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राजधानी, एक दशक पुरानी, फिर भी वीरानी

शिरीष खरे | Updated on: 27 May 2016, 15:33 IST
(शिरीष खरे)
QUICK PILL
नए शहर के लिए प्रस्तावित 40 हजार करोड़ रुपए में से आठ हजार करोड़ रुपए व्यय हो चुके हैं. 2015 तक दो से तीन लाख लोगों को बसाने का लक्ष्य था.शहर को इंसानों की बजाय आधुनिकतम तकनीक के सहारे संचालित करने की योजना थी. इसकी नगर योजना इस तरह से बनी है कि यहां कोई धारावी जैसी झुग्गी न बस सके.

किसी प्रदेश का ऐसा मंत्रालय है जहां सरकार अपने नुमाइंदों को हर रोज 25 किमी का फासला तय कराने के लिए लाखों रुपए खर्च करती है? नया रायपुर में सुबह साढ़े 10 से शाम साढ़े 5 बजे के बीच भारी गहमागहमी होती है. उसके बाद कोसों दूर तक इंसान तो क्या उसकी परछाई भी नजर नहीं आती.

इक्का-दुक्का हथियार बंद सुरक्षाकर्मी ही दिखाई देते हैं. यह तस्वीर है छत्तीसगढ़ की नई राजधानी नया रायपुर की. 40 हजार करोड़ रुपए से प्रस्तावित नए शहर पर बीते एक दशक में 8 हजार करोड़ रुपए व्यय किए जा चुके हैं, फिर भी नए और पुराने शहर का फासला अमीर और गरीबों के बीच की खाई जैसा है जो पटने का नाम नहीं ले रहा. चौड़ी-चमकदार सड़कों, गगनचुंबी इमारतों, पानी, बिजली की दुरुस्त व्यवस्था के बावजूद लोग हैं कि यहां बसने को तैयार नहीं.

नया रायपुर विकास प्राधिकरण ने 2015 तक 2 से 3 लाख लोगों को बसाने का लक्ष्य रखा था, जबकि नई राजधानी की आबादी बमुश्किल चालीस हजार है जिसमें ज्यादातर इसी इलाके के पुराने बाशिंदे हैं.

नगर योजना

कहने को 40 सेक्टरों में 21 आवासीय हैं और हर सेक्टर को 16 हजार की आबादी के हिसाब से तैयार किया गया है. लेकिन सेक्टर 27, 29 में ही कुछ लोगों ने घर खरीदे हैं. यहां भी 6.5 हजार आवासों में 5 हजार से ज्यादा तो खाली पड़े हैं. 15 साल पहले जिस मकसद से सरकार ने नई राजधानी का खाका खींचा था, वह अभी तक पूरा नहीं हुआ है.

भूमि प्रबंधन के नाम पर सरकार ने दस हजार हैक्टेयर जमीन को लक्ष्य कर नई आबादी बसाने के लिए पुरानी आबादी को उजाड़ा था. नई राजधानी को तैयार करने का काम देख रही नोडल एजेंसी नया रायपुर विकास प्राधिकारण के तत्कालीन अध्यक्ष एन बैजेन्द्र का कहना था कि बसाहट के हिसाब से यह देश का सबसे बेहतरीन शहर होगा. मगर एक दशक गुजरने के बावजूद उनका दावा हकीकत के आसपास नहीं ठहरता.

राज्य का मंत्रालय बनाने के लिए राखी गांव को उजाड़ा गया था. विस्थापन का दर्द झेल रहीं कामता बाई बीते दिनों को याद करती हुईं बताती हैं, 'पूरा गांव बसा था, खेती-किसानी, गली-मोहल्ले और बस्तियां थीं. पर दस साल पहले अफसरों ने हमें बताया कि अब यहां नई राजधानी बसाई जाएगी. इसमें नए लोग आंएगे. हमारी दुनिया उजाड़कर अब बड़े-बड़े घर बन गए हैं, लेकिन सबके सब खाली हैं.'

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2000 में देश के नक्शे पर तीन नए राज्य बने. मगर सिर्फ छत्तीसगढ़ ने रायपुर से बाहर और ईको फ्रेंडली थीम पर एक नई राजधानी बनाने की दिशा में उड़ान भरी. इस शहर की लगभग चौथाई जमीन हरित क्षेत्र के लिए आरक्षित है. संचार सेवाओं की लाइनें आधुनिक मशीनों के जरिए तैयार की जा चुकी हैं. पानी, बिजली की सारी लाइनें भी भूमिगत बना दी गई हैं. इसके लिए बुनियादी ढांचा भी पहले ही बनकर तैयार हो गया है, लेकिन अब भी इंतजार है तो बस लोगों का. आखिर लोग यहां आते क्यों नहीं है?

