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गोमपाड़: एक गांव जहां इंसानी चहल-पहल की बजाय बूटों की धमक सुनाई देती है

राजकुमार सोनी | Updated on: 7 February 2017, 8:20 IST

सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है, दिल पर हाथ रखकर कहिए देश क्या आजाद है.

बस्तर के धुर माओवाद प्रभावित गांव गोमपाड़ को देखकर अदम गोंडवी की यह रचना बरबस याद आ जाती है. गांव के पेंच-पसिया और मोटा चावल खाकर गुजर-बसर करने वाले बेबस आदिवासियों को देखकर लगता है कि 'आपकी सरकार आपके द्वार' का लोक-लुभावन नारा अब भी विज्ञापन के चमकीले पन्नों पर ही कैद है.

बस्तर और देश के कई हिस्सों में गोमपाड़ जैसे सैकड़ों गांव हो सकते हैं, लेकिन गोमपाड़ एक ऐसा गांव हैं जहां सूरज की रोशनी भी सोच-समझकर पहुंचती है और रात के अंधेरे में लालटेन सिर्फ इसलिए नहीं जलाई जाती क्योंकि थोड़े से उजाले में भी या तो सुरक्षाबल के जवान आ धमकते हैं या फिर माओवादी.

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गांववालों के सीने में बर्बरता की सैकड़ों कहानियां दफन हैं, लेकिन वे बहुत ज्यादा नहीं बोलते. यदि कभी-कभार कुछ बोलना हुआ तो गोंडी बोली में कहते हैं- मोममानी डोललस पुटतोम. इमे सरकार औकी... इलोकच्चोन नक्सली. (हम लोग मरने के लिए पैदा हुए हैं. अब चाहे सरकार मार दें या नक्सली).

अभी हाल के दिनों में आदिवासी नेत्री सोनी सोरी ने यहां तिरंगा फहराया है, लेकिन पहली बार यह गांव वर्ष 2009 में तब चर्चा में आया था जब सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन ने 16 आदिवासियों को माओवादी बताकर मौत के घाट उतार दिया था. 

इस घटना की देशव्यापी गूंज के बाद दोबारा यह गांव तब सुर्खियों में आया जब सुरक्षाबलों ने एक कथित मुठभेड़ में मड़कम हिड़मे नाम की आदिवासी युवती माओवादी बताकर मार गिराया. हिड़मे की मौत के बाद उसके परिजनों ने फर्जी मुठभेड़ और जंगल में दुष्कर्म का आरोप लगाया था.

गोलियों पर गांव वालों का नाम

इस गांव के हालात का जायजा लेना इतना आसान नहीं है. गांव वाले गोंडी बोली के अलावा कुछ नहीं जानते और अगर थोड़ा बहुत सवालों को समझ भी गए तो वे किसी को माओवादी और किसी को पुलिस का आदमी समझकर खामोशी ओढ़ लेते हैं.

बस्तर के सुकमा जिले से कोंटा तक का सफर भी इरादों और हौसलों को पस्त करने के लिए काफी है. उबड़-खाबड़ सड़क और उन पर बने गढढ़ों से गुजरना कष्टदायक तो है ही, उससे भी ज्यादा तकलीफ तब होती है जब कोंटा और मुरलीगुड़ा के सुरक्षा कैंपों में तैनात सुरक्षाकर्मी बंदूकें तानकर जांच-पड़ताल करते हैं. हाथ ऊपर करके खड़ा रहने के लिए कहा जाता है. कई बार कपड़े भी उतार दिए जाते हैं. सुरक्षा के नाम पर तस्वीर ली जाती है.

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इसके बाद अक्सर यह सवाल सामने आता है कि गोमपाड़ क्या माओवादियों से मिलने जाते हो. तब लगता है कि हम अभी भी किसी ऐसे देश में रह रहे हैं जिस पर बंदूक की सत्ता चलती है जहां एक नागरिक को एक गांव से दूसरे गांव में आने-जाने की आजादी हासिल नहीं है?

कोंटा से गोमपाड़ की दूरी महज 20-22 किलोमीटर होगी, लेकिन जब सफर शुरू होता है तो हलक सूख जाता है. बियाबान जंगल में जगह-जगह ध्वस्त रास्तों से गुजरने पर अहसास होता है कि इलाके में माओवादियों और सुरक्षाबलों के बीच हर रोज संघर्ष चलता होगा. ग्रामीण इसकी तस्दीक भी करते हैं कि जब-तब गोलियां चलने की आवाजें आती रहती हैं. लेकिन अक्सर इन गोलियों का शिकार बीच मं फंसकर निर्दोष गांववाले बनते हैं.

