Home » इंडिया » Chhattisgarh BJP President Laxman Giluwa wide open gap inside party
 

झारखंड: अध्यक्ष पद पर लक्ष्मण गिलुआ और भाजपा में पैदा हुई दरार

कैच ब्यूरो | Updated on: 31 August 2016, 7:26 IST

इसी 25 अगस्त को जब झारखंड में जन्माष्टमी का त्यौहार जोर-शोर से मनाया रहा था, राजधानी रांची के हृदयस्थल पर हंगामे, लाठीचार्ज का दृश्य था. हरमू के पॉश इलाके में भाजपा मुख्यालय पार्टी नेताओं और एक्टिविस्टों से भरा हुआ था.

खबर फैल गई थी कि भाजपा के नए राज्य अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ आने वाले हैं लेकिन बाद में खबर आई कि वे अगले दिन आएंगे. जैसे ही वहां एकत्रित एक्टिविस्टों ने जाना शुरू किया, पुलिस और स्थानीय लोगों के बीच जबर्दस्त हंगामा और हिंसक माहौल बन गया. लोग उग्र होते गए और पत्थरबाजी शुरू हो गई. प्रदर्शनकारी अपनी जमीन और मकान खाली कराए जाने के नोटिस के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे.

कथित रूप से हरमू क्षेत्र में 80 फीसदी मकान आदिवासियों की जबरन कब्जा की गई जमीन पर बनाए गए हैं. अवैध कब्जे के विरुद्ध आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए गठित विशेष विनियमन पदाधिकारी (एसएआर) कोर्ट से 70 से अधिक लोगों को जमीन वापसी का आदेश दिया गया है. प्रशासन की ओर से 15 घरों में ताला लगा दिया गया है.

देखा जाए तो इस तरह के प्रदर्शन देश में हर कहीं होते रहते हैं लेकिन झारखंड में सरकार की विवादित निवास स्थान नीति (डोमिसाइल पॉलिसी) से हालत और खराब हैं. ठीक उसी समय जब प्रदर्शनकारी सड़कों पर थे, ऑल झारखंड स्टूडेन्ट्स यूनियन के अध्यक्ष सुदेश महतो और पूर्व उप-मुख्यमंत्री पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर रहे थे और डोमिसाइल पॉलिसी का विरोध करने के लिए उन्हें प्रेरित कर रहे थे.

छत्तीसगढ़: जमीन गई जेब में, उद्योग गया तेल में

महतो अपनी पार्टी के रुख को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि हमारा मानना है कि सरकार ने ऐसी नीति अख्तियार की है जिससे आदिवासी और स्थानीय लोग अपनी पहचान और भूमि से वंचित हो जाएंगे. वह कहते हैं कि 25 अगस्त को उनके घर पर जो बैठक हुई है, उसमें पंचायत स्तर पर इस मुद्दे पर आन्दोलन चलाने का प्रस्ताव पारित किया गया है.

ऑल झारखंड स्टूडेन्ट्स यूनियन सत्तारूढ़ गठबंधन का मुख्य घटक है और उसने अप्रत्यक्ष प्रभाव छोड़ने के लिए अपनी ही सरकार के खिलाफ अभियान छेड़ा हुआ है. हालांकि मुख्य विपक्षी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा ने महतो के रुख को खारिज करते हुए इसे सस्ती लोकप्रियता पाने का एक तरीका बताया है.

मरांडी ने ने आरोप लगाया था कि भाजपा उनकी पार्टी और कांग्रेस के विधायकों को तोड़ने का प्रयास कर रही है

झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य कहते हैं कि ऑल झारखंड स्टूडेन्ट्स यूनियन सिर्फ घड़ियाली आंसू बहा रही है. यदि वह स्थानीय लोगों के हितों के प्रति अगर इतनी ही गंभीर है तो उसने कैबिनेट में सरकार की निवास स्थान नीति का समर्थन क्यों किया?

वह कहते हैं कि लम्बी अवधि में यह गठबंधन नहीं चल पाएगा. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि महतो या तो इस मुद्दे को ताक पर रख देंगे अथवा सरकार से नाता तोड़ लेंगे. इस समय ऑल झारखंड स्टूडेन्ट्स यूनियन का रुख राज्य सरकार को परेशान करने वाला ही है.

