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सरस्वती नदी: मिथक को हकीकत बनाने में लगी हरियाणा सरकार

राजीव खन्ना | Updated on: 26 July 2016, 7:58 IST
(कैच न्यूज)

भाजपा के नेतृत्व वाली हरियाणा सरकार पौराणिक नदी सरस्वती को फिर से जीवित करने के लिए उत्सुक है. उत्साह के साथ काम करते हुए इसने कई ऐसे कदम उठाये हैं ताकि यह परियोजना तेजी से आगे बढ़ सके. यहां तक कि विपक्षी दलों कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय लोक दल ने भी अतीत में इस ‘लुप्त’ नदी को खोजने और इसे एक धार्मिक पर्यटन स्थल के तौर पर बढ़ावा देने में दिलचस्पी दिखायी है.

लेकिन बुद्धिजीवीयों और वामपंथियों का सवाल यह है कि यमुनानगर के नजदीक जो सूखे जल मार्ग खोजे गये हैं, क्या यह वाकई वही सरस्वती नदी है जिसका उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में है? या फिर राज्य में आने वाली हर सरकार जनमानस की भावनाओं का इस्तेमाल कर रही है?

प्रेक्षक बताते हैं कि लुप्त नदी सरस्वती को तलाशने की कोशिशें अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दौरान साल 2003 में तेज हुई थीं, जब तत्कालीन पर्यटन और संस्कृति मंत्री जगमोहन ने सरस्वती हेरिटेज प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी. बाद में यूपीए के शासन काल में यह परियोजना ठप पड़ गयी.

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यातायात, पर्यटन और संस्कृति से संबद्ध स्थायी संसदीय समिति ने नवंबर 2005 में संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कथित तौर पर इस परियोजना पर आपत्ति की थी, जिसके बाद इसे रोक दिया गया.

रिपोर्ट में कहा गया था, 'समिति का यह स्पष्ट मत है कि सरस्वती हेरिटेज प्रोजेक्ट पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन के लिए तय मानकों को पूरा नहीं करता क्योंकि किसी शैक्षणिक संस्था या विश्वविद्यालय ने इसकी अनुशंसा नहीं की है. मंत्रालय को यह पता नहीं है कि किस शोध एजेंसी/ वैज्ञानिक सर्वे ने यह बताया कि घग्घर और चौतंग के सूखे नदीतल दरअसल सरस्वती के नदीतल थे.'

हरियाणा सरकार ने यमुनानगर की मुस्तफाबाद तहसील का नाम बदल कर सरस्वती नगर कर दिया है

लेकिन आरएसएस के प्रचारक से राजनेता बने मनोहर लाल खट्टर और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र के साथ ही राज्य में भी भाजपा के सत्ता में आ जाने से चीजें एक बार फिर से बदल गई हैं.

पिछले साल सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड (एसएचडीबी) का गठन कर खट्टर ने इस परियोजना को आगे बढ़ाया है और खबर है कि उन्होंने स्थल से संबंधित खुदाई के लिए 50 करोड़ रुपये स्वीकृत किये हैं.

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दरअसल पिछले साल मई में यमुनानगर के मुगलवाली गांव में कुछ जलवाही स्तरों के मिलने के बाद यह मान लिया गया कि ये सरस्वती नदी के भूमिगत जलमार्ग हैं. लोग उत्साहित हो गये, दावे होने लगे, उन्हें खारिज किया जाने लगा, भविष्य के लिए योजनाएं बनायी जाने लगी और इसके बाद सरस्वती से जुड़ी बहस तेज हो गई कि क्या यह किसी ग्लेशियर से निकला प्रवाह थी या मानसूनी धारा थी.

खबरों के मुताबिक वहां सबसे महत्वपूर्ण जलवाही स्तर की खोज एक मुसलमान मजदूर खलील ने की. दरअसल उस समय वहां मनरेगा के तहत काम चल रहा था. कई लोगों का यह मानना था कि चूंकि जमीन से जुड़े अभिलेखों में इस पौराणिक नदी के मार्ग का उल्लेख किया गया है, ऐसे में इस मामले में और काम किये जाने की जरूरत है.

साथ ही खुदाई स्थल पर इसके ‘पवित्र जल’ का पान करने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ने, उस जगह पर एक पवित्र ध्वज फहराये जाने और जलवाही स्तर के स्रोत को धातु से सुशोभित करने की भी खबरें आयीं. इसके अलावा एक मंदिर बनाये जाने के लिए भी वह जमीन काफी मुफीद मानी गयी.

प्रेक्षकों का कहना है कि इससे पहले सरस्वती नदी, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में है, के अवशेष कई जगहों पर पाये जा चुके हैं और यमुनानगर में आदि बद्री से जिस पहाड़ी से पानी निकलता दिखायी दिया, उसे घेर दिया गया. बाद में इस जगह को सरस्वती उद्गम स्थल का नाम दिया गया. इससे पहले कुरुक्षेत्र के भोर सैयदां गांव के पास भी एक सूखा नदीतल प्राप्त हुआ था.

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लेकिन इस बार भाजपा के सत्ता में होने से इस ‘खोज’ का प्रचार और शोरशराबा अभूतपूर्व था. इसने हिंदुत्व विचारधारा को अपने दावे पेश करने में मदद की और तब से यह कोशिश हो रही है कि धार्मिक पर्यटन का एक मॉडल सामने लाया जाये.

सरस्वती के अस्तित्व का कोई ऐतिहासिक या भौगोलिक साक्ष्य मौजूद नहीं हैं

उसके बाद हरियाणा सरकार ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए यमुनानगर की मुस्तफाबाद तहसील का नाम बदल कर सरस्वती नगर कर दिया है.