माओवादी आते हैं तब कोई नहीं आता

गोमपाड़ में कुल 70-80 घर हैं, जहां तीन सौ आदिवासी रहते हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि चुनाव क्या होता है और वोट कैसे दिया जाता है. प्रदेश में किस पार्टी की सरकार है और कौन मुख्यमंत्री है इसकी जानकारी भी उन्हें नहीं है. वे सिर्फ दो लोगों को जानते हैं. एक है सुरक्षाबल और दूसरे माओवादी.

माओवादी किस पहाड़ और जंगल को लांघकर आते हैं उन्हें नहीं मालूम, लेकिन वे जब कभी भी पहुंचते हैं तो गांव वालों को उन्हें अपने भोजन का एक हिस्सा देना ही होता है. माओवादियों की भनक पाकर जब सुरक्षाबलों के बूटों की धमक होती है तो गांव वाले भाग खड़े होते हैं. कई बार पकड़ लिए जाते हैं तो उन्हें माओवादियों को भोजन-पानी और संरक्षण देने के आरोप में बेदम पीटा जाता है.

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ग्रामीणों की शिकायत हैं कि जब माओवादी भोजन-पानी मांगने आते हैं तब उनकी धर-पकड़ करने के लिए कोई नहीं आता, लेकिन जब माओवादी चले जाते हैं तब पुलिस अपनी बहादुरी दिखाने के लिए पहुंच जाती है. गांव के किसी भी ग्रामीण के पास उनकी पहचान का परिचय पत्र नहीं है. वे नहीं जानते कि राशन कार्ड से राशन मिलता है और वोटर कार्ड से वोट देना का मौका.

गांव वालों ने अपनी सहूलियत के लिए स्वयं चेन्दरानाम के एक शख्स को अपना मुखिया चुन लिया है. चेन्दरा कहते हैं, वर्ष 2007 में गांव वालों ने एक सरपंच चुना था, लेकिन दो साल बाद पुलिस ने गांव के कई लोगों को मौत के घाट दिया तो सरपंच कोंटा भाग गया और अब वह पुलिस के लिए मुखबिरी करता है.

कौन है मास्टर जी?

गांव के लोग नहीं जानते कि पढ़ने-लिखने के लिए किसी झोपड़ी में ही सही एक स्कूल तो होता ही है. स्कूल में गुरूजी या मास्टरजी भी होते हैं. 

मास्टरजी कौन है. पूछने पर गांव वाले अगल-बगल देखने लगते हैं. गांव के पोयाम कहते हैं, 'सबसे बड़ी आफत तब आती है जब गांव में कोई बीमार पड़ता है. बीमारी की हालात में मरीज को खाट में कोंटा ले जाते हैं, लेकिन कई बार मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देता है.'

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ऐसा भी नहीं है कि गांव में कभी आने-जाने के लिए सड़क नहीं थी. गांव के बुर्जुग हिड़मा बताते हैं, सन 80 के पहले सड़क हुआ करती थी. सब लोग आते-जाते थे. बड़ी-बड़ी गाड़ियां भी आती थी, लेकिन जबसे लड़ाई चालू हुई तब से सड़क बरबाद हो गई. अब सड़क के नाम पर उबड़-खाबड़ पगडंडिया ही हैं.

क्या अब आप लोगों को सड़क की जरूरत नहीं है? पूछने पर हिड़मा कहते हैं, कौन आएगा सड़क से? पुलिस! और पुलिस आकर क्या करेगी, हमारी बेटियों की इज्जत लूटेगी. हम पर गोली चलाएगी. हमें सड़क नहीं चाहिए.

जो पहले माओवादी थे उन्होंने ही हिड़मे को मरवाया

मड़कम हिडमें की हत्या की जो कहानी गांववाले सुनाते हैं वह बहुत डरावनी है और अब तक सामने नहीं आई है. हिड़मे की मौत को लेकर सुरक्षाबलों की तरफ से यह कहा गया था कि उसे मुठभेड़ में मारा गया है, लेकिन हिड़मे की मां लक्ष्मी और गांव वाले कुछ और ही कहानी बयां करते हैं. 

