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माओवाद: एक और मुठभेड़ को लेकर सुरक्षा बलों पर गहराया शक

राजकुमार सोनी | Updated on: 19 August 2016, 8:14 IST

छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित बस्तर इलाके में आदिवासियों को मिलते-जुलते नामों का खामियाजा तो भुगतना पड़ ही रहा है, अब संविधान और कानून पर भरोसा भी उनके जीवन की गारंटी नहीं है.

सुकमा जिले के गोमपाड़ इलाके में रहने वाली मड़कम हिड़मे की मौत को लेकर संशय के बादल अभी भी बने हुए हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक मड़कम की हत्या सुरक्षा बलों ने एक अन्य इसी नाम की युवती के चक्कर में कर दी थी. सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लगा रखी थी जिसमें मड़कम हिड़मे नाम की एक अन्य युवती का नाम शामिल था.

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गंगालूर इलाके के पालनार इलाके में ग्रामीण किसान सीतू हेमला भी कथित तौर पर सुरक्षा बलों का सिर्फ इसीलिए निशाना बना क्योंकि उस इलाके में सीतू हेमला नाम के एक दीगर माओवादी कमांडर की तूती बोलती थीं.

स्वाधीनता दिवस के ठीक दूसरे दिन छत्तीसगढ़ पुलिस ने एक बार फिर से अपनी पीठ थपथपाई है. सुरक्षाबलों ने अर्जुन नाम के युवक को मार गिराया है. पुलिस का दावा है कि अर्जुन माओवादी कमांडर था.

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लेकिन पुलिस की कहानी पर कई सवाल उठने लगे हैं. अर्जुन के बारे में लीगल एड की अधिवक्ता ईशा खंडेलवाल का कहना है कि वह दसवीं कक्षा का विद्यार्थी था और साल भर पहले पुलिस ने उसे माओवादी होने के झूठे आरोप में गिरफ्तार किया था. अर्जुन को अदालत ने जमानत दे दी थी और वह नियमित रुप से कोर्ट की हर पेशी में उपस्थित होता था.

मुठभेड़ में मारने का दावा

16 अगस्त को आईजी शिवराम कल्लूरी और पुलिस अधीक्षक आरएन दास की ओर से मीडिया को जारी बयान में बताया गया कि बस्तर के दरभा इलाके के गांव तुलसी डोंगरी, कोलेंग, मुड़ागढ़ व कांदानार इलाके में पुलिस की सर्चिंग चल रही थी तभी एक गांव चांदामेटा के जंगल में माओवादी और पुलिस जवान आमने-सामने आ गए.

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दोनों पक्षों के बीच एक घंटे तक फायरिंग हुई. जब गोलीबारी खत्म हुई तो पुलिस को एक वर्दीधारी माओवादी का शव मिला जिसकी शिनाख्त जनमिलिशिया कमांडर एवं माचकोट के हार्डकोर माओवादी अर्जुन के रुप में की गई है. पुलिस अधिकारियों ने कहा कि अर्जुन तीन लाख का ईनामी माओवादी था और वर्ष 2014 में संजीवनी वाहन विस्फोट की घटना में भी शामिल था. इस घटना में सीआरपीएफ के दो जवान शहीद हुए थे. उसने इलाके के दर्जन भर ग्रामीणों की हत्या भी की थी.

पुलिस ने पकड़ा था 17 साल के अर्जुन को

इधर लीगल एड की अधिवक्ता ईशा खंडेलवाल का कहना है कि चांदामेटा गांव के जिस अर्जुन को पुलिस ने मौत के घाट उतार दिया है उसे पहली बार पुलिस ने 15 अगस्त 2015 को एक बाजार से गिरफ्तार किया था. गिरफ्तारी के दौरान अर्जुन की उम्र महज 17 साल की थी, लेकिन पुलिस ने उसे 30 साल का व्यस्क बताकर जेल में ठूंस दिया था.

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अर्जुन की स्कूल की मार्कशीट और अन्य दस्तावेजों के आधार पर जब यह बात साबित हो गई कि अर्जुन नाबालिग है तो अदालत ने पूरा मामला किशोर न्यायालय के सुर्पुद कर दिया था. अर्जुन पर वाहन विस्फोट में शामिल होने का आरोप लगा था, लेकिन पुलिस की ओर से जो गवाह पेश किए गए थे वे झूठे निकले. अर्जुन जमानत पर रिहा कर दिया गया था और किशोर न्यायालय की ओर से मुकर्रर की गई हर पेशी में उपस्थित रहता था.

अदालत से छूट भी जाओगे तो जान से जाओगे?

अर्जुन की मौत को पूरी तरह से फर्जी करार देते हुए सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं, 'बस्तर से लोकतंत्र लापता है. अर्जुन को मुठभेड़ में मौत के घाट उतारकर पुलिस यह बताना चाहती है कि अगर अदालत से छूट भी जाओगे तो जान से हाथ धो बैठोगे.

पुलिस द्वारा फंसाए जाने के बाद अर्जुन की पढ़ाई छूट गई थी मगर वह अपने माता-पिता का बोझ हल्का करने के लिए खेती-बाड़ी में उनका सहयोग करता था. अर्जुन के परिजनों का कहना है कि 16 अगस्त को वह अपने घर की बकरियों को जंगल लेकर गया था जब पुलिस ने उसे मार गिराया. यदि अर्जुन माओवादी होता तो क्या कोर्ट की हर पेशी में मौजूद रहता? अर्जुन की मौत से यह साबित होता है कि बस्तर में कानून का नहीं हिटलर का शासन संचालित है.

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लीगल एड की सदस्य ईशा खंडेलवाल कहती हैं, 'फिलहाल हमें इतनी सूचना मिली है कि अर्जुन के माता-पिता को भी पुलिस ने अपनी गिरफ्त में ले रखा है. वे कब तक गिरफ्त में रहेंगे यह साफ नहीं है. यदि अर्जुन के अभिभावक कानूनी लड़ाई लड़ना चाहेंगे तो हम उनकी मदद जरूर करेंगे.'

First published: 19 August 2016, 8:14 IST
 
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