खबरों के मुताबिक उसी दिन केंद्र सरकार ने कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस चांसलर प्रोफेसर केएस वल्दिया की अध्यक्षता में एक समिति का गठन कर दिया ताकि इस दावे की जांच की जा सके कि पाये गये सूखे जल मार्ग वास्तव में लुप्त सरस्वती नदी ही हैं. जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने कहा है कि वल्दिया और अन्य विशेषज्ञों व इतिहासकारों का यह 'कार्य बल' हरियाणा और राजस्थान में लुप्त नदी की खोज के मामले को देखेगा.

राज्य स्तर पर देखें तो भूपिंदर सिंह हुड्डा के नेतृत्व वाली पिछली कांग्रेस सरकार ने भी इस नदी के मार्गों को खोजने की कोशिशें की थी.

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हरियाणा सरकार अब चाहती है कि लुप्त नदी इस महीने के आखिर तक बहने लगे. इसके लिए इसके जल मार्गों में अलग-अलग तरीकों से पानी छोड़ा जायेगा.

दादूपुर फीडर के जरिये 30 जुलाई को ऊंचा चांदना गांव से सरस्वती में पानी छोड़े जाने का प्रस्ताव है. वहां इस समय सफाई का काम चल रहा है. इस मार्ग में यमुनानगर, कुरुक्षेत्र और कैथल जिले पड़ेंगे. एक नजरिया यह है कि इस पानी का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है.

आगे चल कर आदि बद्री पर एक बांध बनाये जाने की योजना है. इस नदी को नया जीवन देने के लिए 69 संस्थाएं लगी हुई हैं और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के साथ कंशोर्सियम बनाने के बारे में बातचीत चल रही है. नदी को फिर से जीवित करने के लिए यमुनानगर में छह और आदि बद्री और मुगलवाली में दो बोरवेल बनाये जायेंगे.

राज्य सरकार ने दूर की सोचते हुए एक नीति बनाने का भी फैसला लिया है ताकि गंदे पानी को शोधित कर इसे सिंचाई और अन्य कामों के लिए इस्तेमाल करने के तरीके निकाले जा सकें, जिससे सरस्वती नदी को प्रदूषण से मुक्त रखा जा सके.

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एसएचडीबी के एक प्रवक्ता के मुताबिक यह फैसला भी किया गया है कि एक नीति बनाई जायेगी और उन लोगों के लिए दंड का प्रावधान किया जायेगा जो लोग घरेलू दूषित जल और अशोधित जल नदी में बहायेंगे.

वन विभाग को भी निर्देशित किया गया है कि यह स्योंसर वन क्षेत्र में नदी के साथ एक जलाशय के निर्माण की एक योजना 31 अगस्त 2016 तक तैयार कर ले.

लेकिन सरकार के इस उत्साह के बीच कई ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब मिलने बाकी हैं. सबसे अहम सवाल यह है कि अगर वाकई कोई सरस्वती नदी थी, तो इसके बहने का मार्ग क्या था. अगर यह वही है जैसा कि दावा किया जा रहा है तो वह सरस्वती नदी कौन सी है जिसके इलाहाबाद के त्रिवेणी का एक हिस्सा होने का दावा किया जाता है.

दूसरी बात, एक दशक पहले मोदी किस सरस्वती नदी के लिए बड़े उत्सव का आयोजन कर रहे थे, जब उत्तरी गुजरात के पाटन जिले के सिद्धपुर में पानी से भरा एक सूखा जल मार्ग मिला था. संयोग से इस कार्यक्रम में धर्मपुरोधा आसाराम को बुलाया गया था जो अभी 16 साल की एक लड़की के यौन शोषण और जमीन पर अवैध कब्जों सहित कई मामलों में जेल में हैं.

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हरियाणा के एक भूगोल विशेषज्ञ प्रोफेसर महावीर जुगरान कहते हैं कि सरस्वती के अस्तित्व के कोई ऐतिहासिक या भौगोलिक साक्ष्य मौजूद नहीं हैं. उन्होंने कैच न्यूज को बताया, 'यह एक पौराणिक नदी है और जिन्हें इसका मार्ग बताया जा रहा है वे दरअसल ऐसे सूखे जल मार्ग हैं जिन्हें रिमोट सेंसिंग के जरिये खोजा गया है. सरकार की कोशिश इस नदी से जुड़े मिथकों को जीवित करने के प्रयासों से अधिक कुछ भी नहीं है.'

उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरस्वती के इलाहाबाद, पाटन, राजस्थान और हरियाणा में होने की कहानियों के साथ ही एक कहानी यह भी है कि इसी नाम की एक नदी अफगानिस्तान में भी थी और भारत आने के बाद आर्यों ने कई जल मार्गों का नाम सरस्वती रख दिया था.

सीपीआई (एम) के राज्य सचिव इंद्रजीत इस मामले को राजनीतिक नजरिये से देखते हैं. वह कहते हैं, 'मूल रूप से यहां आरएसएस का मनोविज्ञान काम कर रहा है. सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा कोई अवशेष अब देश में नहीं बचा है क्योंकि वह नदी अब पाकिस्तान में बहती है. ऐसे में ये लोग भारत में सरस्वती सभ्यता खड़ी करना चाहते हैं. वे लोग यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि सरस्वती नदी दरअसल शिवालिक की तलहटियों से निकला एक जलमार्ग है. भगवाकरण की कोशिशों का यह एक और उदाहरण है.'

First published: 26 July 2016, 7:58 IST
 
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