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बोल, क्योंकि लब सिलने के खतरे हैं बड़े!

सुहास मुंशी | Updated on: 13 May 2016, 8:30 IST

मंगलवार 10 मई को दिल्ली के दिल जंतर-मंतर पर सैंकड़ों की संख्या में जमा लोग जाटों के लिये आरक्षण की मांग कर रहे थे. इसी स्थान पर इनके ठीक पीछे एक और विरोध प्रदर्शन चल रहा था जिसपर शायद ही किसी का ध्यान गया हो क्योंकि इसमें बमुश्किल 15-20 लोग ही थे.

यह सभी 15 लोग छत्तीसगढ़ के पत्रकार थे और इनके पास मौजूद तख्तियों पर बिना किसी भय या दबाव के खबरें कवर करने की आजादी देने के संदेश लिखे हुए थे. इसके अलावा इनकी मांग थी कि इनके और इनके साथियों के खिलाफ दर्ज किये गए झूठे मामलों को रद्द किया जाए और फर्जी मामलों में गिरफ्तार कर जेल भेजे गए इनके साथियों को तुरंत रिहा किया जाए.

जाहिर है कि इनका प्रदर्शन इनके पड़ोस में चल रहे प्रर्दशन के शोर में कही दबकर रह गया. लेकिन इसके बावजूद इनका यह प्रदर्शन काफी हिम्मत भरा है क्योंकि यह पहला मौका है जब राज्य सरकार द्वारा सताए गए पत्रकार अपना विरोध देश की राजधानी तक लाने में सफल हुए हैं.

बीते 6 महीनों में कम से कम पांच पत्रकारों को भ्रष्टाचार और उत्पीड़न के आरोप लगाकर सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है

हालांकि उनके लिये ऐसा करना इतना आसान नहीं रहा और उन्हें कई तरह की दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा. स्थानीय पुलिस द्वारा ऐन समय पर की गई दबाव की रणनीति के चलते छत्तीसगढ़ से आने वाले पत्रकारों में से केवल आधे ही जंतर-मंतर तक पहुंचने में सफल रहे.

यहां अपनी आवाज उठाने के लिए पहुंचे आधे से अधिक पत्रकार नक्सली हिंसा के सर्वाधिक प्रभावित बस्तर से संबंधित थे जिसे देश में रिपोर्टिंग के लिहाज से सबसे खतरनाक जगहों में से एक माना जाता है.

कलम पर पाबंदी

बस्तर से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र भूमकाल समाचार के संपादक कमल शुक्ला भी इस विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वालों आए थे. उन्होंने बताया कि बस्तर से पत्रकारों के कूच करने से पहले ही, ‘‘हमें स्थानीय पुलिस के फोन आने शुरू हो गए थे.’’

उनके पास भी एक फोन आया था. वे बताते हैं, ‘‘पुलिस जानना चाहती थी कि मैं कहां जा रहा हूं और उन्होंने विरोध प्रदर्शन का हिसा बनने पर मुझे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी. रेल या हवाई मार्ग से यहां आने का कार्यक्रम बनाने वाले पत्रकारो को अंतिम समय में अपना कार्यक्रम निरस्त करना पड़ा.’’

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यह छत्तीसगढ़ की वर्तमान स्थितियों की कड़वी सच्चाई है जिनमें पत्रकारों को काम करना पड़ रहा है. सत्ताधारी वर्ग के खिलाफ मुंह बंद रखने के लिये मजबूर किया जाता है और सबसे बड़े दुख की बात तो यह है कि उन्हें सरकार के इस रवैये के खिलाफ न बोलने के लिये भी धमकाया जाता है.

बीते 6 महीनों में कम से कम पांच पत्रकारों को भ्रष्टाचार और उत्पीड़न के आरोप लगाकर सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है. इनमें से कुछ को तो शारीरिक यातनाएं देने का मामला भी सामने आ चुका है.

थोक के भाव झूठे मामले

पुलिस की यातना और गिरफ्तारी के डर से इसी क्षेत्र के पांच पत्रकार बीते कई दिनों से फरारी काट रहे हैं. राजेश साहू उनमें से एक हैं.

राजेश साहू की कहानी मंगलवार को जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर बैनर-पोस्टर लेकर प्रदर्शन करने वाले पत्रकारों जैसी ही है.

वर्ष 2013 में उन्होंने अपने गृह नगर राजनंदगांव में घट रहे सार्वजनिक घोटालों का पर्दाफाश करने वाली कई खोजी खबरें छापीं. यह राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह और उनके बेटे का निर्वाचन क्षेत्र है.

'पत्रकार सोमारु नाग के पीछे तीन बेटियां है जिनका पेट भरने वाला कोई नहीं है'

जल्द ही उनपर दबाव डाला जाने लगा. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने राज्य में घट रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखना जारी रखा.

वर्ष 2014 में उनके खिलाफ आर्थिक अनियमितताओं की दो प्राथमिकी दर्ज करवा दी गईं हालांकि उनके पास अपनी बेगुनाही साबित करने के लिये पर्याप्त सबूत मौजूद थे. इसके बाद 2015 में इनके खिलाफ एक और प्राथमिकी दर्ज की गई और इसके तुरंत बाद बीते वर्ष अगस्त के महीने में उन्हें गिरफ्तार कर जगदलपुर जेल भेज दिया गया जहां वे दो महीनों तक बंद रहे.

हालांकि उन्हें दो महीनों बाद जमानत मिली लेकिन जेल से बाहर आने के बाद से उन्होंने दोबारा यातना और गिरफ्तारी के डर से अपने घर का रुख नहीं किया है.

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साहू कहते हैं, ‘‘जिसने भी राज्य की सत्ता के खिलाफ लिखने की हिमाकत की है, फिर चाहे वे सोमारु नाग, संतोष यादव या फिर दीपक जायसवाल हों, उसे दुष्परिणाम भुगतने पड़े हैं. पत्रकारों को अवैध शराब बनाने के जुर्म तक में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है. और जब पुलिस सामने नहीं आना चाहती तब पत्रकारों की बजाय उनके स्थानीय नातेदारोंं-रिश्तेदारों को निशाना बनाया जाता है. असल में अब हमारे पास और कोइ चारा नहीं है.’’

वे बताते हैं कि कभी भी स्थितियां इतनी खराब नहीं रहीं. लेकिन बीते करीब साल-डेढ़ साल में अपने मीडिया संस्थानों संरक्षण न मिलने के कारण कई पत्रकार या तो इस पेशे को अलविदा कह चुके हैं या फिर कहीं और चले गए हैं.

परिवारों के लिये कुछ सोचें

ऐसा नहीं है कि सिर्फ वहीं भुगतते हैं जो राज्य सरकार के खिलाफ जाते हैं. मंगलवार को इस विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वालों में नया इंडिया के पत्रकार डीपी गोस्वामी भी थे और उनका कहना था कि हमें एक क्षण निकालकर उन परिवारों के बारे में भी सोचना चाहिये जो अपने इकलौते कमाने वाले से हाथ धो चुके हैं और अब अपना घर चलाने के लिये मुसीबतों का सामना कर रहे हैं.

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गोस्वामी कहते हैं, ‘‘सोमारु नाग के पीछे तीन बेटियां है जिनका पेट भरने वाला कोई नहीं है. संतोष यादव के दो छोटे बच्चे के पास भी कोई आसरा नहीं है. हममें से ही कोई न कोई सहायता पहुंचाता है तब जाकर दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो पाता है. लेकिन हमें भी यह नहीं पता कि ऐसा कब तक चलेगा.’’

First published: 13 May 2016, 8:30 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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