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छत्तीसगढ़ का सूखा, राहत का धोखा और किसान भूखा

शिरीष खरे | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • देश के ज्यादातर हिस्सों की तरह छत्तीसगढ़ भी सूखे की चपेट में है. \r\nराज्य ने केंद्र से सूखे से उबरने के लिए मांगे 6,000 करोड़ रुपए. केंद्र \r\nने 1,200 करोड़ का पैकेज दिया.
  • 33 फीसदी या इससे ज्यादा फसल नुकसान \r\nहोने पर ही किसानों को राहत का पात्र माना जा रहा है. इसके कारण बड़ी \r\nसंख्या में किसान राहत के दायरे से बाहर हो चुके हैं.
  • सूखा राहत में\r\n जमकर हो रही है बंदरबांट. मुआवजे की राशि किसानों के हाथों तक नहीं \r\nपहुंचने से टूटा धैर्य. भूख और पलायन ने कई इलाकों में दी दस्तक.
  • प्रदेश में लगभग 36 लाख हेक्टेयर में धान की खेती होती है, लेकिन इसमें महज 28 फीसदी क्षेत्र ही सिंचित क्षेत्र है.
अस्सी साल के जगदीश सोनी ने अपने तीन बेटों के साथ 15 एकड़ खेत में धान बोई थी, मगर सूखे से पूरी फसल चौपट हो गई. वे बताते हैं कि एक दाना घर नहीं आया. परिवार पर एक लाख का कर्ज चढ़ा है और पटाने के लिए फूटी कौड़ी नहीं है. घर में खाने तक के लाले पड़े हैं.

जब उन्हें पता चला कि सरकार की राहत सूची में उनका नाम नहीं है तो फूट पड़े, 'पटवारी न खेत गया, न मिलने आया, उसने गलत लोगों को मुआवजा बांटा, मरना तो है ही, वह सामने आया तो गोली मार दूंगा!' 

प्रदेश की राजधानी रायपुर से बमुश्किल 25 किमी दूर अछोटी गांव सैकड़ों किसानों का यही हाल है. यहां 200 किसानों में सरकार ने महज 99 को ही सूखा राहत का पात्र माना है. सरपंच हेम साहू बताते हैं कि गांव के पास से तादुंल नहर निकलती है, लेकिन इस साल समय पर पानी नहीं छोड़ने से अछोटी सहित नहर किनारे के कई गांवों (नारधा, चेटवा, मुरंमुंदा, ओटेबंध, गोड़ी, मलपुरी आदि) के खेतों की फसल 75 फीसदी से ज्यादा सूख गई. लेकिन दुर्ग जिले की कलेक्टर आर संगीता का मानना है कि कुछ लोगों के नाम शायद छूट गए हो, लेकिन सर्वे की प्रक्रिया एकदम सही है.

रायपुर जिले के 200 किसानों में प्रशासन ने केवल 99 को ही सूखा राहत का पात्र माना है

सूखे से खराब हुई फसल के बाद मुआवजा निर्धारण और वितरण के खेल ने प्रदेश के किसानों की कमर तोड़ दी है. प्रभावितों के लिए आवंटित बजट 'ऊंट के मुंह में जीरे' के समान है, लेकिन इसमें भी धांधलियों का आलम यह है कि चौतरफा शिकातयों का अंबार लग गया है.

25 एकड़ तक के कई छोटे किसानों की 20 से 30 फीसदी से ज्यादा फसल खराब होने पर भी उनका नाम राहत सूची में नहीं हैं. जिनके नाम राहत सूची में हैं वह भी देरी के चलते अधीर हो रहे हैं. नतीजतन कई इलाकों में भूख और पलायन धीरे-धीरे पैर पसार रहा है.

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हालत यह है कि किसानों के पास खेतों में बोने के लिए तक बीज नहीं बचे. इसे देखते हुए अगले साल बुआई की उम्मीद पर भी पानी फिरता दिख रहा है. राजनांदगांव, महासमुंद, जांजगीर-चांपा और दुर्ग जिले के गांवों में पहुंचकर सरकारी दावों की पोल खुल जाती है. यहां किसानों के चेहरों पर चिंता, दुख, असंतोष और आक्रोश दिखाई देता है.

अन्नदाता के राहत कोष में फिर हुई बंदरबांट

राज्य ने केंद्र सरकार से सूखा राहत के लिए छह हजार करोड़ रुपए मांगे थे. केंद्र ने 12 सौ करोड़ रुपए का राहत पैकेज आंवटित किया. राज्य सरकार ने करीब 800 करोड़ रुपए की राशि सूखा पीड़ित किसानों को मुआवजा बांटने के लिए रखी.

राजस्व और आपदा प्रबंधन विभाग की माने तो प्रदेश में मुआवजा वितरण का काम पूरा हो चुका है और इससे ज्यादा राशि बांटने की जरुरत नहीं है. विभाग ने सूखा पीड़ितों में सिर्फ 380 करोड़ रुपए की राशि बांटी है. विभाग के सचिव केआर पिस्दा के मुताबिक किसी जिले से सूखा राहत के लिए और अधिक राशि की मांग नहीं आने के बाद यह निर्णय लिया गया है.

