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पत्रकारों और मानवाधिकार कर्मियों के लिए छत्तीसगढ़ खतरनाक जगह है

महताब आलम | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • दो स्थानीय पत्रकारों,\r\nसंतोष यादव\r\nऔर सोमारू नाग को पुलिस ने जेल में डाल रखा हैं. इसके खिलाफ छत्तीसगढ़ के पत्रकारों ने बड़ा प्रदर्शन किया है. संतोष\r\nयादव हिन्दी अख़बार दैनिक\r\nनवभारत में लिखते हैं जबकि सोमारू\r\nनाग राजस्थान पत्रिका के\r\nस्ट्रिंगर रहे हैं.
  • 2011 से 2013 के बीच पांच पत्रकारों की हत्या हो चुकी है छत्तीसगढ़ में. ये\r\nआंकड़े हमें बताते हैं कि\r\nछत्तीसगढ़ में पत्रकार और\r\nमानवाधिकार कार्यकर्ता\r\nसुरक्षित नहीं हैं.

सोमवार (21 दिसम्बर) को छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में स्थानीय स्तर के सैकड़ों पत्रकारों ने सरकार के विरोध में प्रदर्शन किया. इसकी वजह थी दो स्थानीय पत्रकारों, संतोष यादव और सोमारू नाग को पुलिस ने कैद में डाल रखा हैं.

संतोष यादव हिन्दी अख़बार दैनिक नवभारत और दैनिक छत्तीसगढ़ के लिए लिखते रहे हैं जबकि सोमारू नाग राजस्थान पत्रिका के स्ट्रिंगर रहे हैं. इन्हें माओवाद का समर्थक होने के आरोप में बीती जुलाई और सितम्बर माह में गिरफ्तार किया गया था.

पुलिस ने दोनों पत्रकारों के ऊपर हत्या, आपराधिक साजिश, हिंसा भड़काने के अलावा प्रतिबंधित माओवादी संगठन का हिस्सा होने का आरोप लगाया. इनपर छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम और यूएपीए की धाराओं के तहत भी आरोप है.

हालांकि उनके वकील का कहना है कि ‘इन पत्रकारों को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि इन्होंने पुलिस द्वारा आदिवासियों पर किए जा रहे अत्याचारों और मानवाधिकार हनन के खिलाफ रिपोर्टिंग की है.'

पुलिस ने दोनों पत्रकारों पर हत्या, आपराधिक साजिश, हिंसा भड़काने और माओवादी संगठन से संबद्ध होने का आरोप लगाया


अक्टूबर के महीने से इन पत्रकारों के रिहाई की को लेकर जो मुहिम चली उसने देशव्यापी रूप ले लिया है. पत्रकारों ने अपने साथी पत्रकारों की रिहाई के लिए पत्रकार सुरक्षा कानून संयुक्त समिति का गठन किया है. उनकी मांग है कि राज्य सरकार पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कानून लाए.

26 नवम्बर को सौ से अधिक पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अकादमिक जगत के लोगों ने एक अर्जी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री, सूचना प्रसारण और जनजातीय मंत्रालय को सौंपी थी.

इसमें गिरफ्तार दोनों पत्रकारों को तुरंत रिहा करने की मांग की गयी थी और इस बात की जांच करने की भी मांग थी कि उन्हें क्यों गिरफ्तार किया गया. दुर्भाग्य यह कि उन्हें अब तक इसका कोई जवाब नहीं मिला.

संतोष यादव और सोमारू न तो पहले पत्रकार हैं और न ही वे अंतिम पत्रकार होंगे. यदि सरकार पत्रकारों की सुरक्षा और निर्भयता के साथ लेखन सुनिश्चित नहीं करती है तो आने वाले समय में हालात और बिगड़ेंगे. बस्तर के पत्रकारों की शिकायत है कि उन्हें अक्सर ही उनके कामों के लिए निशाना बनाया जाता है.

मंत्रियों को दी गयी अर्जी में इस बात का जिक्र है, ‘संतोष यादव और सोमारू नाग की गिरफ्तारी राज्य में पत्रकारों के भीतर एक असुरक्षा और भय पैदा करती है. यह खतरा महज उनके काम को लेकर नहीं है बल्कि उनकी ज़िंदगियां भी खतरे में हैं.

