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छत्तीसगढ़: लोकतांत्रिक तानाशाही की तीन कहानियां

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 22 February 2016, 12:18 IST

छत्तीसगढ़ में पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, नागरिक अधिकार के लिए काम करने वालों के लिए काम करना लगातार असुरक्षित होता जा रहा है. पिछले एक महीने में छत्तीसगढ़ में तीन-चार घटनाएं इसकी पुष्टि करती है. नई दिल्ली से करीब 1200 किलोमीटर दूर जगदलपुर में नक्सली हिंसा और पुलिस के आतंक के कारण पत्रकार-वकील घरबार छोड़ने के लिए मजबूर हैं.

छत्तीसगढ़ का जगदलपुर जिला माओवाद प्रभावित क्षेत्र है. यहां पिछले कुछ सालों में आदिवासियों के हक में आवाज उठाने या उनसे संबंधित खबरें करने वाले लोग लगातार निशाने पर रहे हैं.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को दोतरफा खतरे से जूझना पड़ता है. एक तरफ उन्हें माओवादियों का खतरा होता है तो दूसरी ओर पुलिस उनके साथ जोर जबर्दस्ती कर रही है.

एक ओर संतोष यादव और सोमारू नाग जैसे पत्रकार और आम आदमी पार्टी की नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता सोनी सोरी को पुलिस माओवादी समर्थक बोलकर जेल में डाल देती है तो दूसरी ओर हिंदी दैनिक देशबन्धु में काम कर चुके पत्रकार साईं रेड्डी की दिसंबर, 2013 में माओवादियों ने गला रेतकर हत्या कर दी थी. उन पर पुलिस के साथ मिलकर काम करने का शक था.

छत्तीसगढ़ के हालात ऐसे हैं कि पत्रकारों और वकीलों को बस्तर छोड़ने का फरमान जारी किया जा रहा है

वर्तमान में यहां अघोषित आपातकाल जैसे हालात हैं. पत्रकारों और वकीलों को बस्तर छोड़ने का फरमान जारी किया जा रहा है. रेडक्रॉस जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था में काम कर चुकी पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम ने सुरक्षा के चलते बस्तर छोड़ दिया. इसके अलावा बस्तर के क्षेत्र में काम कर रहीं दो महिला वकीलों का आरोप है कि पुलिस उन्हें बस्तर छोड़ने के लिए मजूबर कर रही हैं.

यहां विपक्षी दल के नेता भी सुरक्षित नहीं है. जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी पर शनिवार को दिनदहाड़े हमला हो गया. दुर्भाग्यपूर्ण यह हैं कि इन तीनों घटनाओं में पीड़ित महिलाएं हैं. बावजूद इसके छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकार इन घटनाओं पर मौन साधे हुए हैं और पुलिस का रवैया टालमटोल का रहा है.

1.आम आदमी पार्टी की नेता सोनी सोरी पर हमला

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छत्तीसगढ़ के बस्तर में प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और आम आदमी पार्टी की नेता सोनी सोरी पर हमला हुआ है. हमलावरों ने उनके चेहरे पर ग्रीस जैसा कोई केमिकल पोत दिया है.

सोनी सोरी ने अपने सहयोगी का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें पहले से ही आशंका थी कि उन पर इस तरह का हमला हो सकता है.उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें आम आदमी पार्टी के सहयोगियों से नहीं मिलने दिया जा रहा है. इसके अलावा उनके रिश्तेदारों को भी उनके कमरे में आने की इजाजत नहीं है.

पढ़ें: पुलिस और माओवादियों के बीच पिस रही बस्तर की पत्रकारिता

इस मामले में पुलिस अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं कर पाई है. आम आदमी पार्टी के प्रदेश संयोजक संकेत ठाकुर ने आरोप लगाया है कि बस्तर में मानवाधिकार उलंघन के मामलों को उठाने के कारण सोरी पर हमला किया गया है.

उन्होंने बताया कि अज्ञात लोगों द्वारा कुछ दिनों पहले सोरी को जान से मारने की धमकी दी गई थी. इसकी शिकायत पुलिस से की गई थी, लेकिन पुलिस ने सोरी को सुरक्षा प्रदान नहीं की.

बस्तर में मानवाधिकार उलंघन के मामलों को उठाने के कारण सोनी सोरी पर हमला किया गया है: आप

लोकसभा चुनाव में सोनी सोरी आम आदमी पार्टी के टिकट से बस्तर लोकसभा क्षेत्र में चुनाव भी लड़ी थीं. हालांकि वह चुनाव हार गई थीं.

2.बस्तर छोड़ने के लिए मजबूर मालिनी

मालिनी सुब्रमण्यम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 300 किमी दूर माओवाद प्रभावित इलाके बस्तर में रहती थीं. उन्होंने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के आश्वासन के बावजूद उनके परिवार को दबाव में और बेहद जल्दबाजी में मजबूरन शहर छोड़ना पड़ा.

