Home » इंडिया » Chhattisgarh: Durg farmers story
 

44 साल पहले सूखा राहत के लिए दी जमीन, अब एड़ी घिस रहे हैं

हेमंत कपूर | Updated on: 4 August 2016, 8:38 IST
(प्रतीकात्मक फोटो)

सूखे के दौर में जिन किसानों ने पानी सहेजने के मकसद से बांध बनाने के लिए अपनी बेशकीमती जमीन दी, उन्हें मुआवजे के लिए 44 साल तक संघर्ष करना पड़ा. इस पर भी विडंबना यह कि किसानों ने जब न्यायालय का दरवाजा खटखटाया तो अफसरों ने मुआवजा तो मंजूर कर दिया, लेकिन जमीन की दर से काफी कम. पीड़ितों का आरोप है कि अधिकारियों ने उनकी मांग से चार गुना कम मुआवजा राशि निर्धारित की है. मामला छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के किसानों का है.

अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में वर्ष 1972 में भीषण अकाल की स्थिति बनी थी. इस दौरान लोगों की मदद के इरादे से शासन की ओर से गांव-गांव में राहत कार्य के तहत बांध बनाए गए. इस दौर में लिटिया के डेढ़ दर्जन किसानों ने 70 एकड़ जमीन शासन को दी. इस जमीन पर पानी सहेजने के लिए बांध और खेतों की सिंचाई के लिए नालियां बनाई गईं. तब अधिकारियों ने किसानों से जमीन तो ले ली, लेकिन अधिग्रहण के रूप में यह जमीन सरकारी रिकार्ड में दर्ज नहीं कराई.

अफसर आए हरकत में

दस्तावेज में खामियों के खुलासे के बाद पीड़ित किसान एकजुट हुए और अगस्त, 2014 में मुआवजे की मांग को लेकर न्यायालय जाने की पहल की. इसके बाद अधिकारी हरकत में आए. उन्होंने नए सिरे से कागजी कार्रवाई शुरू की. करीब साल भर बाद वर्ष 2015 में मुआवजा मंजूर किया गया, लेकिन अधिकारियों ने नियमों को नजरअंदाज करते हुए काफी कम मुआवजा तय किया.

नाली और डुबान की जमीन वाले किसान अब भी भटक रहे हैं. तीनों बांधों में भराव की स्थिति में सैकड़ों एकड़ जमीन डूब में आ जाती है. इससे किसान जमीन पर फसल नहीं ले पाते. इसके अलावा खेतों तक पानी पहुंचाने और नालियों के निर्माण के लिए भी जमीन अधिग्रहित की गई, लेकिन इन किसानों को अब तक मुआवजा नहीं मिल पाया है.

अरसी-डोडकी बांध का मामला अब भी अधर में

लिटिया के साथ वर्ष 1972 में ही करीब 3 से 4 किलोमीटर के दायरे में तुमाखुर्द क्रमांक-1 अरसी और तुमाखुर्द क्रमांक-2 डोडकी ग्राम में भी किसानों से जमीन लेकर बांध बनाया गया. यहां किसानों की पहल पर भूमि का मूल्यांकन तो किया गया, लेकिन मुआवजे की राशि का भुगतान अब तक नहीं किया गया है.

केंद्रीय भूमि अधिग्रह कानून, 2013 के मुताबिक किसी भी जमीन के अधिग्रहण में मुआवजा प्रचलित बाजार दर से किसी भी स्थिति में 4 गुना से कम नहीं होना चाहिए. इसी तरह, छत्तीसगढ़ पुनर्वास नीति, 2008 के मुताबिक जमीन का अधिग्रहण भूमि की प्रकृति के अनुरूप परती भूमि का न्यूनतम छह लाख, एक फसली भूमि का आठ लाख और द्विफसली भूमि का 10 लाख रुपए प्रति एकड़ की दर से मुआवजा दिया जाना चाहिए.

किसानों को चौतरफा नुकसान

पिछले 44 साल तक किसान फसल नहीं ले पाए. शासन की ओर से इसके लिए कोई भी क्षतिपूर्ति भी नहीं दिया गया. अधिग्रहित जमीन का मुआवजा नहीं मिल पाने के कारण किसान दूसरी जगह जमीन नहीं खरीद पाए. इससे कई परिवार भूमिहीन हो गए और अब दूसरे की भूमि पर मजदूरी करने की नौबत आ गई है.

इस दौरान कई किसानों की मौत हो चुकी है या फिर जमीन का मालिकाना हक दूसरी अथवा तीसरी पीढ़ी के लोगों के पास है. दस्तावेजों में नाम में अंतर के कारण आगे मुआवजा मिलने की संभावना भी नहीं के बराबर है.

इस मामले में संयोजक प्रगतिशील किसान संगठन के नेता बताते हैं, "राजकुमार गुप्ता ने किसानों की ओर से केंद्रीय भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग की थी. अन्यथा की स्थिति में छत्तीसगढ़ पुनर्वास नीति के तहत मुआवजा दिया जाना चाहिए था, लेकिन इससे काफी कम दर पर प्रति एकड़ मुआवजा देकर निपटा दिया गया."

दुर्ग के एडीएम केके अग्रवाल के मुताबिक, "मुआवजा पर्याप्त नहीं मिलने की शिकायत लेकर किसान उनके पास आए थे. उन्हें इस संबंध में सबूत लेकर आने के लिए कहा गया है. दस्तावेज मिलने पर जरूरी पहल की जा सकती है."

First published: 4 August 2016, 8:38 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी