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'विकास पथ' पर बढ़ रहे छत्तीसगढ़ की स्याह सच्चाई है टीबी

शिरीष खरे | Updated on: 19 January 2016, 23:45 IST
QUICK PILL
  • पांच साल के भीतर छत्तीसगढ़ के दस विकास खण्डों में 14 हजार लोगों में मिले टीबी के लक्षण, पीड़ितों में अधिकांश आदिवासी. प्रदेश भर में टीबी के सवा लाख मरीज. एमडीआर से पीड़ित मरीजों पर टीबी की ज्यादातर दवाएं बेअसर.
  • राष्ट्रीय टीबी नियंत्रण कार्यक्रम के आंकड़े बताते हैं कि रायपुर और दुर्ग संभाग के सरकारी अस्पतालों में आने वाले टीबी मरीजों में सबसे ज्यादा संख्या एड्स पीड़ितों की.

छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ सालों में हुआ बेतरतीब औद्यौगिक विकास यहां की जनजातियों के लिए अभिशाप साबित हो रहा है. बिजली, इस्पात तथा सीमेंट संयंत्र के साथ कोयले की खदानों से निकलने वाले धूल और धुएं के गुबार आदिवासियों के फेफड़ों को खोखला बनाते जा रहे हैं.

फैक्ट्रियों की जहरीले कण राज्य के दस विकास खंडों में टीबी का कहर बनकर टूट पड़े हैं. हालत यह है कि बीते पांच सालों में यहां एक्स-रे जांच के दौरान 14 हजार से ज्यादा लोगों में टीबी के लक्षण पाए गए. जिनमें करीब आठ हज़ार पीड़ित आदिवासी हैं.

यह खुलासा केंद्र सरकार के संशोधित टीबी नियंत्रण कार्यक्रम, नई दिल्ली ने किया है. तमाम तरह की फैक्ट्रियों में प्रदूषण नियंत्रण यंत्र लगाने के निर्देश के बावजूद इन इलाकों में भारी प्रदूषण हो रहा है.

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एक स्पांज आयरन संयंत्र में रोजाना सात से आठ हजार टन कोयला जलकर धुआं और राख छोड़ता है. स्पांज आयरन संयंत्र एक-दूसरे से 12 किमी की दूरी पर होना चाहिए, लेकिन रायगढ़ जैसे देश के सबसे प्रदूषित शहरों में यह संयंत्र एक दूसरे से सटे नजर आते हैं.

प्रदेश में साठ के दशक में भिलाई इस्पात संयंत्र ही एक मात्र बड़ी औद्योगिक इकाई था. मगर आज ऐसे कई उद्योग हैं. केवल स्पांज आयरन संयंत्र सौ से अधिक हो गए हैं. इनके अलावा फेरो अलॉयज संयंत्र और री-रोलिंग मिलें भी हैं. इनसे निकलने वाले धुंए ने प्रदेश के कई इलाकों को इस कदर प्रदूषित बना दिया है कि अब ये कालिख के नीचे डूबे नजर आते हैं.

छत्तीसगढ़ में प्रदूषण के कारण हर साल ढाई हजार मरीजों में टीबी के लक्षण मिल रहे हैं

छत्तीसगढ़ राज्य स्वास्थ्य संसाधन केंद्र के निदेशक डॉ. प्रबीर चटर्जी बताते हैं कि खदान और कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के फेफड़े धूल जमने से कमजोर हो रहे हैं. इन इलाकों में सिलिकोसिस और फैफड़ों से जुड़ी कई व्याधियों के पनपने से टीबी बढऩे की आंशंकाएं हैं.

इस कार्यक्रम द्वारा जारी आकड़ों के अनुसार राज्य के रायगढ़, घरघोड़ा, सारंगगढ़, धरमजयगढ़, सुपेला, पाटन, बालौद, अकलतरा, सक्ति और धरसीवा विकास खंडों में हर साल ढाई हजार से ज्यादा लोगों की एक्स-रे जांच में टीबी के लक्षण पाए जाते हैं. पीडितों में ज्यादातर आदिवासी मजदूर और उनके परिवार वाले हैं. यहां मजदूर और रहवासियों के स्वास्थ्य के साथ कई सालों से खिलवाड़ जारी है.

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केंद्र के संशोधित टीबी नियंत्रण कार्यक्रम के अनुसार अकेले रायगढ़ के चार ब्लॉक में पांच साल के भीतर 6040 लोगों में एक्स-रे की जांच के दौरान टीबी के लक्षण पाए गए. मगर प्रदूषण और टीबी से बचाव के लिए न सरकार ने कोई कारगर योजना बनाई है, न फैक्ट्री मालिकों को ही चिंता है. ऐसे हालात में मरीज धीरे-धीरे मौत की ओर बढ़ रहे हैं.

इस बारे में जब राज्य टीबी नियंत्रण अधिकारी डॉ वी जयप्रकाश से बात की तो उन्होंने बताया कि इसके लिए अलग से सर्वे कर रहे हैं. औद्योगिक इलाकों में अतिरिक्त काम कर रहे हैं. कई बार कफ की जांच में टीबी नहीं निकलती है. मगर एक्स-रे में टीबी के लक्षण होते हैं. इससे निपटने के लिए रायपुर, दुर्ग और जगदलपुर जैसे कुछ जगहों पर केंद्र बनाएं हैं.