पढ़ें: तेजी से बढ़ रहा है पत्रकारों पर हमला

मालिनी ने इस दौरान न्यूज वेबसाइट स्क्रॉल के लिए कई ऐसी स्टोरियां की हैं जिसमें उन्होंने पुलिस पर बस्तर में कई फर्जी मुठभेड़ करने का आरोप लगाया हैं.

मुख्यमंत्री रमन सिंह के आश्वासन के बावजूद मुझे जगदलपुर छोड़ना पड़ा: मालिनी

उन्होंने बस्तर पुलिस पर आरोप लगाया है कि पिछले पांच हफ्ते से पुलिस लगातार उन्हें व उनके परिवार को धमकियां दे रही थी. मालिनी ने कहा जब धमकियों से बात नहीं बनी तो पुलिस ने उन लोगों को निशाना बनाया जो मेरे लिए काम करते हैं या फिर उन्हें जिन्होंने रहने के लिए मुझे अपना घर किराये पर दिया है.

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मालिनी के घर पर हुए हमले में क्षतिग्रस्त कार

उनके घर पर इसी महीने सात तारीख को सामाजिक एकता मंच से जुड़े कुछ लोगों ने हमला कर दिया था.  उनके घर पर हमला करने वाले लोगों ने उन्हें नक्सल समर्थक करार दिया और उनसे बस्तर से चले जाने को कहा. पुलिस इस मामले की जांच कर रही है. हालांकि, इस मामले में अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है.

3.वकीलों ने छोड़ा घर

जगदलपुर लीगल एड ग्रुप में काम करने वाली वकील शालिनी गेरा, इशा खंडेलवाल बस्तर छोड़ रही हैं. इन दोनों महिला वकीलों का आरोप है कि जो लोग बस्तर में उनकी मदद कर रहे हैं या किराए पर घर दे रहे हैं उन्हें पुलिस प्रताड़ित कर रही है.

पढ़ें: पत्रकारों और मानवाधिकार कर्मियों के लिए छत्तीसगढ़ खतरनाक जगह है

दोनों वकीलों ने आरोप लगाया है कि पुलिस वाले उनके मकान मालिक को बुलाकर लगातार घर खाली करवाने के लिए दबाव बना रहे हैं. उन्होंने बताया कि पुलिस लगातार इनके घर पर पहरा दे रही है.

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पिछले साल जगदलपुर बार एसोसिएशन ने जगदलपुर लीगल एड ग्रुप की महिला वकीलों को भी मुकदमे की पैरवी करने से रोक दिया था. एसोसिएशन का कहना था कि ये वकील स्थानीय बार एसोसिएशन की सदस्य नहीं हैं.

शालिनी गेरा व ईशा खंडेलवाल का कहना है कि वे काफी समय से बस्तर में रहकर कमजोर व गरीब वर्ग के लोगों को कानूनी सहायता प्रदान कर रहे हैं. उनका दावा है कि उन पर नक्सल समर्थक होने का आरोप लगाया जा रहा है जबकि वे नक्सल पीड़ित मामलों में भी सहायता मुहैया करवाते हैं.

महिला वकीलों का आरोप है कि जो लोग बस्तर में किराए पर घर दे रहे हैं उन्हें पुलिस प्रताड़ित कर रही है

स्थानीय बार एसोसिएशन के द्वारा उनके बहिष्कार के सवाल पर उनका कहना है कि अधिवक्ता अधिनियम की धारा 30 के तहत किसी भी वकील को किसी कोर्ट में पैरवी करने का अधिकार है. इनका कहना है कि भारतीय संविधान के अनुसार वे कहीं भी कार्य कर सकते हैं लेकिन उन्हें इससे वंचित किया जा रहा है.

खंडेलवाल और शालिनी गेरा ने आरोप लगाया है कि उन्हें उनका काम करने से रोकने से रोकने के लिए कई बार उनका शोषण किया गया है. उन्होंने राज्य सरकार से रहने के लिए आवास उपलब्ध करवाने की भी गुहार लगाई है.

छत्तीसगढ़ में अक्सर पुलिस भी पत्रकारों से बेदर्दी से पेश आती है. विशेष जनसुरक्षा कानून की आड़ में पुलिस वाले पत्रकारों और आम लोगों को माओवाद समर्थक बताकर जेल में डाल देते हैं.

पिछले साल हिंदी दैनिक अखबार 'नवभारत' में लिखने वाले संतोष यादव और राजस्थान पत्रिका के स्ट्रिंगर रहे सोमारू नाग को माओवादी समर्थक होने के आरोप में छत्तीसगढ़ पुलिस ने जेल में डाल दिया. उनकी रिहाई अब तक नहीं हो पाई है.

पुलिस ने दोनों पत्रकारों के ऊपर हत्या, आपराधिक साजिश, हिंसा भड़काने के अलावा प्रतिबंधित माओवादी संगठन का हिस्सा होने का आरोप लगाया. इनपर छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम और यूएपीए की धाराओं के तहत भी आरोप है.

इन दोनों की रिहाई को लेकर छत्तीसगढ़ में बड़ा आंदोलन भी चला लेकिन दुर्भाग्य यह कि सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है.

First published: 22 February 2016, 12:18 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

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