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बांस की हर डाली के बदले मांग रहे एक-एक बकरा

जयंत कुमार सिंह | Updated on: 18 June 2016, 15:23 IST
(पत्रिका)

रायगढ़ लात खदान क्षेत्र में खनन कार्य से जुड़ी कंपनी एसईसीएल (साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड) को अपनी कोल खदान का विस्तार करने में पसीना आ रहा है. खदान के विस्तार में 'देवलास' रोड़ा बनकर सामने आ गया है. दरअसल, बैगा जनजाति के लोग देव स्थल को अपनी बोली में 'देवलास' कहते हैं. खदान के विस्तार में यह जमीन आ रही है. इसके कारण विस्थापन का पूरा मामला बुरी तरह उलझ गया है.

जनजाति परंपरा के अनुसार 'देवलास' को हटाया के लिए बहुत कड़े नियम हैं. लात गांव में बैगा जनजाति के लोग बताते हैं कि पुरखों से यहां पर हमारे देवता निवास करते हैं, यदि किसी वजह से उन्हें यहां से हटाया जाता है तो देवता जिस बांस के बाड़ों में रहते हैं, उसकी हर डाली के बदले में एक-एक बकरा चढ़ाना पड़ता है.

स्थिति यह है कि समुदाय का कोई व्यक्ति इस बांस के क्षेत्र या 'देवलास' में डाली तोड़ने की मंशा से आंख उठाकर भी नहीं देखता.

कंपनी को चाहिए यही जगह

मगर खनन कंपनी एसईसीएल को अब यह जगह चाहिए. बैगा जनजातियों का प्रकृति की रक्षा से लिए बना यह नियम इस समुदाय के हर व्यक्ति पर लागू होता है. सवाल है कि खनन करने वाली कंपनी एसईसीएल इससे बच कैसे सकती है. लात गांव के बीजराम राठिया ने साफ कह दिया है कि कंपनी के लिए नियम नहीं बदला जा सकता है. 

इस हालत में बैगा आदिवासियों की परंपरा के अनुसार 'देवलास' के विस्थापन के पहले हर बांस के बदले बकरे की बलि देनी पड़ेगी. अब कंपनी की दिक्कत यह है कि इस जमीन पर कोई एक या दो नहीं बल्कि बांस का पूरा जंगल है. बांस में विस्थापन के पहले अनगिनत बकरों की बलि चढ़ानी होगी. 

इस नियम की जानकारी के बाद कंपनी के अफसर भी हैरान और परेशान हैं. उनका कहना है कि वे पहले बैगा जनजातियों की इस परंपरा के बारे में जानेंगे और उसके बाद ही कोई फैसला लेंगे. जाहिर है कि कंपनी प्रबंधन को फिलहाल यह समझ नहीं आ रहा है कि उसे करना क्या है.

बांस की लंबाई और मोटाई भी रखेगी मायने

बीजराम राठिया कहते हैं कि कंपनी जितने बांस काटेगी, उतने बकरों की ही बलि देनी पड़ेगी. इस दौरान न तो एक कम और न ही एक ज्यादा बकरा उन्हें चाहिए. इसके अलावा बांस की उम्र के साथ-साथ उसकी लंबाई और मोटाई मायने रखेगी. 

बांस के आकार के आधार पर काली बकरी, भूरी बकरी, सफेद बकरी, पठिया, गर्भवती बकरी आदि की बलि दी जाती है. जाहिर है कि कंपनी को भी बांस के आकार के हिसाब से ही काली बकरी, भूरी बकरी, सफेद बकरी, पठिया, गर्भवती बकरी आदि जनजातियों को देनी पड़ेगी.

'देवलास' को हटाने के मामले में केवल एसईसीएल ही नहीं, यहां के बैगा लोग भी परेशान हैं. दरअसल, ग्रामीण परंपरा के अनुसार हर बांस के बदले बकरों और उनके प्रकारों की संख्या खोज नहीं पा रहे हैं. ऐसे हालात में ग्रामीणों की ओर से यह कहा जा रहा है कि अब देवता ही बताएंगे कि उन्हें क्या करना है. इसके लिए बैगा लोग अब देवताओं के आगे मिन्नत करेंगे.

बैगा जनजाति अपने ही समुदाय के किसी व्यक्ति पर देवता को सवार करवांएगे, फिर देवता अपने निवास को हटाने के बारे में बताएंगे कि कितने, किस रंग और उम्र के बकरे उन्हें चाहिए. इसके बाद ग्रामीण एसईसीएल को बकरों की संख्या और संबंधित जानकारी उपलब्ध कराएंगे.

स्थायी व्यवस्था के लिए होंगे अनुष्ठान

बैगा लोगों के इस 'देवलास' में एसईसीएल के ठेकेदारों ने खदान की ओबी यानि ओवर बर्डन डंप करके चौपट कर दिया है. इन हालात में देवता को वैकल्पिक तौर पर अन्य बांस के जंगल जो कि वहां से थोड़ी दूरी पर है, स्थानांतरित किया गया है. 

इसके लिए भी बकरों का चढ़ावा चढ़ाया गया था. इसका खर्च एसईसीएल ने ही उठाया था. मगर वह वैकल्पिक व्यवस्था थी. स्थायी व्यवस्था के लिए अभी भी कई अनुष्ठान कराना बाकी हैं.

इस बारे में लात खदान क्षेत्र के एसईसीएल प्रबंधक राजीव सिंह का कहना है कि कंपनी इस क्षेत्र में गांवा वालों की सहमति के बाद ही कार्य करती है. ग्रामीण जैसा कहेंगे उसी के मुताबिक काम करेंगे.

First published: 18 June 2016, 15:23 IST
 
जयंत कुमार सिंह @catchhindi

संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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