छत्तीसगढ़: लोकतांत्रिक तानाशाही की तीन घटनाएं

हालांकि मुख्यमंत्री रघुबर दास की चिन्ता के अन्य कई कारण भी हैं. भाजपा ने विधानसभा चुनाव के तुरन्त बाद बाबू लाल मरांडी की झारखंड विकास मोर्चा के छह विधायकों को अपने पाले में कर लिया था. इन लोगों को सरकार में भूमिका देने का आश्वासन दिया गया था. मरांडी ने ने आरोप लगाया था कि सत्तारूढ़ भाजपा उनकी पार्टी और कांग्रेस के विधायकों को तोड़ने का प्रयास कर रही है.

कानूनी चुनौती का सामना

मरांडी इस मामले को अदालत में ले गए हैं. अदालत का फैसला भाजपा के लिए परेशानी का सबब हो सकता है. वरिष्ठ झामुमो नेता कहते हैं कि हम मुकदमे की पैरवी के लिए धन की कमी के कारण बड़े वकीलों को खड़ा नहीं कर पा रहे हैं.

अब वित्तीय संकट खत्म हो गया है. अब हम कानूनी लड़ाई मुस्तैदी से लड़ेंगे. हालांकि, इन नेताजी ने इसका खुलासा नहीं किया कि उनकी पार्टी फंड का इंतजाम कैसे करेगी. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि मरांडी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच नए रिश्ते कायम हो सकते हैं.

सूत्रों के अनुसार नीतीश झारखंड में जदयू का विस्तार कर रहे हैं. उन्होंने मरांडी को आश्वासन दिया है कि भाजपा को चुनौती देने के लिए वे उन्हें हर संभव और सभी तरह का समर्थन देंगे. मरांडी ने प्रतिज्ञा की है कि वे झाविमो के विधायकों को तोड़कर बनाई गई सरकार का कार्यकाल पूरा नहीं होने देंगे.

गिलुआ को भाजपा की राज्य इकाई का अध्यक्ष बनाए जाने से भी भाजपा में अंदरुनी मतभेद हैं. निश्चित रूप से ताला मरांडी को उनके पुत्र द्वारा एक नाबालिग बालिका से विवाह कर लेने के चलते बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था.

मनरेगा मेहनताने की मार सबसे अधिक छत्तीसगढ़ के मजदूर

उन्होंने नव विवाहित वर-वधु को आशीर्वाद दिया था. विपक्ष के भारी दबाव के बाद अदालत में ताला मरांडी के अलावा उनके पुत्र मुन्ना मरांडी और समधी भगन बास्की के खिलाफ बाल विवाह निषेध कानून की धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया गया है. ताला मरांडी भी डोमिसाइल नीति पर सार्वजनिक रूप से अपना विरोध व्यक्त कर चुके हैं

आरएसएस के कट्टर समर्थक और कोल्हान से आदिवासी नेता लक्ष्मण गिलुआ को ताला मरांडी के स्थान पर 24 अगस्त को अध्यक्ष बनाया गया. वह वर्तमान में चाईबासा से सांसद हैं. भाजपा नेतृत्व का दावा है कि उनकी नियुक्ति से कोल्हान क्षेत्र में पार्टी को मजबूती मिलेगी. पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन काफी कमजोर रहा था.

भाजपा के आंतरिक सूत्रों का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा गिलुआ की नियुक्ति के खिलाफ थे

हालांकि कुछ लोगों का इससे अलग मत है. उनका कहना है कि अध्यक्ष जैसे पद पर नियुक्ति सिर्फ एक ही क्षेत्र को ध्यान में रखकर नहीं की जानी चाहिए. ऐसे लोग यह भी कहते हैं कि ताला मरांडी संथाल से हैं जहां भाजपा जेएमएम से कड़ी चुनौती का सामना कर रही है. नेतृत्व के हिसाब से देखा जाए तो उसका उत्तराधिकारी उसी क्षेत्र का होना चाहिए.

रघुबर दास की पहली पसन्द गिलुआ थे. भाजपा के आंतरिक सूत्रों का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा गिलुआ की नियुक्ति के खिलाफ थे. लेकिन दास ने गिलुआ के लिए केन्द्रीय नेतृत्व को मना लिया.

छत्तीसगढ़: 12 साल बाद कांग्रेस फिर उसी दोराहे पर

दिलचस्प बात यह है कि गिलुआ पहले मुंडा के रहम पर निर्भर थे. बाद में उनका बिगाड़ हो गया. कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि विधानसभा चुनावों में मुंडा की पराजय के पीछे गिलुआ जैसे नेता ही जिम्मेदार रहे हैं.