लक्ष्मी का कहना है कि अब से कुछ अरसा पहले मुदाराज, संतोष और जुगदेवी माओवादियों के लिए काम करते थे. एक बार संतोष ने कहा था कि उनके संगठन को गांव के हर घर से एक लड़का या लड़की चाहिए. उसकी निगाह मड़कम पर भी थीं.

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गांव में माओवादियों के आने-जाने पर गांववालों को भोजन तैयार करना होता था. बंदूक के डर से एकाध बार मड़कम ने भी भोजन तैयार किया था. उसके अलावा मड़कम ने कभी माओवादियों का साथ नहीं दिया. 

लक्ष्मी ने बताया कि धीरे-धीरे मुदाराज, संतोष और जुगदेवी पुलिस से जा मिले और एक रोज वे दहशत फैलाने के लिए सुरक्षाबलों के साथ गांव में आ धमके. मड़कम घर में सो रही थी तब सबने उसे खींचकर बाहर निकाला और जंगल में ले जाकर दुष्कर्म करने के बाद मार डाला.

गांववालों के मुताबिक अब तक इस तरह से कई लोगों को मौत के घाट उतारा जा चुका है. इसी साल जनवरी से लेकर अब तक 11 ग्रामीण मारे जा चुके हैं. गांव में हुई एक बैठक के दौरान इसका ब्यौरा भी दिया गया.

मां ने सब कुछ दे दिया मड़कम को

गांव से कुछ दूरी पर मौजूद जंगल में मडकम हिडमे की समाधि बनाई गई है. आदिवासी परम्पराओं के मुताबिक हिडमे जिस खाट पर सोती थी वह उसकी समाधि के ऊपर रखी हुई है. समाधि के पास ही एक पेड़ पर उसकी साड़ी-चूड़ी को भी रखा गया है. 

लक्ष्मी ने बताया कि आदिवासी समाज में जितना हक बेटों का होता है उतना ही बेटियों का भी होता है. यह मातृ सत्तात्मक समाज है. मड़कम ने घर का हाथ बंटाने के लिए भुट्टे की फसल लगाई थी. उसकी मौत के बाद जो फसल हुई उसका एक हिस्सा समाधि के पास चिडिय़ों को भोजन के लिए दे दिया गया.

मड़कम के शव को दो बार दफनाया गया था. एक बार तब जब कोंटा पुलिस ने उसकी लाश को एक पॉलीथीन में लपेटकर दिया था और दूसरी बार जब उच्च-न्यायालय के निर्देश पर शव का परीक्षण किया गया. मड़कम एक लकड़ी में घुंघुरू बांधकर गोंडी में गाती भी थी.

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लक्ष्मी कहती है, जब लोग मड़कम को जंगल लेकर जा रहे थे तब उसके साथ लकड़ी में बंधा घुंघरू भी था. सब कुछ मिल गया लेकिन उसका साज नहीं मिला. कौन ले गया होगा...? लक्ष्मी कहती है, 'घुंघरू और लकड़ी को पुलिस ने यह कहते हुए जब्त कर लिया कि वो माओवादियों को गाना सुनाती थीं.'

लक्ष्मी कहती है, अगर कोई कुत्ता पागल हो जाए तो उसे मारने या भगाने के लिए गांव में बैठक होती है, लेकिन बस्तर के आदिवासियों को बगैर किसी पड़ताल के मारा जा रहा है. पता नहीं सरकार को क्यों लगता है कि हर आदिवासी नक्सली है.

देश के पूर्व गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने कहा था कि किसी इलाके से माओवादियों को हटा भर देने से ही समस्या का समाधान नहीं हो सकता. पहले इलाके को साफ करना होगा फिर वहां प्रशासनिक व्यवस्था कायम करनी होगी और उसके बाद विकास पर ध्यान देना होगा. यदि इन तीन महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो माओवादी हावी हो जाएंगे. गोमपाड़ और गोमपाड़ जैसे सैकड़ों गांव में ऐसा ही हो रहा है. आखिर सुरक्षाबल के लोग कब तक गांव में जाकर माओवादियों की धरपकड़ करते रहेंगे? कोई गांव माओवादियों का गढ़ है इसलिए विकास बाधित है ऐसा कहना जिम्मेदारी से बचना है.

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First published: 25 August 2016, 7:35 IST
 
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