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ के चार ब्लॉक में पांच साल के भीतर 6040 लोगों में एक्स-रे की जांच के दौरान टीबी के लक्षण पाए गए

इन रोग से पीड़ित मरीजों के लिए उपचार के विशेष इंतजाम किए गए हैं. इसकी दवाएं बहुत महंगी होती हैं, जो मरीजों को दी जा रही हैं. लोगों को मुफ्त में भी इलाज मुहैया कराने के बावजूद छत्तीसगढ़ में इसके मरीजों की संख्या में इजाफा चौंकाने वाला है.

एक तरफ सरकार टीबी (तपेदिक, क्षय) जैसी बीमारी से लोगों को बचाने के लिए ताबड़-तोड़ अभियान चला रही है और लोगों को मुफ्त में भी इलाज मुहैया करा रही है, बावजूद इसके छत्तीसगढ़ में इसके मरीजों की संख्या में इजाफा चौंकाने वाला है.

हालत यह है कि यहां अब तक करीब सवा लाख लोग टीबी के मरीज बन चुके हैं. ऐसी स्थिति में भी लोग इसके प्रति बेसुध हैं यानी कुल मरीजों में एक चौथाई से भी कम लोग उपचार कराने जा रहे हैं.

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प्रदेश में उपचार के लिए महज 25 हजार 889 लोगों के नाम ही दर्ज हैं. महज इनमें से बड़ी संख्या गरीब और आदिवासियों की है. टीबी के मामले में रायपुर में सबसे अधिक 14 हजार 188 मरीज हैं, जिनमें महज 2 हजार 848 के नाम ही उपचार कराने वालों की सूची में हैं. दुर्ग में 13 हजार 340 टीबी मरीजों में महज 3 हजार 80 ही उपचार कराने आए. बिलासपुर में 10 हजार 6644 मरीजों में 2 हजार 569 ही उपचार कराने आए.

विशेषज्ञ बताते हैं कि ज्यादातर टीबी मरीजों का उपचार नहीं हो रहा है तो उनसे यह बीमारी हर साल तेजी से फैलती जाएगी. वहीं, राज्य के मरीजों में टीबी की प्राइमरी दवा काम नहीं कर रही है. अगले अवस्था की दवाएं बहुत महंगी होने से मरीजों तक पहुंचने में मुश्किलें आती हैं. यहां टीबी की सबसे घातक किस्म एमडीआर-टीबी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. ऐसे मरीज पर टीबी की ज्यादातर दवाएं बेअसर हो रही हैं.

छत्तीसगढ़ में टीबी की सबसे घातक किस्म एमडीआर-टीबी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है

राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम के आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल से अब तक एमडीआर-टीबी के 86 मरीजों की पहचान हुई है, जिनमें 50 मरीजों का ही इलाज हुआ है. इस मामले में जिला सरगुजा सबसे ऊपर है, जहां 25 मरीज इस खतरनाक बीमारी के चलते मौत की कगार पर पहुंच गए.

सरकारी अस्पतालों के आंकड़ों के मुताबिक बीते पांच साल में 2 हजार 51 मरीज एमडीआर-टीबी से पीड़ित हो चुके हैं. बड़ी बात यह है कि इनमें महज 560 का ही उपचार हो पाया है. बीते साल यह बीमारी 225 लोगों को अपना शिकार बना चुकी है, लेकिन इनमें 185 मरीजों का ही इलाज हो पाया है.

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टीबी उपचार की दवाएं काम न आने के चलते एमडीआर-टीबी के मामले बढ़ रहे हैं. आरएनटीसीपी के अनुसार टीबी मरीजों में सबसे ज्यादा मौत इस किस्म की टीबी के चलते हो रही हैं. इसमें कई प्रकार की दवाएं एक साथ खाने से मरीज के शरीर पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है. इसके बावजूद उसके बचने की संभावना न के बराबर होती है.

प्रदेश के पास इस जानलेवा बीमारी से निपटने के साधन नहीं हैं. यहां टीबी के नए प्रकारों की जांच में सक्षम प्रयोगशलाओं की कमी है. वहीं, गलत इलाज और जागरुकता की कमी मरीजों में दवाओं के प्रति प्रतिरोध बढऩे की एक बड़ी वजह बन रही है.

छत्तीसगढ़ में टीबी मरीजों की जांच करने पर एड्स पीड़ितों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. तीन साल के भीतर 1778 टीबी मरीजों में एचआईवी के लक्षण पाए गए हैं. बीते एक साल में टीबी के 395 मरीजों में एड्स की पुष्टि हुई है. तीन महीने की बात करें तो ऐसे 62 मरीजों की पहचान हुई है. ऐसा तब है जब 5 जिलों के सरकारी अस्पतालों से टीबी मरीजों का ब्योरा नहीं भेजा गया है.

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First published: 19 January 2016, 23:45 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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