हालांकि वर्तमान में गिलुआ अपनी खुद की छवि को एक नम्र और शरीफ इंसान के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. वे कहते हैं कि मैं एक सामान्य कार्यकर्ता हूं. पार्टी ने मुझे जो जिम्मेदारी सौंपी है, उसे मैं पूरा करूंगा. जब उन्हें यह याद दिलाया गया कि उनके पूर्ववर्ती ने खुलेआम डोमिसाइल नीति का विरोध किया है तो गिलुआ ने कहा कि मैं इस बारे में अपने विचार वरिष्ठ नेताओं से बात करने और यह देखने के बाद ही व्यक्त करूंगा कि किन परिस्थितियों में उन्होंने यह बयान दिया है.

डोमिसाइल नीति पर दरार

यह देखना रुचिकर होगा कि आने वाले दिनों में भाजपा के नए राज्य अध्यक्ष इस संवेदनशील मुद्दे पर कैसा रुख अपनाते हैं. लेकिन दास यह देखकर राहत की सांस तो ले ही सकते हैं कि उनके निष्ठावान लोग अब कैसे पार्टी के अंदरूनी मामलों को संचालित कर रहे हैं. फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि उनकी चिन्ताएं खत्म हो गईं हैं.

आदिवासी नेता के रूप में ताला मरांडी का प्रमोशन गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री के मुद्दे को संतुलित करने के लिए की गई थी. अनुमान था कि वे आदिवासी चुनावी क्षेत्र में अर्जुन मुंडा के प्रभाव को कम करेंगे लेकिन उन्होंने पद संभालने के बाद अर्जुन मुंडा के स्वर बोलने शुरू कर दिए.

मुंडा और दास के बीच विरोध खुला रहस्य है. पूर्व मुख्यमंत्री दशकों तक राज्य में भाजपा के स्टार नेता रहे हैं लेकिन धीरे-धीरे उन्हें अधिकारहीन कर दिया गया. माना जाता है कि उनकी दास से दूरी बढ़ती गई और वे लालकृष्ण आडवाणी के समीप आते गए.

हालांकि मुंडा के सितारे अभी गर्दिश में हैं लेकिन निश्चित रूप से वे रांची के सत्ता के प्रमुख खिलाड़ियों की दौड़ से बाहर नहीं हैं. दास समेत भाजपा नेता इस बात से वाकिफ हैं कि वे दास के साथ सम्बंध बनाने की हर कोशिश करेंगे. डोमिसाइल नीति पर मुंडा का विरोध इसी रोशनी में देखा जा सकता है.

दास, मुंडा के अलावा अपने एक मंत्री सरयू राय से भी राजनीतिक खतरे का सामना कर रहे हैं

दो साल भगवाराज: 24 महीने और 24 विवाद

अधिवास नीति पर मुंडा के सार्वजनिक रूप से विचार व्यक्त करने के पहले ही भाजपा के 23 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को लिखकर शिकायत की कि उनकी खुद की सरकार निवास स्थान नीति पर अपना रुख साफ नहीं कर रही है. इनमें से कुछ आदिवासी नेता थे और वे मुंडा के समर्थकों के रूप में जाने जाते हैं.

दास, मुंडा के अलावा अपने एक मंत्री सरयू राय से भी राजनीतिक खतरे का सामना कर रहे हैं. राय जमशेदपुर पश्चिम का प्रतिनिधित्व करते हैं जो मुख्यमंत्री की सीट जमशेदपुर पूर्व से लगी हुई है. दोनों नेताओं के बीच की प्रतिद्वंद्विता की कहानियां जमशेदपुर में फैली हुई हैं. हालांकि राय सार्वजनिक रूप से दास के खिलाफ कुछ कहने से बचते रहे हैं लेकिन शब्दों से ज्यादा उनके एक्शन काफी कुछ कह जाते हैं.

दास, जहां नीतीश कुमार की आलोचना करने का, चाहे वह बिहार हो या झारखंड, कोई मौका नहीं छोड़ते, वहीं राय बिहार के मुख्यमंत्री के साथ नियमित रूप से मंच का साझा करते हैं. राय की दलील है कि नीतीश के साथ अपने व्यक्तिगत सम्बंध होने के चलते वह ऐसा करते हैं लेकिन दास साफ तौर से इसे उनकी चालाक राजनीति के तौर पर ही देखते हैं.

ऐसे में अब यह सवाल है कि क्या दास इन चुनौतियों से पार पा पाएंगे अथवा इसके शिकार होकर रह जाएंगे?

First published: 31 August 2016, 7:26 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी