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छोटी-छोटी मात्रात्मक त्रुटियों की भारी-भारी कीमत चुका रही हैं जनजातियां

शिरीष खरे | Updated on: 9 April 2016, 22:54 IST

भांति-भांति की जनजातियों से भरे छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में रामाशंकर खेरवार भी रहते हैं. वे खुद भी जनजाति के हैं. लेकिन उनको मलाल है कि जनजाति का होने के बावजूद वे आरक्षित सीट से चुनाव नहीं लड़ सकते. ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकारी अभिलेखों में उनकी जाति अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल नहीं है.

इसी तरह कांकेर जिले के ग्राम मेरेगांव दुर्गू कोंदल के रहने वाले कमलेश मंडावी की जाति भी छत्तीसगढ़ राज्य अधिसूचित अनुसूचित जनजाति की सूची के क्रमांक एक में गोंड जनजाति की एक उपजाति सोनझरा है, लेकिन राजस्व अभिलेखों में सोनझरिया शब्द अंकित है. इसके कारण कमलेश मंडावी को अनुसूचित जनजाति का जाति प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जा रहा. ऐसा नहीं है कि ये लोग जनजाति से संबंध नहीं रखते, सच्चाई यह है कि ये लोग परंपरागत रूप से अनुसूचित जनजाति के दायरे में रहे हैं.

छोटी-छोटी मानवीय त्रुटियों की भारी कीमत छत्तीसगढ़ की लगभग 26 जनजातियां चुका रही हैं

लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार की अधिसूचित अनुसूचित जनजाति की सूची और जिलों में शामिल जनजाति को चिन्हित करने वाली सूची छोटी-छोटी इतनी सारी मात्रात्मक त्रुटियों से भरी हुई है कि जनजाति का होने के बावजूद सरकार इन्हें जनजाति नहीं मानती. स्थिति ये है कि जिलों में जनजाति को चिन्हित करने वाली सूची में कुछ जनजातियां जिन शब्दों में दर्ज हैं, छत्तीसगढ़ सरकार की सूची से उनकी मात्राओं में थोड़ी हेरफेर हो गई हैं.

इन छोटी-छोटी मानवीय त्रुटियों की भारी कीमत छत्तीसगढ़ की लगभग 26 जनजातियां चुका रही हैं. जिलों में मौजूद दस्तावेजों में दर्ज उपजातियों के नामों में अलग-अलग मात्रा होने के कारण दलित और आदिवासी तबके की कई उपजातियों के लोगों को आरक्षण के फायदे से वंचित किया जा रहा है.

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अनुसूचित जाति प्रमाण-पत्र संघर्ष समिति के संयोजक भोजराज गौरखेड़े का कहना है कि मात्राओं की इन गलतियों से छोटी जनजातियों के लोग परेशान हैं. ऐसे भी लोग हैं जो डेढ़ दशक से सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं. बिना प्रमाण पत्र के कई उपजातियों के लोगों को सरकार की योजनाओं, शिक्षा लाभ, चिकित्सा तथा नौकरी आदि से वंचित होना पड़ रहा है.

गौरखेड़े बताते हैं, 'तहसीलदारों द्वारा जाति का नाम लिखते समय 'मात्रा' लिखने में हुई गलती ने इस समय छत्तीसगढ की आठ दलित और 18 से ज्यादा आदिवासी जातियों को उनके हक से महरूम कर दिया है. कुल मिलाकर 26 जातियों की करीब 20 लाख आबादी इस मात्रात्म भुल के कारण आरक्षण के दायरे से ही बाहर हो गई है.' गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति की सूची में कुल 42 जातियां शामिल हैं.

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दिलचस्प तथ्य यह है कि इन जातियों को अविभाजित मध्य प्रदेश में आरक्षण का लाभ मिलता था. वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ के अस्तित्व में आने के बाद से ये गड़बड़ी शुरू हुई. नए राज्य में जनजातियों की सूची बनाने का काम नए सिरे से शुरू हुआ. इसी दौरान इस गड़बड़ी की नींव पड़ी. अनुसूचित जनजाति के लिए कराए गए सर्वे में सरकारी अधिकारी-कर्मचारियों ने जातियों के नाम लिखने में जगह-जगह मात्रात्मक गलतियां कीं. नतीजा यह हुआ कि दो दर्जन से अधिक उपजातियां इस लापरवाही के कारण अपने संवैधानिक हकों से दूर हो गईं.

छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति की सूची में कुल 42 जातियां शामिल हैं

छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले साल इन गलतियों के उजागर होने के बाद भारत सरकार को 26 जातियों के नाम भेजे थे. जानकारों का कहना है कि राज्य में यह संख्या 26 से ज्यादा भी हो सकती है, क्योंकि कई जातियां इतनी पिछड़ी हैं कि इनके प्रतिनिधि भी सामने नहीं आए हैं.

छत्तीसगढ़ से ही आते हैं मामले

भारत सरकार के केंद्रीय अनुसूचित जनजाति मंत्रालय से अब तक हुए पत्र व्यवहार को देखे तो पता चलता है कि इस तरह की गड़बड़ी छत्तीसगढ़ में ही देखने को मिलती है. अपभ्रंश वाले शब्दों का जाति प्रमाण पत्र जारी नहीं करने के मामले इसी राज्य से हैं.

विडंबना यह है कि जिन जातियों को मध्य-प्रदेश में आरक्षण का लाभ मिल रहा है, उन्हीं जातियों को छत्तीसगढ़ में आरक्षण से वंचित कर दिया गया है.

अनुसूचित जाति प्रमाण-पत्र समस्या निवारण संघर्ष समिति के अध्यक्ष बीएस जगरात कहते हैं, 'छत्तीसगढ़ में जातियों की मात्राओं में सबसे ज्यादा गलतियों पाई जाती हैं. मध्य-प्रदेश में सभी दलित और आदिवासी जातियों को आरक्षण का लाभ मिल रहा है.'

छत्तीसगढ़ के कांकेर से सांसद विक्रम उसेंडी ने इस मुद्दे को अगस्त, 2015 में लोकसभा में भी उठाया था.

केंद्र ने कहा, राज्य दोषी

भारत सरकार के महापंजीयक कार्यालय, नई-दिल्ली ने छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग को पत्र लिखकर बताया है कि नया राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ के अधिकारियों द्वारा सरकारी दस्तावेजों में जातियों के नाम लिखते समय की गई गलती के कारण यह समस्या पैदा हुई है.

जिन जातियों को मध्य-प्रदेश में आरक्षण का लाभ मिल रहा है, उन्हें छत्तीसगढ़ में आरक्षण से वंचित कर दिया गया

साथ ही केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि जाति प्रमाण पत्र जारी करना राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में है. इसलिए इस सूची को सुधार के लिए केंद्र के पास भेजने की जरूरत नहीं है. राज्य सरकार इस समस्या का समाधान अपने स्तर पर करने मे सक्षम है.

इस मामले में राज्य के आदिम व अनुसचित जनजाति मंत्री केदार कश्यप का कहना है, "यह प्रकरण मुख्यमंत्री रमन सिंह के संज्ञान में लाया गया है. उन्होंने जल्दी ही इसका निराकरण करने का आश्वासन दिया है."

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छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग का कहना है कि यह मामला राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में है. आयोग के अध्यक्ष देवलाल दुग्गा ने बताया, "बीते दिनों इस मामले में भारत सरकार के महापंजीयक कार्यालय से चर्चा हो चुकी है." हालांकि तमाम चर्चाओं के बावजूद राज्य की 26 जनजातियों के 20 लाख आबादी अपने संवैधानिक हक से वंचित है. यही सच है.

प्रमुख जातियां जो आरक्षण से हुईं बाहर

पठारी, पारधी, सौंरा, संवरा, सउरा, सहरा, भूयां, भूय्या, धनुहार, धनुवार, शूरी, धुरी, भरिया, बिंझिया, बिझंवार, केवट, सबरिया, धोबा, खरवार, खेरवार, परहिया, अमनीत, अमनित, महार, सोन्झारी और सोनझारिया आदि.

First published: 9 April 2016, 22:54 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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