विशेषज्ञों की राय में सूखा पीड़ितों के लिए सरकार की यह राशि वैसे ही बहुत कम है, उसमें भी इतनी बंदरबांट हुई है कि प्रदेश के लाखों पात्र किसानों तक राहत पहुंची ही नहीं है. कई इलाकों में किसानों ने लागत न निकलने के डर से अपनी फसलों को मवेशियों के हवाले कर दिया है. अब ऐसे किसानों को भी शासन सूखा राहत सूची के योग्य नहीं मान रही.

कई जिलों में किसानों द्वारा राहत राशि में गड़बड़ियों को लेकर विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं. किसान नेता राजकुमार गुप्ता बताते हैं, 'सूखा राहत के लिए केंद्र से मिले 12 सौ करोड़ में किसानों को महज 380 करोड़ बांटने का मतलब यह है कि बाकी का 820 करोड़ रुपए सरकार अपनी झोली में डालना चाहती है. सरकार ने यह कमाल मुआवजा वितरण में कई तरह की शर्ते जोड़कर ज्यादातर किसानों को प्रभावित सूची से बाहर करके दिखाया.”

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एक तथ्य यह भी है कि प्रदेश के करीब दस लाख किसानों के धान नहीं बेचने के बावजूद यदि सरकार नाम मात्र के किसानों को ही सूखा प्रभावित बता रही है तो यह अपने आप में विरोधाभास है.

इस विकट परिस्थिति में प्रदेश के किसानों के सामने अब बड़ा सवाल है कि क्या खाएं और कमाएं? महासमुंद जिले के बागबाहरा, पिथौरा, बसना, झलप, सरायपाली, भंवरपुर क्षेत्र के सैकड़ों परिवार पलायन कर चुके हैं. जांजगीर-चांपा में बलौदा क्षेत्र के मनरेगा मजदूरों का तीन महीने से भुगतान नहीं हुआ है. यहां भी पलायन ने दस्तक दे दी है. लोगों ने अभी से कयास लगाना शुरू कर दिए हैं कि होली के बाद इस क्षेत्र के 30 से 40 फीसदी घरों में ताले लटके मिलेंगे.

किसानों की फसल खराब होने के कारण उनकी रही-सही सारी जमा भी पूंजी खर्च हो चुकी है. दुर्ग में अछोटी गांव के रिखीराम साहू बताते हैं, 'गांव का हर किसान भारी कर्ज में डूबा है. कई किसानों के पास तो अगले साल बोने के लिए बीज भी नहीं हैं. ऐसे में अगले साल उन्हें अपने खेत खाली छोडऩे पड़ेंगे.'

किसानों की फसल खराब होने के कारण उनकी रही-सही सारी जमा भी पूंजी खर्च हो चुकी है

जाहिर है इस साल सूखे ने तो किसानों की जिंदगी में गहरा जख्म दिया ही है, साथ ही सरकारी राहत से भी उन्हें वंचित कर दिया गया है.

हमने हर पात्र किसान को पर्याप्त मुआवजा दिया: छत्तीसगढ़ सरकार

प्रदेश में राजस्व व आपदा प्रबंधन के सचिव केआर पिस्दा के मुताबिक शासन ने हर पात्र किसान को निर्धारित नीति के अनुसार पर्याप्त मुआवजा दिया है. उनके मुताबिक कुछ जिलों से शिकायतें आ रही हैं. लेकिन इससे निपटने के लिए जरूरी निर्देश जिला कलेक्टरों को जारी कर दिए गए हैं.

सरकार की मुआवजा नीति में ही झोल है. अब फसल कट गई है लिहाजा खाली खेत को देखकर नुकसान का अंदाजा लगाया नहीं जा सकता. ऐसे में सरकारी अधिकारी वर्षा की स्थिति और धान की बिक्री के आधार पर नुकसान का अनुमान लगा रहे हैं.

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पलायन को लेकर पिस्दा का कहना है कि हमारे पास किसी भी जिले से पलायन की सूचना नहीं मिली है. मामूली स्तर का पलायन तो हर साल होता है. मगर इस साल मनरेगा के तहत 13 लाख मजदूरों ने शासन से काम मांगा हैं. इसके अलावा सूखा राहत योजनाओं के तहत कई काम किए जाने हैं. इनमें पेयजल और सिंचाई योजनाओं से जुड़े कामों को प्राथमिकता दी जाएगी.

कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का कहना है कि सरकार ने प्रशासनिक अधिकारियों को यह जिम्मेदारी दी थी कि वह किसानों को राहत राशि बांटे, शिकायतें तो  मिलती ही हैं, फिर भी मुझे लगता है किसानों में इसे लेकर ज्यादा गुस्सा नहीं है.

कृषि विशेषज्ञ आम आदमी पार्टी के प्रदेश संयोजक संकेत ठाकुर कहते हैं, 'सरकार सूखे से निपटने के नाम पर मुआवजा बांटने का दिखावा करके अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रही है. राहत के लिए जारी राशि बहुत ही कम है और उसमें भी जमकर अनियमितताएं हो रही है.' 

ठाकुर के मुताबिक किसानों को इस समय विशेष संरक्षण देने की जरुरत है क्योंकि यह तबका गरीब है, मजबूरी में पलायन कर रहा है, स्थितियां ज्यादा बिगड़ीं तो यह आत्महत्या भी करने लगेगा. इन्हें महज मनरेगा के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है.

First published: 22 March 2016, 11:17 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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