संतोष यादव और सोमारू नाग की गिरफ्तारी राज्य में पत्रकारों के भीतर एक असुरक्षा और भय पैदा करती है

पत्रकारों के लिए किसी भी तरह की निष्पक्ष स्टोरी करना या खोजबीन करना दूभर हो जाएगा. वे सुरक्षा बलों के भय के साये में काम करेंगे.'

पत्रकार साईं रेड्डी की हत्या के बाद द हिन्दू के वरिष्ठ पत्रकार सुवोजीत बागची ने लिखा था, "बस्तर के पत्रकारों के सिर पर असुरक्षा का बनी रहती है. खतरा माओवादियों की तरफ से भी होता है और सुरक्षा बलों की तरफ से भी. माओवादी पत्रकारों से अपनी विज्ञप्ति जारी करवाना चाहतें हैं जबकि सुरक्षा बल उनसे सूचनाएं पाना चाहते हैं."

हिन्दी दैनिक देशबन्धु में काम करने वाले 51वर्षीय पत्रकार साईं रेड्डी की दिसम्बर 2013 में माओवादियों ने गला रेतकर हत्या कर दी थी. उन पर पुलिस के साथ मिलकर काम करने का शक था.

ग़ौरतलब तथ्य ये है कि 2008 में उन्हें छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम के तहत पुलिस ने इसलिए गिरफ्तार किया था क्योंकि उन पर माओवादियों से संपर्क रखने का आरोप था. हालांकि बाद में माओवादियों ने साईं की हत्या को गलती माना था.

एक अन्य पत्रकार नेमीचंद जैन की भी फरवरी 2013 में सुकमा जिले में संदिग्ध तरीके से हत्या कर दी गयी थी. नेमी चंद दशकों से हिंदी पत्रकारिता कर रहे थे. वे हरी भूमि, नई दुनिया और दैनिक भास्कर के लिए काम कर चुके थे. यही नहीं 2011 में भी दो पत्रकारों, उमेश राजपूत और सुशील पाठक की छत्तीसगढ़ में हत्या हो चुकी है.

ये आंकड़े हमें बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता सुरक्षित नहीं हैं. उनके ऊपर दोतरफा खतरा मंडरा रहा है. पुलिस औऱ माओवादी दोनों के बीच में पत्रकार पिस रहा है. ये बातें छत्तीसगढ़ से बाहर तभी निकलती हैं जब या तो किसी पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता की हत्या हो जाती है या फिर किसी को पुलिस जेल में डाल देती है.

रोजमर्रा के अत्याचार, जोखिम और धमकी के माहौल में काम करने वालों पत्रकारों छोटे संस्थानों के पत्रकारों पर हमारी निगाह कम ही जाती है. यह मसला तब और मुश्किल हो जाता है जब वह पत्रकार किसी राष्ट्रीय प्रेस या मीडिया संगठन से न जुड़ा हो.

2011 में भी दो पत्रकारों, उमेश राजपूत और सुशील पाठक की छत्तीसगढ़ में हत्या हो चुकी है


इस मसले के हल के लिए, तुरत-फुरत में राज्य सरकार को दो तरह से हस्तक्षेप करने की जरूरत है. पहला यह कि राज्य सरकार विभिन्न संस्थानों से जुड़े पत्रकारों को शक की निगाह से देखना बंद करे और बेहद कमजोर आरोपों की बिना पर गिरफ्तार किए गए पत्रकार संतोष यादव और सोमारू नाग को रिहा करे.

दूसरा, छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम को तत्काल खत्म करने की जरूरत है. यह आधुनिक लोकतंत्र में जनता के मूलभूत अधिकारों के साथ विरोधाभास पैदा करता है. अक्सर इसका शिकार वे पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ता होते हैं जो सत्ताधारी पार्टी या पुलिस के विचार से सहमत नहीं होते.

छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम और यूएपीए जैसे कानून अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों के लिहाज से भी अतार्किक हैं. राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी पत्रकारों को सुरक्षात्मक माहौल उपलब्ध कराने की है. पत्रकार की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य की भूमिका पर सवाल उठाने की है. दोनों भूमिकाएं साथ-साथ आगे बढ़ती हैं, नदी के दो छोरों की तरह जो आपस में मिलती तो नहीं लेकिन आपस में टकराती भी नहीं.

First published: 23 December 2015, 7:43 IST
 
महताब आलम @MahtabNama

लेखक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और एमनेस्टी इंटरनेशनल इण्डिया में काम करते हैं.

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