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छत्तीसगढ़ पुलिस: नक्सली मोर्चे पर नौनिहालों की नियुक्ति

सुहास मुंशी | Updated on: 9 April 2016, 12:53 IST

15 वर्षीय अंजुम (बदला हुआ नाम) पुलिस की मौजूदगी में खुद को बेहद सुरक्षित महसूस करती है. उसे यह बताया गया था कि अगर पुलिस की जगह वह नक्सलियों के हत्थे चढ़ गई होती तो उसकी जान को बेहद गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता था. और वह इस बात से पूरी तरह सहमत है.

अंजुम की देखभाल का जिम्मा संभाल रहा पुलिस अधिकारी बड़े प्यार से उसका ध्यान रखता है, उसे स्कूल की परीक्षाओं में उपस्थित होने के लिये प्रेरित करता है और उसकी तमाम दैनिक आवश्यकताओं का ख्याल रखता है. यहां तक कि वह अंजुम को प्रतिमाह नियमित रूप से मासिक वेतन के रूप में कुछ पारितोषिक भी अदा करता है.

यह बस्तर की बेहद खतरनाक और निरंतर संघर्षरत उस आदिवासी अनाथ लड़की की तमाम आशाओं के विपरीत एक बेहद आकर्षक जीवन है.

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इसके बदले उसे गांव-गांव जाकर पुलिस के लिये नुक्कड़ नाटकों का मंचन करना होता है. वह पुलिस द्वारा हाल ही में तैयार किये गए प्रचार दस्ते 'सांस्कृतिक नाट्य मंच' का एक हिस्सा है जिसका गठन मुख्यतः बस्तर और सुकमा के जंगली इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों को नक्सलियों का समर्थन करना बंद करने के लिये तैयार करना है और उन्हें कथित मुख्यधारा में शामिल होने के लिये प्रेरित करना है.

लेकिन अंजुम और उसके साथ नाटकों का मंचन करने वाले अन्य बच्चे अभी तक यह समझने में नाकामयाब हैं कि पुलिस ने यह कदम उठाकर न केवल उनसे बदला लेने के लिये कुख्यात नक्सलियों के सामने झोंक दिया है बल्कि साथ ही उन्होंने इनके भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया है.

एसएनएम पुलिस को गोपनीय सूचनाएं देने वाला समूह

सूत्रों का कहना है कि प्रचार और पुलिस के लिये मुखबिरी के साधन के रूप में इस्तेमाल किये जा रहे इन मासूमों को सरकार से प्राप्त धन से भुगतान किया जा रहा है जिसके लिये पुलिस ने इसके खाते भी खुलवा रखे हैं.

एक सूत्र कहता है, ‘‘इनमें से प्रत्येक बच्चे को पुलिस मुखबिर को दिया जाने वाले वेतन दिया जाता है और इन्हें गोपनीय सैनिक या जीसेस कहकर पुकारा जाता है. इन्हें प्रतिमाह करीब 15 हजार रुपये का भुगतान किया जाता है. इसके लिये बाकायदा एक व्यवस्थित तंत्र बना हुआ है.’’

आप किस भविष्य की बात कर रहे हैं. यहां कोई नहीं जानता कि कल क्या होने वाला है

गांवों में मोबाइल फोन के प्रयोग पर रोक लगाने और वहां की बिजली की सप्लाई काटने के बावजूद नक्सलियों ने अपने प्रभुत्व वाले क्षेत्र में संचार के कुछ माध्यम छोड़ दिये हैं. ऐसे में किसी भी संदेश को ग्रामीणों तक प्रेषित करने का सबसे अच्छा तरीका मनोरंजक नुक्कड़ नाटकों का मंचन करना और अपनी विचारधारा का प्रचार करने वाले गानों को तैयार करना है.

नक्सलियों को ऐसे ही नुक्कड़ नाटकों का प्रभवी उपयोग करते देखने के बाद पुलिस ने एसएनएम के माध्यम से अपनी तरफ से एक जवाबी प्रचार तंत्र की स्थापना की कोशिश की है.

बच्चों के लिए विशेष कार्यक्रम भी तैयार

सूत्रों का कहना है कि बच्चों के लिये विशेष कार्यक्रम भी तैयार किये गए हैं जिसके तहत पहले कुछ चुनिंदा गांवों को ‘चिन्हित’ किया जाता है और फिर बच्चे भारी पुलिस सुरक्षा के बीच स्थानीय भाषा, विशेषकर गोंडी भाषा, में गाने गाते और नृत्य करते हैं और लोगों को नक्सलियों के खिलाफ खड़े होने और मुख्यधारा में शामिल होने के लिये प्रेरित करते हैं.

जब इस कार्यक्रम में बारे में जानकारी रखने वाले एक पुलिस अधिकारी से इन बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के उपायों की जानकारी मांगी गई तो इस अधिकारी ने जो जवाब दिया उसे सुनकर आप भी सोच में पड़ जाएंगे, ‘‘आप किस भविष्य की बात कर रहे हैं. यहां कोई नहीं जानता कि कल क्या होने वाला है. दो या तीन वर्ष बाद क्या होने वाला है हम उसके बारे में अभी से चर्चा कैसे कर सकते हैं.’’

और यह जानने के बाद भी कि नक्सली सुरक्षा बलों के साथ किस तरह का बर्ताव करते हैं, अंजुम सहित तमाम बच्चे इस कार्यक्रम को जारी रखे हुए है.

सुरक्षा बल अक्सर सरकार की तरफ से लड़ते हुए शहीद होने वालों के बच्चों को सैनिकों के रूप में अपने साथ जोड़ लेते हैं. चाहे वे नियमित सैनिकों के बच्चे हों या फिर राज्य बलों के. इस रास्ते पर चलने के जानलेवा खतरों के बारे में जानने के बावजूद अधिकतर परिवार अपने बच्चों को इस जानलेवा रास्ते पर जाने से इसलिये नहीं रोक पाते हैं क्योंकि एक बार इस लड़ाई में परिवार के लिये रोजी-रोटी कमाने वाले को खोने के बाद सिर्फ यही बच्चे उनके लिये आय का इकलौता स्रोत हैं.

इस जटिल दांवपेंच में फंस कर बाल मुखबिरों का जीवन, फिर चाहे वे पुलिस के हों या फिर नक्सलियों के, अक्सर बहुत छोटा रह जाता है.

मुखबिरों को दिनदहाड़े मार डाला गया

इस महीने के प्रारंभ में ही पुलिस के दो युवा मुखबिरों को सुकमा में दिनदहाड़े ही मौत की नींद सुला दिया गया. इनमें से एक पोलमपल्ली गांव का रहने वाला 7 बच्चों का पिता किचेमुक्का था जिसे उसके घर के बाहर ही उसकी पत्नी और एक बच्चे के सामने मार दिया गया. इसके साथ ही दूसरों को पुलिस से बातचीत न करने की चेतावनी भी दी गई.

लेकिन ऐसी घटनाएं भी पुलिस को इन मासूमों को इस संघर्ष में चारे की तरह इस्तेमाल करने से रोकने में नाकामयाब रही हैं.

लेकिन ऐसी घटनाएं भी पुलिस को इन मासूमों को इस संघर्ष में चारे की तरह इस्तेमाल करने से रोकने में नाकामयाब रही हैं

इस क्षेत्र में राज्य के व्यवस्था तंत्र द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन करना और बच्चों को अपने कब्जे में रखने के नित-नए तरीके खोजते हुए उनका इस्तेमाल करना और उनके नन्हें हाथो में हथियार थमाना कोई नई बात नहीं है.

वर्ष 2013 में एशियन सेंटर फार ह्यूमन राइट्स (एसीएचआर) ने भारत में बाल सैनिकों पर एक रिपोर्ट जारी करते हुए खुलासा किया था कि कैसे छत्तीसगढ़ सरकार बच्चों को निचले स्तर की सुरक्षा लाइन के रूप में जबरन भर्ती कर रही है. सैन्य भाषा में इन बाल सैनिकों को ‘ब्वाॅय आॅरडील्स’ कहा जाता था. लेकिन यह आंखें खोलनी वाली रिपोर्ट भी कोई फर्क पैदा करने में नाकामयाब रही.

क्या कहतें है विशेषज्ञ

एसीएचआर के निदेशक सुहास चकमा कहते हैं, ‘‘राज्य द्वारा अभी भी इन बच्चों को सैनिकों के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. तमाम सबूत होने और हमारी रिपोर्ट के आरटीआई जवाबों के आधार पर तैयार होने के बावजूद राज्य सरकार यह कबूल करने को तैयार नहीं है कि वह इन अतिवादी समूहों के खिलाफ इन बच्चों को सैनिकों के रूप में वैसे ही इस्तेमाल कर रही है जैसे लक्सली करते हैं.’’

नेशनल कमीशन फाॅर प्रोटेक्शन आॅफ चाइल्ड राईट्स (एनसीपीसीआर) के सदस्य यशवंत जैन छत्तीसगढ़ आकर इस मामले से जुड़ी जानकारी इकट्ठा कर रहे हैं. उनका कहना है, ‘‘कई मायनों में ऐसा लगता है कि पुलिस ने लड़ने और सूचनाओं को इकट्ठा करने के लिये उसी पद्धती को अपना लिया है जिसका प्रयोग उनके दुश्मन बीते काफी समय से करते आ रहे हैं. इस प्रकार से बच्चों को सैनिकों के रूप में इस्तेमाल करना राज्य के लिये शर्मनाक भी है समस्या भी है.’’

First published: 9 April 2016, 12:53 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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