Home » इंडिया » Catch Hindi: chhattisgarh government is using forest law against foresters
 

छत्तीसगढ़ः सरकार अब वनाधिकार की आड़ में लूट रही जमीन

शिरीष खरे | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • छत्तीसगढ़ सरकार ने वनवासियों को अधिकार दिलाने के लिए बनाया था साल 2014 में नया कानून. अब उसी कानून के सहारे छीनी जा रही है वनवासियों की ज़मीन.
  • आदिवासी सरकार पर ज़मीनों के पट्टे देने में गड़बड़ी करने का आरोप लगा रहा हैं. आंकड़ों पर भी खरे नहीं उतरते सरकारी दावे.

'वन को राजस्व ग्राम बनाते समय विकास का झांसा देकर जिंदगी बदल देने की बात की थी, लेकिन उन्होंने हमें धोखा दिया. बड़े बोल बोलकर हमारी जमीन लूटने का खेल खेला. हमारी जायदाद को वन से राजस्व विभाग में कब बदल दी गई, पता ही नहीं चला', यह दर्द रायपुर से करीब 140 किमी दूर जिला धमतरी के जनजाति बहुल जुनवानी के ग्रामीणों का है.

ग्रामीण कहते हैं कि सूचना के अधिकार के तहत अर्जी लगाने पर हमें पता चला कि अफसरों ने दूसरे गांव में ग्रामसभा रखी और हमारे गांव के दो लोगों से दस्तखत करा लिए. थोड़ी-थोड़ी जमीन के पट्टे दिए और जता दिया कि बस इतनी ही जमीन तुम्हारी है. उसमें भी किसी का घर छूटा, किसी का खेत तो किसी की बाड़ा. मगर असल खेल तो चारागाह, वनोपज, निस्तार, श्मशान और मैदान की जमीन पर हुआ. सरकार यह जमीन छीनना चाहती है. लोग इसके लिए आठ महीने से कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं.

छत्तीसगढ़ सरकार वनवासियों के साथ ऐतिहासिक अत्याचार को मिटाने के लिए बनाए गए कानून से ही छीन रही है उनकी जमीन

जनवरी 2014 में सरकार ने 425 गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोडऩे के लिए वन को राजस्व में बदला. मगर वनवासियों के साथ ऐतिहासिक अत्याचार मिटाने के लिए जो वनाधिकार कानून लाया गया, उसी को हथियार बनाकर अब उनकी जमीन हथियाने की तैयारी की जा रही है.

जुनवानी में 265 मतदाता हैं. स्थानीय कार्यकर्ता बेनीपुरी कहते हैं, 'दशकों पुराने रिकॉर्ड के आधार पर व्यक्तिगत पट्टों के लिए महज 73 हेक्टेयर जमीन बांटी गई. वहीं, कानून में प्रावधान होने के बावजूद सरकार सामूहिक पट्टे नहीं दे रही है.'

बढ़ेंः तो भाजपा का जनतंत्र का दावा तार-तार हो जाएगा

सरकार के इस रुख पर ग्रामीण प्रीतम कुंजाम कहते हैं, 'एक हजार एकड़ जमीन गांव की है, जिसे हम विभागीय या निजी हाथों को नहीं सौंपेंगे. पट्टे में महिला हकदार नहीं हैं. पट्टों में महिला और आश्रितों के नाम दर्ज नहीं हैं. वहीं, पट्टे में जमीन की पहचान और नक्शे नहीं दिए गए हैं.'

वनाधिकार की शोधार्थी मधु सरीन के मुताबिक, कानून में वयस्क व्यक्ति को ढाई एकड़ जमीन देने का प्रावधान है, लेकिन यहां पिता की जायदाद बांटकर बहुत कम जमीन के पट्टे दिए गए हैं.

वन और राजस्व विभाग के बीच तालमेल की कमी


वनाधिकार के विशेषज्ञ वीरेंद्र अजनबी के मुताबिक, वन और राजस्व विभाग के बीच समन्वय न होना अधिकार में बाधा डाल रहा है.

वहीं आदिम जाति और अनुसूचित जाति के संचालक राजेश सुकुमार टोप्पो का कहना है, व्यक्तिगत पट्टो के मामले में छत्तीसगढ़ आगे हैं, लेकिन अब सामूहिक पट्टे बांटने को वरीयता देंगे. दो हफ्ते पहले मुख्य सचिव ने सभी कलेक्टरों को सहयोग करने के निर्देश भी दिए हैं. ऐसी जमीन को रिकॉर्ड में भी लाया जाएगा.

वनाधिकार पट्टा देने के मामले में भले ही छत्तीसगढ़ सरकार खुद को देश भर में अव्वल बता रही हो, लेकिन हकीकत इससे ठीक उलट है. यहां उद्योग लॉबी के दबाव में सरकार ने 60 प्रतिशत वनवासी परिवारों के दावे खारिज किए हैं, जबकि त्रिपुरा और केरल जैसे छोटे राज्यों में 34 प्रतिशत दावे ही खारिज हुए हैं. वनाधिकार कानून के तहत बीते सात सालों का लेखा-जोखा देंखे तो छत्तीसगढ़ में सरकार ने कुल 5 लाख 12 हजार परिवारों के दावे खारिज किए हैं.

छत्तीसगढ़ सरकार के पास वनाधिकार के सामूहिक दावों का रिकॉर्ड नहीं है

यह हालत तब है जब प्रदेश के 44 प्रतिशत भू-भाग पर जंगल है और 60 प्रतिशत इलाका संविधान की पांचवी अनुसूची में आता है जहां जनजातियों के हितों में संवैधानिक प्रावधान लागू हैं. दूसरी तरफ, सरकार ने प्रति व्यक्ति औसतन महज दो एकड़ वनभूमि दी है जो व्यक्तिगत रूप से काफी कम है.

इसके अलावा बिहार के साथ छत्तीसगढ़ ऐसा राज्य है जो वनाधिकार के सामूहिक दावों का रिकार्ड नहीं दिखा पाया है. गौरतलब है कि गुजरात में प्रति ग्राम औसतन 280, कर्नाटक में 260, महाराष्ट्र में 247 और तेलंगाना में 676 एकड़ वनभूमि बांटी गई है. इसे देखते हुए वनाधिकार पट्टा देने के मामले में छत्तीसगढ़ फिसड्डी नजर आता है. यह खुलासा केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय से जारी आंकड़ों से भी होता है.

वन अधिकारों के आड़े आया खनन


2005-10 के बीच 75 हजार हेक्टेयर वनभूमि औद्योगिकीकरण के लिए डाइवर्ट की गई. इसमें 97 प्रतिशत सिर्फ खनन कार्यों के लिए है. वहीं, फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में 1997 से 2007 के बीच 82 हजार 300 हेक्टेयर वन नष्ट हुआ है. जाहिर है खनन के नाम पर न वन बच रहे हैं और न वनवासियों के अधिकार.

आदिवासी कार्यकर्ता इंदु नेताम के मुताबिक सरकार इस मुद्दे पर वोट बैंक की राजनीति तो कर रही है लेकिन जमीन पर उन्हें उनका हक नहीं दिला पाती.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में 3700 से ज्यादा अवैध खदानें हैं

आंकड़े बताते हैं कि 2009 के बाद तीन साल तक पट्टे देने की प्रक्रिया लगभग रोक दी गई. मगर 2013 के चुनाव को देखते हुए महज एक साल में करीब एक लाख पट्टे देने का दावा किया गया. मगर अब यह प्रक्रिया फिर धीमी पड़ गई है.

वहीं प्रदेश के वनमंत्री महेश गागड़ा का कहना है, 'वनाधिकार मामले में गैर आदिवासियों के मुकाबले आदिवासियों को आसानी से पट्टे मिले हैं. वैसे भी इन्हें शासन की बजाय ग्राम सभा स्तर पर बांटा जाता है. मगर बड़ी संख्या में दावे निरस्त होने के चलते फिर से इनकी समीक्षा हो रही है.'

21 हजार करोड़ का खनिज ले गए कारोबारी


छत्तीसगढ़ में खनन कारोबारी धड़ल्ले से बहुमूल्य संपदा को देश-विदेश में बेच रहे हैं. बीते वर्ष उन्होंने यहां से 20 हजार 841 करोड़ रुपए का खनिज निकाला, जिसके बदले में सरकार ने महज 3300 करोड़ की ही रायल्टी ही अर्जित की.

केंद्र सरकार से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार कुल रायल्टी की करीब 50 प्रतिशत राशि कोयले और 20 प्रतिशत आयरन की खदानों से प्राप्त हुई. जाहिर है कि खनन कारोबारी राज्य में सालाना जितने मूल्य का खनिज निकाल रहे हैं उसके अनुपात में बहुत ही कम रायल्टी सरकार को मिल रही है.

पढ़ेंः छत्तीसगढ़ में थर्ड जेंडर ने मांगा दो प्रतिशत आरक्षण

वहीं, अवैध खनन के मामलों में लगातार बढ़ोतरी के बावजूद हर साल इससे होने वाले हजारों करोड़ रुपए के नुकसान का अंदाजा सरकार को नहीं है. अहम बात है कि हर साल प्रदेश में अवैध खनन के औसतन साढ़े तीन हजार मामले प्रकरण न्यायालय में पहुंच रहे हैं. इस दौरान अवैध खनन में लिप्त कारोबारियों से महज 23 करोड़ रुपए का ही जुर्माना वसूला गया.

2009 से 2014  के बीच हरियाणा और मप्र सहित बाकी राज्यों में बेचा गया यह कोयला तो इस काले धंधे की एक बानगी भर है. यहां सरकारी रिकार्ड में 3700 से ज्यादा अवैध खदानें हैं. वहीं आदिवासी समुदाय की जमीनों का संरक्षण करने के लिए बने पेसा जैसे कानूनों को भी ताक पर रख दिया गया है. बस्तर क्षेत्र से भारी मात्रा में आयरन जापान जैसे देशों में निर्यात होने के बावजूद यह देश के सबसे गरीब इलाकों में शामिल है.

First published: 16 January 2016, 2:02 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

पिछली कहानी
अगली कहानी