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छत्तीसगढ़: चीफ सेक्रेटरी पर एक महिला के फेर में अफसर का कैरियर तबाह करने का आरोप

राजकुमार सोनी | Updated on: 9 August 2016, 19:23 IST
(कैच न्यूज)

भारतीय वन सेवा 1980 बैच के अफसर अनूप भल्ला ने एक बार फिर छत्तीसगढ़ के चीफ सेक्रेटरी विवेक ढांड पर अपनी पदोन्नति रोकने और करियर बर्बाद करने का आरोप लगाया है.

लगभग 13 महीने पहले जब छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद पर अरविंद बोआज की नियुक्ति की थी तब भी भल्ला ने खुले तौर पर आरोप लगाया था कि चीफ सेक्रेटरी उनकी पत्नी को मोहरा बनाकर उनका कैरियर तबाह करने पर तुले हुए हैं.

ताजा आरोप में एक बार फिर भल्ला ने कहा है कि चीफ सेक्रेटरी का एक महिला से संबंध है और वे उस महिला के चक्कर में पड़कर ही उनकी पदोन्नति में रोड़े अटकाते रहे हैं.

भल्ला का कहना है कि चीफ सेक्रेटरी जिस महिला की गिरफ्त में हैं वह कई सालों तक खुद उनके साथ रहती थीं, लेकिन अब अलग है.

कुछ ऐसा है मामला

फारेस्ट इकोनॉमी में डाक्टरेट अनूप भल्ला फिलहाल अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक हैं. 30 अगस्त 2013 को विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक में उन्हें प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद के लिए उपयुक्त पाया गया था. नियमानुसार उन्हें एक फरवरी 2014 को पदोन्नत कर दिया जाना था क्योंकि इस अवधि तक उन पर किसी तरह की विजिलेंस या विभागीय जांच लंबित नहीं थीं, लेकिन उन्हें पदोन्नति नहीं दी गई.

इस दौरान भारतीय वन सेवा के दो अफसर बीएन द्विवेदी और भोगीलाल शरण जो भल्ला से जूनियर थे, वे पदोन्नति हासिल करने में कामयाब हो गए. इन दो अफसरों की पदोन्नति के ठीक नौ महीने बाद 27 नवम्बर 2014 को भल्ला को आरोप पत्र थमाकर बताया गया कि प्रदेश के आदिवासी इलाकों में जो चूल्हा बांटा गया है उसमें घोटाला हुआ है और उसमें उनकी संलिप्तता है.

इस घोटाले में उन्हें चार्जशीट थमा दी गई. भल्ला ने चार्जशीट का जवाब भी तुरन्त दे दिया, लेकिन उनके खिलाफ दो साल बीत जाने के बाद भी जांच शुरू नहीं हो पाई है. भल्ला कहते हैं, 'चूल्हा खरीद में कोई घोटाला कभी हुआ ही नहीं था. यदि घोटाला होता तो इस कथित घोटाले में 18 अधिकारियों को दोषी करार दिया गया था वे सभी बरी क्यों कर दिए गए? केवल मुझे इसलिए निशाने पर रखा गया क्योंकि चीफ सेक्रेटरी का उस महिला से घनिष्ठ संबंध है जो मेरे साथ रहती थीं.'

भल्ला कहते हैं, विवेक ढांड और वे एक साथ पढ़े हैं. जब वे भोपाल में पदस्थ थे तब विवेक ढांड का उनके परिवार में आना-जाना था. इस दौरान उन्होंने ऐसे घनिष्ठ संबंध स्थापित कर लिए जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा.

कहां लगाऊं गुहार?

अपनी पदोन्नति के लिए भल्ला ने इधर-उधर कई तरह की कोशिशें की. कभी वे मुख्यमंत्री से मिले तो कभी राज्यपाल, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालय को चिट्ठी लिखकर अपनी पीड़ा बताई, लेकिन उन्हें हर तरफ से निराशा हाथ लगी.

भल्ला ने प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर और फेसबुक के माध्यमों से भारत सरकार के कैबिनेट सचिव को अपनी पीड़ा बताई तो वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने उन्हें यह कहते हुए चेताया कि बार-बार के पत्राचार का कोई फायदा नहीं है. अब किसी भी सूरत में आपकी अपील पर विचार नहीं किया जाएगा.

भल्ला कहते हैं, 'मुझे केंद्र ने कह दिया है कि मैं अपनी शिकायत राज्य के पास ही लेकर जाऊं? बताइए... मैं चीफ सेक्रेटरी के रंजिश रखने वाले रवैये से हताश होकर ही तो केंद्र तक गया था. अब केंद्र ने भी दो टूक कह दिया है कि राज्य के पास शिकायत रखूं. अब मैं क्या करूं? जब चीफ सेक्रेटरी मुझसे निजी खुन्नस रखते हैं तो क्या मेरी बात पर कोई गौर करेगा?'

जिद का शिकार बन गए भल्ला

भल्ला ने सूचना के अधिकार के तहत जो दस्तावेज हासिल किए हैं वह कैच न्यूज के पास उपलब्ध है.

आरटीआई के एक दस्तावेज में सामान्य प्रशासन विभाग के संयुक्त सचिव आरके टंडन के हवाले से यह साफ उल्लिखित है कि अनूप भल्ला पदोन्नति के लिए उपयुक्त हैं और इस बारे में मुख्यमंत्री से अनुमोदन भी हासिल कर लिया गया है, लेकिन चीफ सेक्रेटरी की टिप्पणी है कि भल्ला के खिलाफ एक प्रकरण में जांच रिपोर्ट पीसीसीएफ से प्राप्त हुई हो तो उसे पहले प्रस्तुत करें.

एक अन्य दस्तावेज में सामान्य प्रशासन विभाग की सचिव निधि छिब्बर ने साफ तौर पर लिखा कि 30-8-2013 की डीपीसी में अनूप भल्ला को फिट पाया था किन्तु शासन द्वारा उनका पदोन्नति आदेश जारी नहीं किया गया.

निधि बताती हैं, 'जब मैं वन विभाग के मामलों को देख रही थी तब यह मामला मेरे सामने आया था. जहां तक मेरी जानकारी है जिस रोज पदोन्नति समिति की बैठक हुई थी उस दिन तक भल्ला पर कोई आरोप नहीं था. नियम तो यही कहता है कि जिस दिन से आरोप तय होता है उसके बाद से पदोन्नति का मार्ग बाधित होता है, लेकिन भल्ला के प्रकरण में ऐसा नहीं दिखा.'

भल्ला कहते हैं, 'चीफ सेक्रेटरी ने अपने एक खास वन अधिकारी को जांच अधिकारी बना दिया था लेकिन नियम कहता है कि जब डीपीसी (विभागीय पदोन्नति समिति) की बैठक हो तो कोई जांच लंबित नहीं होनी चाहिए. जिस तिथि 30 अगस्त 2013 को डीपीसी हुई थी तब उन पर न तो कोई आरोप था और न ही जांच बैठी थी. जांच बैठने के बाद भी वह इसलिए शुरू नहीं हुई क्योंकि ढांड को महज उनकी पदोन्नति में रोड़ा अटकाना था.

इस पूरे प्रकरण पर मुख्य सचिव विवेक ढांड से बातचीत की कोशिशें असफल रहीं. उनका पक्ष जानने के लिए उन्हें मैसेज भी भेजा गया लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला.

First published: 9 August 2016, 19:23 IST
 
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