क्योंकि पर्यटन स्थल है, शहर नहीं

संचालनालय में कार्यरत एक अधिकारी बताते हैं जब पुराने शहर में ही सारी सुविधाएं हैं तो कोई क्यों यहां रहने आए. जंगल सफारी, बॉटनिकल गार्डन, सेंट्रल पार्क कौतूहल तो पैदा करते हैं, लेकिन पर्यटन-स्थलों के तौर पर. घूमने आए लोग घर खरीदकर रहना नहीं चाहते. वहीं, कुछ लोगों का कहना है कि नए रायपुर में मध्यम वर्ग के लिहाज से अब तक स्कूल, अस्पताल और बाजार जैसी सुविधाएं नहीं हैं. वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता गौतम बंद्योपाध्याय मानते हैं कि यह पूरी योजना रियल इस्टेट और कमीशन को बढ़ावा देने के चलते अव्यहारिक है.

उधर, राज्य सरकार का दावा है कि नया रायपुर, अहमदाबाद और गांधीनगर की तरह दो अलग-अलग शहर नहीं होंगे, बल्कि यह पुराने रायपुर शहर का ही विस्तार होगा. यह 21वीं सदी की पहली योजनाबद्ध तरीके से बसाई गई राजधानी होगी जहां मलिन झुग्गियों को पनपने का मौका नहीं दिया जाएगा.

नया रायपुर विकास प्राधिकारण के एक अधिकारी बताते हैं कि यह भारत की पहली स्मार्ट सिटी होगी जिसमें शहर को इंसानों की बजाय आधुनिकतम तकनीकों के सहारे संचालित किया जाएगा. शहर की योजना को इस तरह से बनाया गया है कि यहां कोई धारावी जैसी झुग्गी न बस सके.

बंद्योपाध्याय का आरोप है कि नई राजधानी को स्मार्ट बनाने के नाम पर गरीबों को भविष्य में भी स्थान नहीं मिलेगा. नई आबादी नहीं बसने के सवाल पर पं. रविशंकर विवि में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रवीन्द्र ब्रह्मे बताते हैं, 'रोजगार देने वाले शहर में लोग अपने आप बसना शुरू कर देते हैं, लेकिन नए रायपुर में रोजगार की उतनी संभावनाएं पैदा नहीं हो पा रही हैं कि जो लोग यहां बसने लगें.'

रोजगार का पता नहीं

दावा था कि नया शहर सवा दो लाख लोगों को रोजगार देगा. कहा था कि सबसे ज्यादा सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट से 47 हजार और संस्थागत क्षेत्रों से 32 हजार लोगों को काम मिलेगा. इसके अलावा राजधानी परिसर, निर्माण उद्योग, शासकीय कार्यालयों, आवासीय क्षेत्र, थोक व्यापार, सॉफ्टवेयर टेक्नॉलाजी पार्क और ट्रांसपोर्ट हब सेक्टर से एक लाख चालीस हजार लोगों को रोजगार देने की बात थी. मगर दस सालों में ऐसा कोई सेक्टर नहीं उभरा कि बड़ी तादाद में लोगों को काम मिलने लगे.

नए रायपुर में मध्यम वर्ग के लिहाज से अब तक स्कूल, अस्पताल और बाजार जैसी सुविधाएं नहीं हैं

ज्यादातर सेक्टर कब तक पूरी तरह विकसित होंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता. जैसे कि आवासीय क्षेत्र में 14 हजार लोगों को काम दिलाने का लक्ष्य था, लेकिन यह और इसी की तरह कई सेक्टर विकसित हो पा रहे हैं.

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'नई राजधानी से प्रभावित किसान कल्याण समिति' के कार्यकर्ता रूपक चंद्राकर बताते हैं, 'लोगों ने रहने की बजाय निवेश को ध्यान में रखते हुए आवास खरीदे हैं, इसलिए शहर कब बसेगा, इसका जवाब इसे बनाने वालों को भी पता नहीं.'

2031 तक बसेगी साढ़े 5 लाख आबादी

नया रायपुर विकास प्राधिकरण सीईओ रजत कुमार के मुताबिक, 'शहर को अगले तीस साल के हिसाब से प्लॉन किया गया है. इसमें 2031 तक साढ़े 5 लाख लोगों को बसाने के लिए तैयारी की जा रही है. इस समय 2-3 हजार सरकारी कर्मचारियों के लिए आवास हैं. बीते छह साल में तो बुनियादी ढांचे खड़े किए गए हैं, ताकि नया रायपुर में झुग्गी बस्तियां न बन पाएं.'

उन्हें उम्मीद है कि जब 12 से 15 निर्माणाधीन सरकारी संस्थाएं बनकर तैयार हो जाएंगी, तब आबादी इस ओर आएगी. इस शहर के लिए गरीबों को हटाने के आरोपों के सवाल पर वे बताते हैं, 'प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत हाउसिंग बोर्ड के दस हजार आवास बनाएं जा रहे हैं.'

उनके जवाब से यह जाहिर हो जाता है कि लाखों की आबादी के बीच गरीबों के लिए कितनी जगह रह जाती है. फिर भी सवाल तो यह है कि अमीर लोग भी यहां आएंगे तो कब? कुमार बताते हैं कि चंडीगढ़ को भी तो बसने में समय लगा था. थोड़ा नहीं वहां भी पूरे तीन दशक का समय लगा था. उनका दावा है कि नए रायपुर में अगले साल तक एक लाख आबादी रहने लगेगी.

First published: 27 May 2016, 15:33 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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