहरा असर पड़ता है. शब्दों के चयन का सीधा असर आपके जीने के नजरिए पर पड़ता है. ये कहना है अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बर्नार्ड रॉथ का.

रॉथ मानते हैं कि अगर हम अपनी जिंदगी में कुछ शब्दों का प्रयोग बंद कर दें तो हमारी जिंदगी पहले से बेहतर हो जाएगी. रॉथ ने अपनी नई किताब 'दी एचीवमेंट हैबिट' में कुछ भाषाई टिप्स दिए हैं जिनसे आपकी जिंदगी पहले से सरल हो जाएगी.

इस किताब में दिए गए दो सबसे सिंपल टिप्स निम्न हैं:

1- 'लेकिन' की जगह 'और'


हो सकता है कि आपने भी कभी कहा हो कि 'मैं पिक्चर तो देखना चाहता हूं लेकिन मुझे काम करना है.'

रॉथ कहते हैं कि हमें इस तरह बात करने से बचना चाहिए. उनके अनुसार इसकी जगह हमें कहना चाहिए कि 'मैं पिक्चर देखना चाहता हूं और मुझे काम भी करना है.'

रॉथ ने किताब में बताया है, "जब आप 'लेकिन' का प्रयोग करते हैं तो आप अपने ज़हन में एक द्वंद्व (कई बार एक कारण) पैदा कर देते हैं जो असल में कहीं होता ही नहीं." जबकि आप पिक्चर भी देख सकते है और काम भी कर सकते हैं बस उसके लिए एक सही समाधान खोजने की जरूरत होती है.

रॉथ लिखते हैं, "जब आप 'और' का प्रयोग करते हैं तो आपके मस्तिष्क को ये सोचना पड़ता है कि वो दोनों बातों को कैसे पूरा कर सकता है."

रॉथ कहते हैं कि हो सकता है कि आप कोई ऐसी फिल्म देख लें जो थोड़ी छोटी हो या फिर आप अपने काम का कोई हिस्सा किसी और की मदद से पूरा कर लें.


2. 'करना है' कि जगह 'करना चाहता हूं'


रॉथ एक और बहुत ही सरल सुझाव देते हैं. वो कहते हैं कि जब कभी आप ये कहें कि 'मुझे....करना है' तो उसकी जगह कहें, 'मैं ....करना चाहता हूं.'

रॉथ कहते हैं, "इस छोटे से मेंटल एक्सरसाइज से हमें ये अहसास होता है कि हमारी वर्तमान जिंदगी, भले ही अब वो हमें बुरी लग रही है, हमारी पुरानी चाहतों का नतीजा है."

रॉथ इसे समझाने  के लिए अपने एक छात्र का उदाहरण देते हैं. उस छात्र को लगता था कि उसे बेहतर करियर के लिए अपने ग्रेजुएशन प्रोग्राम में गणित विषय लेना चाहिए, जबकि उसे गणित विषय पसंद नहीं था.

इस एक्सरसाइज को कुछ समय तक करने के बाद उस छात्र को अहसास हो गया कि वो खुद गणित विषय की पढ़ाई करना चाहता था क्योंकि रुचि न होने के कारण क्लास में उसे जितनी ऊब होती है वो उस लाभ के सामने कुछ नहीं जो उस कोर्स को पूरा करने से मिलेगा.

रॉथ ने किताब में समझाया है कि ये दोनों टिप्स प्राब्लम-सॉल्विंग की नई तकनीकी 'डिजाइन थिंकिंग' का हिस्सा हैं.

वो कहते हैं कि इस तकनीकी के इस्तेमाल से आप अपनी 'सोचने की आदत' को चुनौती देते हैं और किसी समस्या को उसके मूल रूप में देख पाते हैं.

वो कहते हैं कि अपनी भाषा के संग ये प्रयोग करके आपको अहसास हो जाता है कि कोई मुश्किल उतनी मुश्किल नहीं थी जितना आप उसे समझ बैठे थे.

हमारे बड़े-बुजर्गों की तरह रॉथ भी मानते हैं कि 'तोल तोल के बोले गए बोल' एक गंभीर व्यक्तित्व और सफल ज़िंदगी की बुनियाद होते हैं.

First published: 10 February 2016, 10:32 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी