Home » इंडिया » Chhattisgarh: scarcity of blood for treatment in Lalgarh
 

छत्तीसगढ़: 'लालगढ़' में इलाज के लिए खून का टोटा

शिरीष खरे | Updated on: 10 May 2016, 22:22 IST
QUICK PILL
  • इस मांग के मुकाबले इस साल एक लाख 20 हजार यूनिट ही रक्त संग्रहण हुआ है. लिहाजा इलाज के लिए एक लाख 35 हजार यूनिट खून की कमी पड़ गई है.
  • छत्तीसगढ़ में ब्लड बैंकों की संख्या सिर्फ 55 हैं. इनमें भी 39 निजी और महज 16 ही सरकारी हैं. वहीं, प्रदेश की ज्यादातर तहसील/ब्लॉक में भी रक्त संग्रहण के केंद्र स्थापित नहीं किए गए हैं.

माओवाद प्रभावित इलाकों के चलते लाल आंतक का 'गढ़' कहा जाने वाला छत्तीसगढ़ इलाज के लिए खून की भारी कमी से जूझ रहा है. राज्य के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक इस आदिवासी बहुल प्रदेश में इलाज के लिए एक लाख से ज्यादा यूनिट खून की कमी है.

विभाग के अधिकारी इसके पीछे लोगों में रक्तदान को लेकर जागरुकता की कमी बता रहे हैं. वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदेश में ब्लड बैंकों की कमी और सरकार की लचर व्यवस्था के कारण रक्त का संग्रहण हर साल अनुमान से भी काफी कम हो रहा है.

इस कमी का खामियाजा या तो उन सामान्य परिवारों को भुगतना पड़ रहा है जिनके सदस्य आंतरिक संघर्ष या दुर्घटना के शिकार बन रहे हैं या उन महिलाओं और मरीजों को भुगतना पड़ रहा है जिन्हें प्रसव या इलाज के लिए खून चाहिए.

छत्तीसगढ़: एड्स पीड़ित कम, लेकिन एड्स से मौतें सबसे अधिक

छत्तीसगढ़ में इस साल स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक लाख 35 हजार यूनिट खून की कमी है. इसकी प्रमुख वजह यह है कि छत्तीसगढ़ के 27 जिलों में से 11 में ब्लड बैंक है ही नहीं. वहीं, प्रदेश की ज्यादातर तहसील/ब्लॉक में भी रक्त संग्रहण के केंद्र स्थापित नहीं किए गए हैं.

स्थानीय स्तर पर ही रक्त की कमी को दूर करने के लिए रक्त संग्रहण केंद्रों का विशेष महत्व होता है, लेकिन बस्तर और सरगुजा संभाग के आदिवासी अंचलों की आबादी राजधानी रायपुर और बिलासपुर जैसे बड़े शहरों पर निर्भर हो गई है.

छत्तीसगढ़: सरकारी अस्पतालों की कीमत पर निजी अस्पतालों को शह

जन स्वास्थ्य कार्यकर्ता और वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. योगेश जैन कहते हैं, 'रक्तदान अभियान के मामले में स्वाथ्य विभाग का रुख बहुत ही लचर रहता है, इसलिए रक्त संग्रहण के मामले में छत्तीसगढ़ बाकी राज्यों के मुकाबले इतना पिछड़ा हुआ है.'

रेड जोन स्टेट में खून का हिसाब

छत्तीसगढ़ में ब्लड बैंकों की संख्या सिर्फ 55 हैं. इनमें भी 39 निजी और महज 16 ही सरकारी हैं. प्रदेश को सालाना स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 2 लाख 55 हजार यूनिट खून की जरुरत पड़ती है. इस मांग के मुकाबले इस साल एक लाख 20 हजार यूनिट ही रक्त संग्रहण हुआ है. 

लिहाजा इलाज के लिए एक लाख 35 हजार यूनिट खून की कमी पड़ गई है. इनमें भी सरकारी ब्लड बैंकों में महज 60 हजार यूनिट ही खून जमा हो पाता है. कुल मिलाकर देखें तो लाल आंतक के इस 'गढ़' में लक्ष्य से 40 प्रतिशत कम रक्त संग्रहण हो पाता है.

दूसरी तरफ, राज्य ने 27 जिलों के महज 65 ब्लॉकों पर रक्त संग्रहण केंद्र बनाए हैं. मगर इसमें भी सभी केंद्रों पर रक्त संग्रहण नियमित हो, ऐसा जरूरी नहीं. स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि 45 से अधिक केंद्रों पर नियमित रूप से रक्त का संग्रहण होता है. 

एक ही सवाल- डॉक्टर शैबाल का गुनाह क्या था?

राज्य के 71 ब्लॉकों पर रक्त संग्रहण केंद्र बनाने की कोई योजना निकट भविष्य में दिखाई नहीं दे रही. जाहिर है कि प्रदेश की एक बड़ी ग्रामीण आबादी लंबे समय तक इलाज के दौरान खून के लिए बड़े शहरों की तरफ भागने के लिए मजबूर रहेगी.

माओवाद प्रभावित इलाकों में सबसे ज्यादा किल्लत

प्रदेश के माओवाद प्रभावित इलाके जैसे बीजापुर, सुकमा, बलरामपुर, सूरजपुर और कोण्डागांव जिलों में तो एक भी ब्लड बैंक नहीं है. इसके अलावा जगदलपुर, दंतेवाड़ा और नारायणपुर जिले भी ब्लड बैंक और रक्त संग्रहण की कमी से जूझ रहे हैं. 

55 में ज्यादातर ब्लड बैंक राजधानी रायपुर, बिलासपुर, राजनांदगांव, दुर्ग और महासमुंद जैसे कुछ शहरों में ही सिमटे हुए हैं. उदाहरण के लिए अकेले रायपुर में 2 सरकारी सहित 14 ब्लड बैंक हैं.

छत्तीसगढ़ः हर दूसरे दिन एक आदिवासी महिला से होता है बलात्कार

यही वजह है कि छत्तीसगढ़ जैसे धुर माओवाद और आदिवासी बहुल प्रदेश के ग्रामीण अंचल में ब्लड बैंकों का अभाव होने के कारण लोगों को समय पर रक्त उपलब्ध नहीं हो पा रहा है. बड़ी संख्या में ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं जिसमें समय पर रक्त न मिलने से मरीजों की मौत हो रही हैं.

इसलिए चाहिए इस प्रदेश को ज्यादा खून

राज्य में 25 लाख से ज्यादा लोग सिकल सेल एनीमिया नामक खून की बीमारी से पीड़ित हैं. आदिवासी क्षेत्रों में यह रोग तेजी से पैर पसार रहा है. इस रोग के मरीजों के शरीर में नियमित तौर पर और बड़ी मात्रा में खून चढ़ाना पड़ता है. 

इसके अलावा यहां प्रति वर्ष करीब 15 हजार सड़क हादसे होते हैं. वहीं, प्रदेश में मलेरिया, टीबी और कैंसर जैसी घातक बीमारियां भी हैं जिनमें लोगों को खून की जरूरत पड़ती है.

छत्तीसगढ़ः हर दिन तीन बच्चे यौन शोषण के शिकार

छत्तीसगढ़ के बड़े हिस्से में माओवादी और सुरक्षा बलों के बीच जारी संघर्ष में भी बड़ी मात्रा में खून-खराबा हुआ है. साथ ही हर साल लाखों महिलाओं को प्रसव के दौरान खून की जरूरत पड़ती है. लिहाजा एक छोटा राज्य होने के बावजूद यहां खून की मांग सालाना ढाई लाख यूनिट से भी ज्यादा रहती है.

राज्य में रक्त संग्रहण अभियान परियोजना के अतिरिक्त संचालक एसके बिंझवार का कहना है कि रक्तदान मुहिम के लिए अकेले सरकार पर निर्भर रहना ठीक नहीं हैं. इसके लिए गैर-सरकारी संस्था और नागरिक समूहों का सहयोग भी अपेक्षित है.

पढ़ेंः छत्तीसगढ़ में ईसाइयों और चर्चों पर बढ़ रहे हैं हमले

दूसरी तरफ, छत्तीसगढ़ राज्य स्वास्थ्य संसाधन केंद्र के पूर्व निदेशक डॉ. वीआर रमन का कहना है, 'यदि प्रदेश में व्यवस्थित और आक्रामक तरीके से रक्तदान अभियान को चलाया जाए तो काफी हद तक खून की कमी को कम किया जा सकता है.'

First published: 10 May 2016, 22:22 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

पिछली कहानी
अगली कहानी