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#चेन्नईबाढ़ः राहत कार्य में घुसी जाति व्यवस्था

सलमा रहमान | Updated on: 9 December 2015, 20:00 IST
QUICK PILL
  • तमिलनाडु में बाढ़ के कहर से हजारों लोग पीड़ित हैं लेकिन राहत एवं बचाव कार्य में जातिगत भेदभाव के कारण दलितों तक नहीं पहुंच रही है पर्याप्त मदद.
  • एक सर्वेक्षण के अनुसार राज्य के सबसे ज्यादा प्रभावित कडलोर जिले में दलितों के 90 फीसदी मकान, मवेशी और फसल नष्ट हो चुके हैं.

तमिलनाडु में बीते कुछ हफ्तों में पिछले सौ सालों की सबसे अधिक बारिश हुई. राज्य के अधिकांश हिस्सों में दिल दहलाने वाले दृश्य आम बात थे. देश-विदेश सभी जगहों से लोगों ने बढ़-चढ़ कर पीड़ितों की मदद की. लेकिन इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है.

नेशनल कैंपेन फॉर ह्यूमन राइट्स (एनसीडीएचआर) और द सोशल अवेयरनेस सोसाइटी ऑफ यूथ (एसएएसवाई) की एक ताजा रिपोर्ट के अऩुसार राज्य के सबसे ज्यादा वंचित क्षेत्रों में रहने वाले दलितों तक पर्याप्त मदद नहीं पहुंच रही है.

राज्य का कडलोर जिला इस विभिषिका से सबसे प्रभावित माना जा रहा है. यहां का दलित समुदाय बाढ़ से अत्यधिक प्रभावित हुआ है लेकिन उसतक उतनी मदद नहीं पहुंच रही जितनी पहुंचनी चाहिए.

बाढ़ ने सबकुछ बहा दिया


बाढ़ ने कडलोर जिले के निचले इलाकों में मकानों-सड़कों को जलमग्न कर पूरी तरह अपंग बना दिया. कीनानूर, मनवलनल्लूर, ओट्टिमेडु और करीब 10 अन्य गांव जलमग्न हो गए. 

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एनसीडीएचआर

  • इस सर्वेक्षण में क्षेत्र के 20 गांवों के दलित और गैर दलित परिवारों को शामिल किया गया. जिसमें पता चला कि दलित परिवारों के 90 फीसदी घर, मवेशी और फसलें बाढ़ की भेंट चढ़ गए.
  • अनुसूचित जातियों पर बाढ़ का ज्यादा प्रभाव पड़ने की प्रमुख वजह यह थी कि इनमें से ज्यादातर लोग नदियों के किनारे या निचले इलाकों में रहते थे. जिसके कारण उनके बाढ़ के शिकार होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है. यहां पर अधिकांश लोगों के घर मिट्टी और घास-फूस से बने थे, जिन्हें बाढ़ अपने साथ बहा ले गई. 
  • नेशनल दलित वाच के समन्वयक राजेश सिंह ने कहा, "यह जाति विभाजन की पुनः पुष्टि करता है. क्योंकि इन लोगों को अपने गांवों से दूर एकांत में रहने के लिए मजबूर किया गया था. यह सामाजिक मानदंडों से अलग सख्ती से बनाए गए नियम हैं जो वहां स्पष्ट दिखते हैं."

कोई आश्रय नहीं

  • जिले की दलित आबादी को बुनियादी सुविधाएं जैसे स्कूल, सामुदायिक केंद्र भी मुहैया नहीं कराए गए थे. जिससे वादाक्कुथुरई, कोंगारायानपलयम, अगरम और आंबेडकर नगर गांवों में आई बाढ़ के दौरान इन लोगों के पास शरण लेने की कोई जगह ही नहीं थी.

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एनसीडीएचआर

  • रिपोर्ट के मुताबिक, कई ऐसे उदाहरण भी हैं जब इन दूरदराज के दलित गांवों में कनेक्टिविटी न होने के कारण सरकारी बचाव दल वहां पहुंचने में नाकाम रहे. परिणामस्वरूप जब बाढ़ का पानी आया तब वाडुकथिरुमेडु, चिल्लानकुप्पम, कडुवेटी, वारागुरुपेट्टई और अन्नावेलि गांवों के दलित परिवार वहां से सुरक्षित जगहों पर नहीं पहुंचाए जा सके.

नहीं बुझ सकी प्यास

  • सर्वेक्षण में शामिल करीब 90 फीसदी गांवों में पीने के पानी का इंतजाम नहीं था. एसएएसवाई के निदेशक पांडियन ने कहा, "तमाम दलित परिवारों को पेयजल नहीं मिलता था. बाढ़ के चलते सार्वजनिक पेयजल के साधन नष्ट हो गए. और वादाक्कुथुरई, एन्ननगरम और कोंगारायानपलयम जैसे गांवों की बस्तियों में रहने वाले ग्रामीणों को पेयजल के लिए मीलों पैदल यात्रा करनी पड़ी."
  • पांडियन मुंशी प्रेमचंद की मार्मिक कहानी "ठाकुर का कुआं" को याद करते हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि, "कोंगारायानपलयम में दबंग जाति के लोगों ने दलितों को स्वच्छ पानी के स्रोतों तक नहीं पहुंचने दिया. ऐसे कठिन वक्त में भी लोग जातिगत भेदभाव से बाज नहीं आ रहे हैं.  इससे उनके रवैया का पता चलता है."

अस्तित्व के लिए संघर्ष

  • सर्वेक्षण के मुताबिक ऊंची जाति के लोग जिले के आसान पहुंच वाले इलाकों में रहते थे इसलिए राहत-बचाव कार्य इन लोगों के गांवों तक ही सीमित रहे. 
  • रिपोर्ट के मुताबिक, अलमेलुमंगपुरम गांव में एक चिकित्सा शिविर ऐसी जगह लगाया गया जहां ऊंची जाति के लोगों का प्रभाव था. ऐसे में हिंसा और भेदभाव के डर से दलित समुदाय के लोगों ने शिविर में न जाना ही सही समझा. 
  • सिंह कहते हैं,  "ज्यादातर दलित गांवों में सीवर के साथ बाढ़ का भर गया. नलनथेथु, अलमेलुमंगपुरम और वादाक्कुथुरई जैसे गांवों में मलेरिया और डेंगू का खतरा मंडराने लगा था."
  • कैच ने कडलोर के जिलाधिकारी से जब इस मुद्दे पर बात करना चाहा तो उन्होंने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

First published: 9 December 2015, 20:00 IST
 
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